बिहार की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां तस्वीर लगभग पूरी बन चुकी है, लेकिन सबसे अहम चेहरा अब भी सियासी रणनीति की धुंध में छिपा है. प्रदेश की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन की पटकथा लिखी जा चुकी है, तारीखें भी तय हो चुकी हैं, मंच तैयार कर लिया गया, किरदार भी लगभग तय माने जा रहे हैं, फिर भी मुख्यमंत्री का नाम एक ऐसे राज की तरह संभालकर रखा गया है जिसने पूरे सियासी माहौल में गंभीरता के साथ वाली उत्सुकता भर दी है. जानकारों की नजर में भाजपा की ओर से स्थापित की जा चुकी यही अनिश्चितता इस बदलाव को सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक राजनीतिक खेल बना रहा है.
टाइमलाइन तय, प्रक्रिया फाइनल
राजधानी पटना में 14 अप्रैल को भाजपा विधायक दल की बैठक प्रस्तावित है. इस बैठक में केन्द्रीय पर्यवेक्षक के रूप में शिवराज सिंह चौहान मौजूद रहेंगे. उनके नेतृत्व में विधायक दल का नेता चुना जाएगा. इसके बाद एनडीए के अन्य घटक दल भी अपने-अपने नेता चुनेंगे और साझा बैठक में औपचारिक रूप से नए नेता के नाम पर मुहर लगेगी. 15 अप्रैल को शपथ ग्रहण की तैयारी भी लगभग तय मानी जा रही है. इस बीच सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर यह भी है कि एनडीए के सभी 202 विधायकों को पटना में रहने का निर्देश जारी कर दिया गया है. इसके साथ ही एनडीए के 45 विधान पार्षदों को भी 14 और 15 अप्रैल को पटना में रहने के लिए कहा गया है.
सब तय, पर नाम पर सस्पेंस क्यों?
राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि जब पूरी प्रक्रिया तय है, तो मुख्यमंत्री के नाम पर अब तक चुप्पी क्यों है? इसकी सबसे बड़ी वजह भाजपा की रणनीति मानी जा रही है. पार्टी पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में अंतिम समय पर ऐसे नाम सामने लाती रही है, जिनकी पहले चर्चा तक नहीं होती. राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह सब एक रणनीति के तहत किया जाता है. इससे न सिर्फ सियासी समीकरण साधे जाते हैं, बल्कि अंदरूनी असंतोष को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है.
सरप्राइज फैक्टर भाजपा की रणनीति का हिस्सा
बिहार भाजपा में संभावित चेहरों की कमी नहीं है. संगठन और सरकार में कई ऐसे नेता हैं, जिनके नाम चर्चा में हैं. सबसे आगे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का नाम है. दूसरे नंबर पर नित्यानंद राय का नाम भी चल रहा है. केंद्रीय मंत्री हैं और अमित शाह की टीम में हैं तो इस नाम की चर्चा में भी दम है. तीसरा नाम विजय कुमार सिन्हा का है जो नीतीश सरकार में दूसरे डिप्टी सीएम हैं. इसी तरह बिहार प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल और दिलीप जायसवाल का नाम भी चर्चा में है. जबकि संजीव चौरसिया, जनक राम और रेणु देवी का नाम भी राजनीति के गलियारों में चर्चा में है.
अंतिम फैसले का बेसब्री से इंतजार
हालांकि, तथ्य तो यही है कि ये सारे नाम संभावनाओं पर आधारित चर्चा का विषय हैं, क्योंकि पार्टी की ओर से किसी भी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. यही कारण है कि अंदरखाने बैठकों और मंथन का दौर जारी है. माना जा रहा है कि सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन और राजनीतिक संदेश को ध्यान में रखकर अंतिम फैसला लिया जाएगा.
नीतीश युग के अंत के साथ नई शुरुआत
हालांकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम के तहत मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे की चर्चा के बीच यह भी तय माना जा रहा है कि बिहार में एक लंबे राजनीतिक दौर का अंत होने जा रहा है. करीब दो दशकों तक राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के बाद नई नेतृत्व शैली और नई राजनीतिक दिशा देखने को मिल सकती है.
बिहार सीएम पर सस्पेंस चरम पर
बहरहाल, बिहार में सबकुछ तय है- बैठक, प्रक्रिया, शपथ और सत्ता का स्वरूप! अगर कुछ तय नहीं है, तो वह है मुख्यमंत्री का नाम. यही सस्पेंस इस पूरे घटनाक्रम को खास बना रहा है. भाजपा के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अंतिम क्षण में ऐसा नाम सामने आ सकता है जो सभी को चौंका दे. अब नजर 14 अप्रैल की एनडीए बैठक और उसके बाद होने वाली घोषणा पर टिकी है.







