नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्राैपदी मुर्मु ने 2000 सीटों वाले नवनिर्मित अत्याधुनिक सभागार (विश्वामित्रालय) का उद्घाटन किया। उन्होंने ‘सहभागिता प्रदर्शनी’ का अवलोकन किया और स्थानीय समुदाय के सदस्यों के साथ संवाद किया। साथ ही, मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए। इसके बाद प्राचीन नालंदा महाविहार के भग्नावशेषों का दीदार किया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान बन रही है। यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि मानवता के लिए ज्ञान, संवाद और सहअस्तित्व का प्रतीक है। यह भारत की प्राचीन बौद्धिक परंपरा के पुनर्जागरण का सशक्त उदाहरण है।
राष्ट्रपति मुर्मु मंगलवार को नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि इसकी स्थापना से ज्ञान का सूर्य उग चुका है। अब इसे वैश्विक रूप से उठने की बारी है।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष स्नातक करने वाले छात्रों में 30 से अधिक देशों के विद्यार्थी शामिल हैं, जो इसके सशक्त अंतरराष्ट्रीय स्वरूप, पहचान और वैश्विक आकर्षण का प्रमाण है। उन्होंने विश्वास जताया कि नालंदा विश्वविद्यालय एशिया ही नहीं, विश्व का अग्रणी शिक्षण संस्थान बनेगा।
उन्होंने कहा कि प्राचीन नालंदा बौद्ध अध्ययन का वैश्विक केंद्र था और आज भी यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय को इस दिशा में और मजबूत प्रयास करने चाहिए। ताकि, भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिल सके। उन्होंने नेट जीरो कैंपस की सराहना की और कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में उच्च शिक्षण संस्थानों को पर्यावरण संरक्षण में नेतृत्व करना होगा।
इस अवसर पर विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने कहा-‘यह विश्वविद्यालय अपने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप में अद्वितीय है। वैश्वीकरण के इस युग में इसका महत्व और भी बढ़ गया है। जैसे-जैसे हम ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ रहे हैं, यह आवश्यक है कि भारत दुनिया के लिए तैयार हो और दुनिया भारत के लिए। इसके लिए आने वाली पीढ़ियों को वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति अधिक संवेदनशील होना होगा।अंतरराष्ट्रीय छात्र अपने देशों में वापस जाकर भारत के दूत बनेंगे।’ राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने नालन्दा विश्वविद्यालय को निरंतरता और नवीनीकरण का प्रतीक बताया, जो अतीत के ज्ञान को वर्तमान की आकांक्षाओं के साथ जोड़ता है।
राष्ट्रपति ने दिए तीन मंत्र सीखना, सेवा और जुड़ाव
राजगीर। दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति ने छात्रों को आदर्श नागरिक बनने के तीन मूल मंत्र दिए। पहला, जिज्ञासा बनाए रखें और सीखते रहें। दूसरा, अपने ज्ञान का उपयोग समाज की सेवा में करें। वहीं तीसरा, अपने विश्वविद्यालय से जुड़े रहें और इसके दूत बनें। समारोह के दौरान 36 मेधावी छात्रों को स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति ने प्राचीन नालंदा महाविहार (खंडहर) का दौरा किया। वह 50 मिनट तक यहां रुकीं।








