आज विश्व एक गहरे तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब कोई दूर की अवधारणा नहीं रह गई है। एआई आज अर्थव्यवस्थाओं को नया रूप दे रहा है, उद्योगों को पुनर्परिभाषित कर रहा है और समाजों के संचालन को प्रभावित कर रहा है। हालांकि, इस तीव्र परिवर्तन के दौर में भी यह सत्य स्थिर है कि तकनीक हमारा भविष्य निर्धारित नहीं करती, बल्कि हमारा भविष्य हम लोग ही तय करते हैं। एआई के युग में मानव क्षमता, मूल्य, रचनात्मकता व अनुकूलनशीलता ही यह तय करेंगे कि एआई समावेशी विकास का साधन बनेगा या असमानता को और बढ़ाएगा।
इंडिया एआई इंपैक्ट समिट-2026 में मानव पूंजी कार्य समूह के सह अध्यक्ष के रूप में, मेरा मानना है कि वैश्विक एआई विमर्श के केंद्र में ‘मनुष्य’ ही होना चाहिए। वे देश जो शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और आजीवन सीखने में निवेश करेंगे, वही भविष्य की आर्थिक उन्नति का नेतृत्व करेंगे। आज हमारे सामने चुनौती केवल तकनीक अपनाने की नहीं है, बल्कि मानवीय तैयारी की है। हमें मानव पूंजी की पारंपरिक परिभाषा से आगे बढ़कर ‘संज्ञानात्मक पूंजी’ का निर्माण करना होगा, यानी वह सामूहिक बौद्धिक क्षमता, जो आलोचनात्मक सोच, जिम्मेदार नवाचार और बुद्धिमान प्रणालियों के साथ सहयोग की योग्यता विकसित कर सके।
आज भारत इस यात्रा के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। विश्व की सबसे युवा आबादी, मजबूत डिजिटल ढांचा और वैश्विक स्तर पर पहचान हासिल कर चुके संस्थानों के साथ, भारत भविष्य की जरूरत के अनुरूप प्रतिभा का प्रमुख केंद्र बन सकता है। पर, जनसांख्यिकीय लाभ ही अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को एआई-उन्मुख, बहु-विषयक और मानवीय मूल्यों पर आधारित बनाना होगा। एसटीईएम (स्टेम) शिक्षा का मजबूत होना जरूरी है, पर इसके साथ सामाजिक विज्ञान व मानविकी की भी उत्तम शिक्षा मिले, ताकि एआई विकास मानव-केंद्रित, समावेशी और जिम्मेदार बन सके। एआई का युग कौशल विकास के एक नए दर्शनशास्त्र की मांग करता है। आज रोजगार बहुत जरूरी है, लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं है; अनुकूलनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए। कृषि, स्वास्थ्य, उत्पादन, शासन आदि क्षेत्रों के पेशेवरों को सिर्फ एआई उपकरणों का उपयोग करना ही नहीं, बल्कि उनके साथ विकसित होना भी सीखना होगा। आजीवन सीखना समाज की संस्कृति बने, केवल नीति का विचार नहीं। जैसे-जैसे जेनरेटिव एआई व एजेंटिक सिस्टम कार्यप्रवाहों में शामिल होंगे, हमारे कार्यबल को मशीनों के साथ सहयोग की ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी, जो मानव की निर्णयशीलता व रचनात्मकता को सुरक्षित रखते हुए उत्पादकता बढ़ाए।
नैतिक नेतृत्व का विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई प्रणालियां अपने निर्माताओं और उपयोगकर्ताओं की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करती हैं। इसलिए, हमारी शिक्षा और नीतियां ऐसे नेतृत्वकर्ता विकसित करें, जो जवाबदेही, पारदर्शिता और निष्पक्षता को समझते हों। संस्थानों में जिम्मेदार नवाचार की संस्कृति विकसित करनी होगी। यह भी ध्यान देना होगा कि एआई का लाभ साझा समृद्धि में दिखे, न कि अवसरों के केंद्रीकरण में।
इन सभी विषयों पर विस्तृत चर्चा भारत मंडपम में होने वाले शिखर सम्मेलन के दौरान हो रही है। 17 फरवरी, 2026 को मुझे ‘द फ्यूचर ऑफ वर्क, स्किल्स एंड इनोवेशन इन द एज ऑफ एआई-पोजिशनिंग इंडिया एज द कॉग्निटिव कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड’ (एआई के युग में काम, कौशल और नवाचार का भविष्य-भारत को दुनिया की संज्ञानात्मक पूंजी के तौर पर स्थापित करना) शीर्षक सत्र की अध्यक्षता करने का अवसर मिला। यह चर्चा इस बात पर केंद्रित थी कि शिक्षा व्यवस्था कैसे विकसित हो, कौशल विकास की अवधारणा कैसे व्यापक बने, और अकादमिक जगत नवाचार, राष्ट्रीय मिशनों और तकनीकी स्वायत्तता के साथ अधिक निकटता से कैसे जुड़ सकें।
इतिहास में हर तकनीकी क्रांति ने उन समाजों को लाभ दिया है, जिन्होंने अपने लोगों में निवेश किया है। औद्योगिक युग में साक्षरता व अभियांत्रिकी महत्वपूर्ण थे, डिजिटल युग में कनेक्टिविटी और प्रोग्रामिंग ने प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एआई के युग में संज्ञानात्मक लचीलापन, बहु-विषयी ज्ञान और नैतिक सोच इस क्षेत्र का नेतृत्व तय करेंगे। भारत का लक्ष्य केवल एआई क्रांति में भाग लेना नहीं, बल्कि इसे जिम्मेदारी और समावेशिता के साथ दिशा देना होना चाहिए।
एआई का भविष्य मशीनों द्वारा मनुष्यों के प्रतिस्थापन का नहीं, बल्कि मनुष्यों द्वारा अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने का है। यदि हम दूरदृष्टि, समावेशन और ईमानदारी के साथ अपनी संज्ञानात्मक पूंजी का निर्माण करें, तो भारत सिर्फ तकनीकी महाशक्ति ही नहीं, बल्कि विश्व के लिए एक ऐसा आदर्श बन सकता है, जो दुनिया को यह दिखाए कि एआई मानव विकास को किस तरह आगे बढ़ा सकता है। आज लोगों में निवेश करने का समय है, क्योंकि भविष्य एआई का नहीं, लोगों का है। भविष्य का निर्धारण भी लोग ही करेंगे।







