ऐसे वक्त में, जब पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता के दौर में धकेल रहा है, तब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का सर्वकालिक निचले स्तर तक पहुंचना भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी बहुआयामी चुनौतियों का ही संकेत है। वैश्विक संकट के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपेक्षया मजबूत स्थिति में ही है, जो डॉलर की ताकत को दर्शाता है। चूंकि, अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न अधिक मिलता है, इसलिए अनिश्चितता की स्थितियों में निवेशक डॉलर को सुरक्षित विकल्प मानते हैं और उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं।
जाहिर है कि इसका सीधा असर भारत जैसे देशों की मुद्राओं पर पड़ता है। इसके अलावा, ईरान युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। भारत विश्व की उन अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर है। वह अपने कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी और प्राकृतिक गैस का 40 फीसदी से अधिक आयात करता है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे चालू खाता घाटे को बढ़ाती है, जिससे रुपया कमजोर होता है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले रुपये में ऐसी गिरावट करीब एक दशक पहले 2013 में भी देखी गई थी, पर उस वक्त घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार, दोनों आज की तुलना में कमजोर स्थिति में थे। लेकिन यह देखते हुए कि रुपये में पिछले एक वर्ष में करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है और यह इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक है, संकट की गंभीरता समझी जा सकती है। यही नहीं, अगर ईरान के साथ अमेरिका-इस्राइल का युद्ध जारी रहा, तो जैसा ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट भी बताती है, रुपया और कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये की तेज गिरावट को थामने की कोशिश बेशक की है, पर इस उपाय की भी सीमाएं हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार का असीमित प्रयोग संभव नहीं है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश की विकास दर अब भी ऊंची बनी हुई है। युवा आबादी, डिजिटल बुनियादी तंत्र और स्टार्टअप इकोसिस्टम हमारे मजबूत पक्ष हैं।
जरूरत है इस संकट को अवसर में बदलने की, जिसके लिए संरचनात्मक सुधारों की तरफ ध्यान देना होगा। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश व घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने से आयात बिल कम किया जा सकता है। रुपये का गिरते जाना गंभीर है, पर अगर अल्पकालिक उपायों के साथ दीर्घकालीन रणनीतियों पर भी ध्यान दिया जाए, तो एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जा सकता है।
आरबीआई के कड़े कदमों से रुपये ने पकड़ी रफ्तार
भारतीय रुपये ने ऐतिहासिक निचले स्तर से शानदार वापसी करते हुए गुरुवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 151 पैसे की मजबूत रिकवरी दर्ज की है। यह उछाल मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से ‘ऑनशोर फॉरवर्ड डिलीवरी मार्केट’ में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन को सीमित करने के त्वरित कदम का नतीजा है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारण मुद्रा बाजार पर अब भी दबाव बना हुआ है।
ऐसे वक्त में, जब पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता के दौर में धकेल रहा है, तब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का सर्वकालिक निचले स्तर तक पहुंचना भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी बहुआयामी चुनौतियों का ही संकेत है। वैश्विक संकट के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपेक्षया मजबूत स्थिति में ही है, जो डॉलर की ताकत को दर्शाता है। चूंकि, अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न अधिक मिलता है, इसलिए अनिश्चितता की स्थितियों में निवेशक डॉलर को सुरक्षित विकल्प मानते हैं और उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं।
जाहिर है कि इसका सीधा असर भारत जैसे देशों की मुद्राओं पर पड़ता है। इसके अलावा, ईरान युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। भारत विश्व की उन अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर है। वह अपने कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी और प्राकृतिक गैस का 40 फीसदी से अधिक आयात करता है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे चालू खाता घाटे को बढ़ाती है, जिससे रुपया कमजोर होता है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले रुपये में ऐसी गिरावट करीब एक दशक पहले 2013 में भी देखी गई थी, पर उस वक्त घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार, दोनों आज की तुलना में कमजोर स्थिति में थे। लेकिन यह देखते हुए कि रुपये में पिछले एक वर्ष में करीब 10 फीसदी की गिरावट आई है और यह इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक है, संकट की गंभीरता समझी जा सकती है। यही नहीं, अगर ईरान के साथ अमेरिका-इस्राइल का युद्ध जारी रहा, तो जैसा ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट भी बताती है, रुपया और कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 100 के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के महीनों में विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये की तेज गिरावट को थामने की कोशिश बेशक की है, पर इस उपाय की भी सीमाएं हैं, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार का असीमित प्रयोग संभव नहीं है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश की विकास दर अब भी ऊंची बनी हुई है। युवा आबादी, डिजिटल बुनियादी तंत्र और स्टार्टअप इकोसिस्टम हमारे मजबूत पक्ष हैं।
जरूरत है इस संकट को अवसर में बदलने की, जिसके लिए संरचनात्मक सुधारों की तरफ ध्यान देना होगा। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश व घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देने से आयात बिल कम किया जा सकता है। रुपये का गिरते जाना गंभीर है, पर अगर अल्पकालिक उपायों के साथ दीर्घकालीन रणनीतियों पर भी ध्यान दिया जाए, तो एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ा जा सकता है।
आरबीआई के कड़े कदमों से रुपये ने पकड़ी रफ्तार
भारतीय रुपये ने ऐतिहासिक निचले स्तर से शानदार वापसी करते हुए गुरुवार को शुरुआती कारोबार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 151 पैसे की मजबूत रिकवरी दर्ज की है। यह उछाल मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से ‘ऑनशोर फॉरवर्ड डिलीवरी मार्केट’ में बैंकों की नेट ओपन पोजीशन को सीमित करने के त्वरित कदम का नतीजा है। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारण मुद्रा बाजार पर अब भी दबाव बना हुआ है।







