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जब बात तेल और ताकत की होगी, तो भारत किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगा…………….

UB India News by UB India News
May 21, 2026
in कारोबार
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भारत ने अक्टूबर में कितना खरीदा रूसी तेल, सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
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रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर अमेरिकी प्रतिबंधों के संदर्भ में भारत ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता के साथ एक बार फिर यह दोहराया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर पूरा करेगा, वह सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में देश की आत्मविश्वासी विदेश नीति का संकेत भी है। उल्लेखनीय है कि यूक्रेन संकट के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और सस्ता रूसी तेल खरीदकर उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की अपेक्षाकृत स्थिर कीमतें उपलब्ध कराईं। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2023-24 में रूस से औसतन बीस लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात किया, जो कुल आयात का करीब 40 फीसदी था। बाद में, अमेरिका ने जब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया, तो भारत ने इसके आगे झुकने से इन्कार कर दिया। लेकिन, जब ट्रंप ने पिछले वर्ष इन देशों पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, तो इससे भारत के हितों पर भी असर पड़ने की स्थितियां पैदा हुईं। ईरान युद्ध से फैली अनिश्चितता के दौर में जब होर्मुज मार्ग में बाधा पहुंची, तब अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर लगाए प्रतिबंधों में पहले तीस दिन की ढील दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 16 मई और अब 17 जून किया गया है। ऐसे में, अगर भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका प्रतिबंध लगाए या हटाए, वह रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा, तो यह देश की उसी नीति का प्रमाण है, जिसमें वह कई शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हुए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश होने के साथ विश्व में आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े निर्णय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से भी जुड़े होते हैं। यह समझना भी अहम है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हितों की बलि नहीं दी जा सकती। आखिर अमेरिका भी तो अपने हितों के आधार पर ही व्यापारिक व सामरिक निर्णय ले रहा है। अमेरिका ने भले समुद्र में फंसे रूसी तेल की खरीद के लिए तीस दिनों की मोहलत दे दी है, लेकिन भारत ने जिस दो टूक ढंग से अपनी बात रखी है, वह भारत की विदेश नीति में आ रहे सशक्त बदलाव को ही इंगित करता है। लेकिन, यह समय अपनी ऊर्जा नीति के व्यापक आयामों पर गंभीरता से विचार करने का भी है। दीर्घकाल में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही स्थायी समाधान साबित हो सकता है।

बाजार में आएगा रूस का तेल पर चुकानी होगी ऊंची कीमत

दुनियाभर में तेल की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की मंजूरी एक महीने और बढ़ा दी है। अमेरिका के वित्त विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, यह अनुमति उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी, जो इस समय जहाजों पर लादे जा चुके हैं। अमेरिका के इस कदम से भारत सहित अन्य देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलेगी, लेकिन इसके लिए ऊंची कीमत चुकानी होगी।

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सीबीएस न्यूज के मुताबिक, वर्तमान में दुनियाभर के समुद्रों में करीब 12.4 करोड़ बैरल रूसी तेल मौजूद है। रूसी तेल से आपूर्ति जरूर बढ़ेगी, लेकिन कीमतों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। समुद्रों में रूस का 12 करोड़ बैरल तेल मौजूद है, लेकिन यह तेल की महज एक दिन की वैश्विक मांग (10.4 करोड़ प्रतिदिन) से कम है।

डच बैंक आईएनजी में कमोडिटीज स्ट्रेटेजी के हेड वारेन पैटरसन ने कहा, अमेरिका के इस कदम से आपूर्ति में रुकावट की पूरी भरपाई नहीं होगी। तेल बाजार के लिए सिर्फ एक ही समाधान है…होर्मुज से आपूर्ति फिर से सुचारू रूप से शुरू हो। इस नए उपलब्ध रूसी तेल को खरीदने की सर्वाधिक  संभावना भारत और अन्य एशियाई देशों की है।

रूस को लाभ नहीं
अमेरिकी वित्त विभाग ने कहा, इस अल्पकालिक छूट से रूस को कोई वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा का अधिकांश राजस्व पॉइंट ऑफ एक्सट्रैक्शन (जहां से तेल निकलता है) पर लगने वाले टैक्स से प्राप्त करता है।

घट रहा रूसी उराल और ब्रेंट क्रूड में अंतर
ईरान संकट शुरू होने के बाद रूसी तेल और ब्रेंट क्रूड के बीच कीमतों का अंतर अब काफी कम रह गया है। मंगलवार को रूसी उराल 101-102 डॉलर और ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। युद्ध से पहले फरवरी में रूसी उराल 55 डॉलर और ब्रेंट क्रूड का भाव 70 डॉलर के आसपास था।

रूसी तेल और ब्रेंट क्रूड के बीच अंतर अब सिर्फ 8 डॉलर का रह गया है, जो युद्ध से पहले 15 डॉलर प्रति बैरल का था। इस तरह देखा जाए, तो रूसी तेल बाजार में आएगा तो, लेकिन पहले की तरह सस्ता नहीं मिलेगा।

भारत के लिए मायने…अल्पकालिक जोखिम घटेगा
भारत को उम्मीद है कि जो अतिरिक्त रूसी तेल बाजार में उपलब्ध होगा, उसे खरीदा जा सकता है। इससे भारत और बाकी देशों को थोड़ी राहत मिल सकती है। इससे अल्पकालिक आपूर्ति का जोखिम कम होगा। रूस भारत के लिए सस्ते तेल का एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है। यह छूट जब तक जारी रहेगी, तब तक रिफाइनरियां कम कानूनी जोखिमों के साथ मौजूदा व्यापार प्रवाह को बनाए रख सकेंगी।

