रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर अमेरिकी प्रतिबंधों के संदर्भ में भारत ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता के साथ एक बार फिर यह दोहराया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर पूरा करेगा, वह सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में देश की आत्मविश्वासी विदेश नीति का संकेत भी है। उल्लेखनीय है कि यूक्रेन संकट के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और सस्ता रूसी तेल खरीदकर उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की अपेक्षाकृत स्थिर कीमतें उपलब्ध कराईं। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2023-24 में रूस से औसतन बीस लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात किया, जो कुल आयात का करीब 40 फीसदी था। बाद में, अमेरिका ने जब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया, तो भारत ने इसके आगे झुकने से इन्कार कर दिया। लेकिन, जब ट्रंप ने पिछले वर्ष इन देशों पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, तो इससे भारत के हितों पर भी असर पड़ने की स्थितियां पैदा हुईं। ईरान युद्ध से फैली अनिश्चितता के दौर में जब होर्मुज मार्ग में बाधा पहुंची, तब अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर लगाए प्रतिबंधों में पहले तीस दिन की ढील दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 16 मई और अब 17 जून किया गया है। ऐसे में, अगर भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका प्रतिबंध लगाए या हटाए, वह रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा, तो यह देश की उसी नीति का प्रमाण है, जिसमें वह कई शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हुए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश होने के साथ विश्व में आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े निर्णय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से भी जुड़े होते हैं। यह समझना भी अहम है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हितों की बलि नहीं दी जा सकती। आखिर अमेरिका भी तो अपने हितों के आधार पर ही व्यापारिक व सामरिक निर्णय ले रहा है। अमेरिका ने भले समुद्र में फंसे रूसी तेल की खरीद के लिए तीस दिनों की मोहलत दे दी है, लेकिन भारत ने जिस दो टूक ढंग से अपनी बात रखी है, वह भारत की विदेश नीति में आ रहे सशक्त बदलाव को ही इंगित करता है। लेकिन, यह समय अपनी ऊर्जा नीति के व्यापक आयामों पर गंभीरता से विचार करने का भी है। दीर्घकाल में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही स्थायी समाधान साबित हो सकता है।
बाजार में आएगा रूस का तेल पर चुकानी होगी ऊंची कीमत
दुनियाभर में तेल की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की मंजूरी एक महीने और बढ़ा दी है। अमेरिका के वित्त विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, यह अनुमति उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी, जो इस समय जहाजों पर लादे जा चुके हैं। अमेरिका के इस कदम से भारत सहित अन्य देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलेगी, लेकिन इसके लिए ऊंची कीमत चुकानी होगी।
रूस से तेल खरीदना जारी रखने पर अमेरिकी प्रतिबंधों के संदर्भ में भारत ने जिस स्पष्टता और दृढ़ता के साथ एक बार फिर यह दोहराया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर पूरा करेगा, वह सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में देश की आत्मविश्वासी विदेश नीति का संकेत भी है। उल्लेखनीय है कि यूक्रेन संकट के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने इस अवसर का लाभ उठाया और सस्ता रूसी तेल खरीदकर उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की अपेक्षाकृत स्थिर कीमतें उपलब्ध कराईं। आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2023-24 में रूस से औसतन बीस लाख बैरल तेल प्रतिदिन आयात किया, जो कुल आयात का करीब 40 फीसदी था। बाद में, अमेरिका ने जब रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया, तो भारत ने इसके आगे झुकने से इन्कार कर दिया। लेकिन, जब ट्रंप ने पिछले वर्ष इन देशों पर 25 फीसदी टैरिफ की धमकी दी, तो इससे भारत के हितों पर भी असर पड़ने की स्थितियां पैदा हुईं। ईरान युद्ध से फैली अनिश्चितता के दौर में जब होर्मुज मार्ग में बाधा पहुंची, तब अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद पर लगाए प्रतिबंधों में पहले तीस दिन की ढील दी, जिसे बाद में बढ़ाकर 16 मई और अब 17 जून किया गया है। ऐसे में, अगर भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका प्रतिबंध लगाए या हटाए, वह रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा, तो यह देश की उसी नीति का प्रमाण है, जिसमें वह कई शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी रखते हुए अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश होने के साथ विश्व में आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े निर्णय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता से भी जुड़े होते हैं। यह समझना भी अहम है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हितों की बलि नहीं दी जा सकती। आखिर अमेरिका भी तो अपने हितों के आधार पर ही व्यापारिक व सामरिक निर्णय ले रहा है। अमेरिका ने भले समुद्र में फंसे रूसी तेल की खरीद के लिए तीस दिनों की मोहलत दे दी है, लेकिन भारत ने जिस दो टूक ढंग से अपनी बात रखी है, वह भारत की विदेश नीति में आ रहे सशक्त बदलाव को ही इंगित करता है। लेकिन, यह समय अपनी ऊर्जा नीति के व्यापक आयामों पर गंभीरता से विचार करने का भी है। दीर्घकाल में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता ही स्थायी समाधान साबित हो सकता है।
बाजार में आएगा रूस का तेल पर चुकानी होगी ऊंची कीमत
दुनियाभर में तेल की ऊंची कीमतों से निपटने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की मंजूरी एक महीने और बढ़ा दी है। अमेरिका के वित्त विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक, यह अनुमति उन रूसी पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू होगी, जो इस समय जहाजों पर लादे जा चुके हैं। अमेरिका के इस कदम से भारत सहित अन्य देशों को समुद्र में फंसे रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिलेगी, लेकिन इसके लिए ऊंची कीमत चुकानी होगी।







