पश्चिम बंगाल भाजपा की राजनीति में एक बार फिर दिलीप घोष का नाम चर्चा के केंद्र में है। कोलकाता के ईको पार्क की सुबह की सैर, न्यू टाउन स्थित उनके आवास पर बढ़ती भीड़ और लगातार बजते फोन इस बात के संकेत हैं कि बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की सियासी प्रासंगिकता एक बार फिर लौट आई है। इसी के साथ पार्टी के अंदरखाने में अब यह आकलन तेज हो गया है कि दिलीप घोष केवल औपचारिक वापसी नहीं कर रहे, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वह एक परिपक्व और लंबी राजनीतिक पारी खेलने की तैयारी में हैं।
राजनीतिक ‘वनवास’ से सक्रिय राजनीति तक
बीते कुछ वर्षों तक दिलीप घोष एक अजीब सियासी स्थिति में रहे। वह पार्टी में थे, लेकिन सक्रिय नहीं दिखते थे। उन्हें भाजपा की गाड़ी, ड्राइवर और केंद्रीय गृह मंत्रालय की सुरक्षा मिली रही, मगर प्रधानमंत्री की बंगाल रैलियों से लेकर बड़े संगठनात्मक कार्यक्रमों तक वे नजर नहीं आए। यहां तक राज्य इकाई की कार्ययोजना में भी उन्हें लगभग दरकिनार ही कर दिया गया था। पार्टी नेताओं का जवाब भी हमेशा गोलमोल रहा, ‘दिलीप घोष केंद्रीय नेता हैं, उनके बारे में फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा।” वहीं घोष खुद कहते रहे कि ‘मैं पार्टी में हूं, कहीं गया नहीं हूं।’
अमित शाह की बैठक से बदला सियासी समीकरण
31 दिसंबर को यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई, जब दिलीप घोष केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह की बैठक में शामिल हुए। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उन्हें यह न्योता केंद्रीय पर्यवेक्षक सुनील बंसल के जरिए मिला। बीजेपी के जमीनी संगठन को खड़ा करने वाले इस अनुभवी नेता के लिए यह साफ संदेश था-इंतजार खत्म हुआ। इसका असर तेजी से फैला। जो फोन पहले शांत पड़े थे, वे फिर से बजने लगे। जो समर्थन निष्क्रिय हो गए थे, वे फिर से सक्रिय हो गए। आगंतुक पहले धीरे-धीरे, फिर भारी संख्या में लौटने लगे।
भाजपा कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा
भाजपा के एक पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष के मुताबिक, ‘2016 से 2021 के बीच बंगाल भाजपा में जो जोश था, वह दिलीप घोष की वजह से था। 2021 की हिंसा और उनके हटने के बाद कई कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर गया था। अब उनकी वापसी से वही तबका फिर सक्रिय हो रहा है।’ दिलीप घोष को बंगाल बीजेपी का सबसे सफल प्रदेश अध्यक्ष माना जाता है। उनके कार्यकाल में पार्टी 2016 में 3 सीटों से बढ़कर 2021 में 77 विधानसभा सीटों तक पहुंची और 2019 लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतीं।
बिना पद के भी मजबूत पकड़
फिलहाल दिलीप घोष के पास कोई औपचारिक संगठनात्मक पद नहीं है, फिर भी वह रोज कई घंटे भाजपा दफ्तर में बिता रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि अब मिलने वालों को उनके घर से भाजपा के बिधाननगर कार्यालय भेजा जा रहा है, जहां प्रदेश अध्यक्ष के कमरे के सामने एक अलग कक्ष उनके लिए तय किया गया है।
2026 की तैयारी या नेतृत्व संतुलन?
पार्टी के भीतर उनके रोल को लेकर कयास तेज हैं। एक धड़ा मानता है कि उन्हें 2026 विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत उम्मीदवार के तौर पर आगे लाया जा रहा है। दूसरा मानता है कि यह रणनीतिक कदम है, जिससे विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के इर्द-गिर्द बनी ‘एक-नेता’ छवि को संतुलित किया जा सके। दोनों ही नेता जनाधार वाले हैं और वोट खींचने की क्षमता रखते हैं।
पहले से ज्यादा परिपक्व दिलीप घोष
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य के अनुसार अब तक वे ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे थे, अब पूरे मैदान में खेलेंगे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक यह पहले वाला दिलीप नहीं है। अब वे ज्यादा परिपक्व हैं और लंबी रणनीति के साथ सोच रहे हैं।
चुनावी साल में अहम भूमिका
2021 की हार और संगठनात्मक थकान से जूझ रही पार्टी के लिए दिलीप घोष की वापसी को बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने साफ कहा कि जब दिलीप घोष हाशिए पर थे, तब कार्यकर्ता निराश थे। उनकी वापसी से संगठन फिर सक्रिय होगा। वहीं औपचारिक भूमिका मिले या न मिले, फिलहाल संकेत साफ हैं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले दिलीप घोष की वापसी सिर्फ यादों की राजनीति नहीं, बल्कि सियासी रणनीति का अहम हिस्सा है और इस बार वे सिर्फ मैदान में मौजूद रहने नहीं, बल्कि लंबी पारी खेलने उतरे हैं।







