भारत के संघीय सिस्टम में पावर केंद्र और राज्यों के बीच बटी हुई है. संविधान में साफ तौर पर ऐसी स्थितियों के बारे में बताया गया है जहां पर राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करना होता है. यह सवाल अक्सर राज्यों और नई दिल्ली के बीच राजनीतिक मतभेदों के दौरान उठता है. इससे यह समझना काफी जरूरी हो जाता है कि क्या कोई राज्य कानूनी तौर पर केंद्र के आदेश को नजरअंदाज कर सकता है या नहीं.
संवैधानिक सिद्धांत
भारतीय संविधान के तहत राज्य केंद्र सरकार के द्वारा जारी किए गए कानूनी निर्देशों को नजरअंदाज करने या फिर उन्हें रद्द करने के लिए स्वतंत्र नहीं है. अनुच्छेद 256 हर राज्य के लिए यह अनिवार्य बनाता है कि वह अपनी कार्यकारी शक्ति का इस्तेमाल इस तरह से करे कि संसद द्वारा बनाए गए कानून का पालन किया जाए. यदि केंद्र किसी संसदीय कानून को लागू करने के लिए निर्देश जारी करता है तो राज्य सरकार संवैधानिक रूप से उनका पालन करने के लिए बाध्य है.
राज्य की शक्ति पर सीमाएं
अनुच्छेद 257 केंद्रीय अधिकार को और भी ज्यादा मजबूत करता है. अनुच्छेद 257 के मुताबिक राज्य अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल इस तरह से नहीं कर सकते जिससे संघ की कार्यकारी शक्ति में बाधा या फिर हस्तक्षेप हो. इसका मतलब है यह है कि भले ही कोई राज्य केंद्र की किसी नीति से असहमत हो लेकिन वह इस तरह से काम नहीं कर सकते जिससे उसके कार्य में रुकावट आए.
अगर कोई राज्य केंद्र की बात नहीं मानता तो क्या होगा?
संविधान लगातार गैर अनुपालन के लिए गंभीर परिणाम बताता है. अनुच्छेद 365 के तहत यदि कोई राज्य केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पालन करने या फिर उन्हें लागू करने में विफल रहता है तो राष्ट्रपति यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उस राज्य में संवैधानिक मशीनरी विफल हो गई है. इसके बाद राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है.
क्या किसी राज्य के पास कोई कानूनी उपाय?
हालांकि राज्य सीधे तौर पर केंद्र के आदेशों को नजरंदाज नहीं कर सकते लेकिन वह पूरी तरह से कमजोर नहीं है. अगर किसी राज्य को लगता है कि केंद्र ने अपनी संवैधानिक अथॉरिटी को पार कर लिया है या फिर राज्य की शक्तियों पर कब्जा कर लिया है तो वह आर्टिकल 131 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है. ऐसे विवादों को सुलझाने का यह सही संवैधानिक तरीका है.