भारत यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि उसके पास जरूरतों के लिए पर्याप्त तेल हो। साथ ही, वह पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से जुड़े नियमों का भी पालन कर रहा है। यह छूट भारत को उन प्रतिबंधों से सीधे टकराए बिना रूसी तेल खरीदना जारी रखने में मदद करेगी।

रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर अमेरिकी प्रतिबंधों के संदर्भ में भारत ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता के साथ एक बार फिर यह दोहराया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर पूरा करेगा, वह सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में देश की आत्मविश्वासी विदेश नीति का संकेत भी है। उल्लेखनीय है कि यूक्रेन संकट के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और सस्ता रूसी तेल खरीदकर उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की अपेक्षाकृत स्थिर कीमतें उपलब्ध कराईं। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2023-24 में रूस से औसतन बीस लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात किया, जो कुल आयात का करीब 40 फीसदी था। बाद में, अमेरिका ने जब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया, तो भारत ने इसके आगे झुकने से इन्कार कर दिया। लेकिन, जब ट्रंप ने पिछले वर्ष इन देशों पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, तो इससे भारत के हितों पर भी असर पड़ने की स्थितियां पैदा हुईं। ईरान युद्ध से फैली अनिश्चितता के दौर में जब होर्मुज मार्ग में बाधा पहुंची, तब अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर लगाए प्रतिबंधों में पहले तीस दिन की ढील दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 16 मई और अब 17 जून किया गया है। ऐसे में, अगर भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका प्रतिबंध लगाए या हटाए, वह रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा, तो यह देश की उसी नीति का प्रमाण है, जिसमें वह कई शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हुए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश होने के साथ विश्व में आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े निर्णय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से भी जुड़े होते हैं। यह समझना भी अहम है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हितों की बलि नहीं दी जा सकती। आखिर अमेरिका भी तो अपने हितों के आधार पर ही व्यापारिक व सामरिक निर्णय ले रहा है। अमेरिका ने भले समुद्र में फंसे रूसी तेल की खरीद के लिए तीस दिनों की मोहलत दे दी है, लेकिन भारत ने जिस दो टूक ढंग से अपनी बात रखी है, वह भारत की विदेश नीति में आ रहे सशक्त बदलाव को ही इंगित करता है। लेकिन, यह समय अपनी ऊर्जा नीति के व्यापक आयामों पर गंभीरता से विचार करने का भी है। दीर्घकाल में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही स्थायी समाधान साबित हो सकता है।

बाजार में आएगा रूस का तेल पर चुकानी होगी ऊंची कीमत

दुनियाभर में तेल की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की मंजूरी एक महीने और बढ़ा दी है। अमेरिका के वित्त विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, यह अनुमति उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी, जो इस समय जहाजों पर लादे जा चुके हैं। अमेरिका के इस कदम से भारत सहित अन्य देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलेगी, लेकिन इसके लिए ऊंची कीमत चुकानी होगी।

सीबीएस न्यूज के मुताबिक, वर्तमान में दुनियाभर के समुद्रों में करीब 12.4 करोड़ बैरल रूसी तेल मौजूद है। रूसी तेल से आपूर्ति जरूर बढ़ेगी, लेकिन कीमतों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। समुद्रों में रूस का 12 करोड़ बैरल तेल मौजूद है, लेकिन यह तेल की महज एक दिन की वैश्विक मांग (10.4 करोड़ प्रतिदिन) से कम है।

डच बैंक आईएनजी में कमोडिटीज स्ट्रेटेजी के हेड वारेन पैटरसन ने कहा, अमेरिका के इस कदम से आपूर्ति में रुकावट की पूरी भरपाई नहीं होगी। तेल बाजार के लिए सिर्फ एक ही समाधान है…होर्मुज से आपूर्ति फिर से सुचारू रूप से शुरू हो। इस नए उपलब्ध रूसी तेल को खरीदने की सर्वाधिक  संभावना भारत और अन्य एशियाई देशों की है।

रूस को लाभ नहीं
अमेरिकी वित्त विभाग ने कहा, इस अल्पकालिक छूट से रूस को कोई वित्तीय लाभ नहीं होगा, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा का अधिकांश राजस्व पॉइंट ऑफ एक्सट्रैक्शन (जहां से तेल निकलता है) पर लगने वाले टैक्स से प्राप्त करता है।

घट रहा रूसी उराल और ब्रेंट क्रूड में अंतर
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रूसी तेल और ब्रेंट क्रूड के बीच अंतर अब सिर्फ 8 डॉलर का रह गया है, जो युद्ध से पहले 15 डॉलर प्रति बैरल का था। इस तरह देखा जाए, तो रूसी तेल बाजार में आएगा तो, लेकिन पहले की तरह सस्ता नहीं मिलेगा।

भारत के लिए मायने…अल्पकालिक जोखिम घटेगा
भारत को उम्मीद है कि जो अतिरिक्त रूसी तेल बाजार में उपलब्ध होगा, उसे खरीदा जा सकता है। इससे भारत और बाकी देशों को थोड़ी राहत मिल सकती है। इससे अल्पकालिक आपूर्ति का जोखिम कम होगा। रूस भारत के लिए सस्ते तेल का एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है। यह छूट जब तक जारी रहेगी, तब तक रिफाइनरियां कम कानूनी जोखिमों के साथ मौजूदा व्यापार प्रवाह को बनाए रख सकेंगी।

भारत यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि उसके पास जरूरतों के लिए पर्याप्त तेल हो। साथ ही, वह पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से जुड़े नियमों का भी पालन कर रहा है। यह छूट भारत को उन प्रतिबंधों से सीधे टकराए बिना रूसी तेल खरीदना जारी रखने में मदद करेगी।

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