उत्तर बिहार को सीमांचल से जोड़ने वाला विक्रमशिला सेतु एक बार फिर गहरे विवादों में है. रविवार की देर रात (4 मई 2026) की देर रात करीब 1:10 बजे पुल के पिलर नंबर 133 के पास का एक बड़ा स्लैब गंगा नदी में गिर गया, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया. हालांकि, पुलिस की मुस्तैदी और रात के समय कम ट्रैफिक के कारण किसी की जान नहीं गई, लेकिन इस हादसे ने बिहार के बुनियादी ढांचे की जर्जर होती तस्वीर को दुनिया के सामने ला दिया है. वहीं, भागलपुर की लाइफलाइन कहे जाने वाले विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने की घटना ने एक बार फिर बिहार में भ्रष्टाचार पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
आधी रात का खौफ और प्रशासनिक तत्परता
बताया जाता है कि रविवार की रात करीब 11:33 बजे पुलिसकर्मियों को पिलर नंबर 133 के पास अचानक जमीन धंसने और दरारें आने के संकेत मिले थे. समय रहते वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया गया और पुल पर वाहनों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया. इसके महज डेढ़ घंटे बाद यानी 1:10 बजे देखते ही देखते करीब 25 मीटर लंबा स्लैब नदी में समा गया. गनीमत रही कि सूचना मिलते ही पुल को खाली करा लिया गया था, वरना मुजफ्फरपुर और अररिया की ओर जाने वाली बसें बड़े हादसे का शिकार हो सकती थीं. वर्तमान में पुल पर आवाजाही पूरी तरह ठप है और ट्रैफिक को मुंगेर व सुल्तानगंज की ओर डायवर्ट किया गया है.
निर्माण का इतिहास और करोड़ों का ठेका
बता दें कि विक्रमशिला सेतु का निर्माण 1990 के दशक में शुरू हुआ था और जुलाई 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के कार्यकाल में इसका उद्घाटन किया गया था. उस समय बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की सरकार थी. लगभग 4.7 किलोमीटर लंबे पुल के निर्माण का जिम्मा उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम (U.P. State Bridge Corporation) को सौंपा गया था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उस दौर में इसके निर्माण पर लगभग 838 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे.
विक्रमशिला सेतु हादसा: पुल का स्लैब गिरने के कारण भारी वाहनों का प्रवेश भागलपुर शहर और जीरो माइल क्षेत्र में पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है.
किसके दौर में बना और क्या थी लागत?
- विक्रमशिला सेतु का निर्माण बिहार के राजनीतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर की याद दिलाता है.
- आधारशिला: इस पुल की नींव 15 नवंबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रखी थी.
- निर्माण कंपनी: इसका निर्माण उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम (U.P. State Bridge Corporation) द्वारा किया गया था.
- लागत: उस समय इस 4.7 किलोमीटर लंबे पुल के निर्माण पर लगभग 167.58 करोड़ रुपये का शुरुआती खर्च अनुमानित था, जो समय के साथ बढ़ा.
- उद्घाटन: लगभग 10 साल के लंबे इंतजार के बाद 30 जून 2001 को तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने इसका उद्घाटन किया था.
स्ट्रक्चर में वो खामियां जो बनीं काल का कारण
एक्सपर्ट के अनुसार, यह पुल काफी समय से “वेंटिलेटर” पर था. मार्च 2026 में ही इसके पिलर नंबर 17, 18 और 19 की ‘फॉल्स वॉल’ (सुरक्षा दीवारें) ढह गई थीं. उस समय विभाग ने इसे महज एक बाहरी ढांचा बताकर टाल दिया था, लेकिन हकीकत में इन दीवारों के गिरने से पिलर की नींव सीधे गंगा की तेज लहरों और ‘स्कोरिंग’ (मिट्टी का कटाव) के संपर्क में आ गई थी. इसके अलावा, पुल के एक्सपेंशन जॉइंट्स के बीच का गैप 6 इंच तक बढ़ गया था, जिससे भारी वाहनों के गुजरने पर पुल में तेज कंपन होता था.
खामियां और लापरवाही की लंबी फेहरिस्त
- यह पुल उद्घाटन के कुछ ही सालों बाद विवादों में घिरने लगा था. विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों द्वारा उठाए गए मुख्य सवाल गंभीर हैं.
- सुरक्षा दीवारों का गिरना: मार्च 2026 में ही पिलर नंबर 17, 18 और 19 की ‘फॉल्स वॉल’ (सुरक्षा दीवारें) गिर गई थीं. उस समय इंजीनियरों ने इसे ‘अस्थायी ढांचा’ बताकर नजरअंदाज कर दिया था, जबकि वास्तविकता में ये पिलर की नींव को कटाव से बचाती थीं.
- जॉइंट्स में बढ़ता फासला: पुल के एक्सपेंशन जॉइंट्स के बीच का गैप खतरनाक स्तर तक बढ़ गया था, जिससे भारी वाहनों के गुजरने पर तेज कंपन महसूस होता था.
- अत्यधिक बोझ: दो लेन के इस पुल पर रोजाना लगभग 25,000 से 1 लाख वाहनों का दबाव था, जो इसकी क्षमता से कहीं अधिक था.
भ्रष्टाचार और अनदेखी पर उठते सवाल
इस पुल को लेकर सबसे बड़ा सवाल रखरखाव को लेकर है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि 2016 के बाद से पुल की कोई बड़ी मरम्मत नहीं हुई, केवल सतही रंग-रोगन करके इसे “सुरक्षित” घोषित किया जाता रहा. खास बात यह है कि इसी पुराने पुल के समानांतर अब लार्सन एंड टर्बो (L&T) एक नया 4-लेन पुल बना रही है, जिसकी लागत भी लगभग 838 करोड़ रुपये ही आंकी गई है. विपक्ष का कहना है कि जब तक नया पुल तैयार नहीं होता, तब तक पुराने पुल की सेहत से खिलवाड़ करना आम जनता की जान को जोखिम में डालने जैसा है.







