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नीतीश कुमार पर दिखने लगा है उम्र का असर?

UB India News by UB India News
February 18, 2026
in पटना, बिहार
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नीतीश कुमार पर दिखने लगा है उम्र का असर?

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नीतीश कुमार खुद को भले युवा जैसा ऊर्जावान साबित करने की कोशिश में सेक्रेटेरिएट, सड़क और सदन तक सक्रिय दिखते हैं. बिहार के दौरे के बाद रोज-रोज निरीक्षण, समीक्षा बैठकें और तयशुदा कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता देखते बनती है. क्या सच में नीतीश अब उतने उर्जावान रह गए हैं, जितना वे दिखा रहे हैं. उम्र के अमृत काल में प्रवेश कर चुके नीतीश कुमार पर क्या बुढ़ापे का असर नहीं दिखता? क्या वे सच में मानसिक बीमारी के शिकार हैं, जिसका आरोप नेता प्रतिपक्ष और आरजेडी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव अक्सर लगाते रहते हैं? अब तो आरजेडी के लोगों ने उन्हें जिंदा लाश भी कहना शुरू कर दिया है. नीतीश पहले की तरह बिना देखे अब बोल नहीं पाते. अब उन्हें सभा से लेकर सदन तक पढ़ कर बोलते देखना आश्चर्य पैदा करता है. बुढ़ापे में स्मृति दोष के लिए ‘उम्र का असर’ मुहावरे के मायने बदलने की नीतीश पूरी कोशिश कर रहे हैं. नीतीश कुमार के बारे में इसी तरह के प्रश्न-प्रतिप्रश्न पिछले 5 सालों से बिहार की सियासी फिजा में तैर रहे हैं. इसके आकलन भी किए जा रहे हैं. सत्ता पक्ष के लोग उनके बुढापे की बात मन ही मन भले बेहतर समझ रहे होंगे, लेकिन उनकी जुबान से कभी ऐसी बातें नहीं निकलतीं. अलबत्ता विपक्ष अब भी उनके बारे में अपनी धारणा पर कायम है कि नीतीश कुमार का दिमाग काम नहीं कर रहा, वे अब बिहार पर बोझ बन गए हैं. इसी क्रम में आरजेडी के लोग उन्हें बीमार, लाचार के साथ अब जिंदा लाश बताने लगे हैं.

पार्टी विस्तार से बेपरवाह
इसे इस बात से बल मिल रहा है कि नीतीश जिस तरह के फौरी फैसलों के लिए जाने जाते रहें हैं, अब उसकी कोई झलक नहीं दिखती. इसे समझना कोई कठिन काम नहीं है. 2025 के विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही 35 के निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी महागठबंधन की पार्टियों के विधायकों के टूटने की हवा चलने लगी. यह भी अकलें लगीं कि महागठबंधन से बाहर की 5 सीटों वाली AIMIM और बसपा से जीतने वाले इकलौते विधायक भी नीतीश कुमार के साथ जा सकते हैं. शुरू में इसके संकेत भी मिले थे, कम से कम AIMIM की तरफ से. पार्टी के प्रदेश प्रमुख और विधायक अख्तरुल ईमान ने नीतीश कुमार की तारीफों के पुल बांधे तो बाकी 4 विधायक भी नीतीश कुमार से उन्हें सीएम बनने की बधाई देने के बहाने उनसे मिल आए. आरजेडी के 17-18 विधायकों के टूटने का ढिंढोरा पीटने वाले एनडीए के कई कद्दावर नेता सामने आ गए. लोजपा के चिराग पासवान और भाजपा के रामकृपाल यादव के साथ जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार अपने दावों पर अब भी कायम हैं. पर, जेडीयू या एनडीए की अन्य पार्टियों में महागठबंधन की पार्टियों का एक भी विधायक अब तक नहीं गया. क्या जेडीयू का विस्तार नीतीश नहीं चाहते?
विस्तार की जरूरत क्यों
एनडीए को पूर्ण ही नहीं, बल्कि भारी बहुमत मिला है. नीतीश कुमार को सबने सहर्ष सीएम स्वीकार लिया है. एनडीए में 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी भाजपा को भी उनका नेतृत्व कबूल है. चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को उनके नाम पर कोई आपत्ति नहीं है. इसके बावजूद 2020 की 43 सीटों से उठ कर 2025 में 84 पर पहुंचे जेडीयू का कुनबा नीतीश बढ़ा क्यों नहीं रहे हैं. ऐसा नहीं कि उनकी ऐसी नीति नहीं रही है. 2017 में उन्होंने अशोक चौधरी समेत कई नेताओं को तोड़ कर कांग्रेस का कबाड़ा कर दिया था. यहां कि पिछली बार बसपा और एलजेपी के इकलौते विधायकों को भी उन्होंने तोड़ कर जेडीयू का कुनबा बढ़ाया था. पर, इस बार ऐसा न करने के पीछे संदेह यह जताया जा रहा है कि अब वे फैसले लेने की मन:स्थिति में नहीं हैं, उम्र का असर है. वैसे भी नीतीश की हमेशा यह इच्छा रही है कि वे बिहार में अव्वल बने रहें. 2020 तक उन्होंने भाजपा से अधिक सीटें अपने जेडीयू के लिए ली थी. खराब हालत में भी उन्होंने इस बार बराबरी का अवसर विधानसभा चुनाव में भाजपा को दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ कर 2 सीटों पर सिमट जाने के बावजूद 2019 में उन्होंने भाजपा के बराबर सीटें जेडीयू के लिए ले ली थीं. उनके दबाव में 22 सीटों पर 2014 में जीती भाजपा को अपनी 5 सीटें कुर्बान करनी पड़ीं. यह सब वे नंबर वन बने रहने के लिए करते रहे हैं. अगर फैसले लेने में शिथिलता नहीं दिखाते तो वे महागठबंधन या दूसरे विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़ कर अपनी ताकत अवश्य बढ़ाते. वे यह भी जानते हैं कि जेडीयू में उनके सिवा कोई ऐसे फैसले नहीं ले सकता. जेडीयू की ताकत बढ़ाने में उनकी अन्यमनस्कता से यही संकेत मिलता है कि वे अब फैसले लेने की स्थिति में नहीं हैं.
निशांत और RCP पर चुप्पी
नीतीश के बुढ़ापे का एक संकेत यह भी है कि वे अपने बेटे निशांत कुमार के राजनीतिक जीवन पर कोई फैसला नहीं ले पा रहे हैं. पिछले साल भर से यह चर्चा चलती रही है कि निशांत राजनीति में आने का मन बना चुके हैं. जेडीयू के बड़े नेताओं के साथ सामान्य समर्थक भी चाहते हैं कि निशांत को राजनीति में आना चाहिए. जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने भी निशांत के बारे में नीतीश के सामने या मीडिया के सामने अपना ख्याल जाहिर कर चुके हैं. इसके बावजूद नीतीश कुमार ने अभी तक कोई निर्णय लिया है. वे न ऐसी चर्चाओं को खारिज करते हैं और कबूल ही करते हैं. इसी तरह कभी जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह की घर वापसी पर नीतीश ने चुप्पी ओढ़ ली है. बड़े फैसलों पर उनकी चुप्पी नई बात नहीं है, लेकिन उन्हें जो पसंद नहीं होता, उसे खारिज करने में वे देर भी नहीं करते. आरसीपी सिंह ऐलानिया कहते रहे हैं कि जेडीयू उनका घर है और नीतीश कुमार से उनके रिश्ते आज भी खराब नहीं हैं. आरसीपी सिंह के इस इकतरफा प्रेम पर ललन सिंह ने स्टैंड लिया. श्रवण कुमार ने जुबान खोली, लेकिन नीतीश चुप हैं. ऐसे फैसले नीतीश अगर नहीं ले पा रहे हैं तो इसकी वजह बुढ़ापे की उनकी उम्र ही हो सकती है.
क्या हैं इसकी असल वजहें
नीतीश कुमार के हाव-भाव भी बीते 2-3 साल से बदले दिखते हैं. इसे लेकर विपक्ष उनका मजाक भी उड़ाता रहा है. वे राष्ट्रगान के वक्त बगल के व्यक्ति से बात करते दिखे तो अशोक चौधरी और उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा के चंदन-टीका पर वे मजाकिया अंदाज में पेश आए. बोलने में शब्दों का चयन वे नहीं कर पाते. सदन में महिलाओं को लेकर उनकी टिप्पणी भी चर्चित रही है. पीछे की बातों को छोड़ दें तो विधानसभा के मौजूदा सत्र में ही उन्होंने राबड़ी देवी के लिए लड़की संबोधन किया. ऐसा तभी होता है, जब कोई व्यक्ति बूढ़ा हो जाता है और उसका दिमाग ठीक से काम नहीं करता. बोलने में रिपीटेशन तो सामान्य बात है और उनका बार-बार यह कहना- ‘2005 के पहले कुछ था जी’ यह संकेत देता है कि अब वे नया कुछ सोचने या करने की स्थिति में नहीं हैं.
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