राजद में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा. लालू यादव आंख के आपरेशन के बाद सांसद बेटी मीसा भारती के दिल्ली स्थित आवास पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं. पार्टी और परिवार की परवाह किए बगैर तेजस्वी यादव सैर पर देश से बाहर बताए जाते हैं लालू को किडनी देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य को अब अपने भाई पर भरोसा नहीं रहा. उन्हें नीतीश कुमार से अधिक उम्मीद है. महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार का मार्मिक आग्रह उन्होंने नीतीश कुमार से किया है. राजद नेता राबड़ी आवास न खाली करने के लिए दहाड़ते रहे, लेकिन आखिरकार राबड़ी ने शिफ्टिंग शुरू कर दी. यानी वे 10 सर्कुलर रोड का बंगला छोड़ रही है. फिलवक्त राजद नेतृत्व विहीन हो गया है. दूसरे-तीसरे दर्जे के नेता बे सिर-पैर के बयान दे रहे हैं. इसे ऐसे समझिए कि एनडीए नेताओं ने राजद विधायकों के पाला बदल का दावा किया तो राजद ने भी उसी अनुरूप जेडीयू में ही टूट की आशंका जता दी.
लालू-राबड़ी का पता बदलेगा
बहरहाल, चर्चा का विषय राजद का हाल बयान करना नहीं, बल्कि 10 र्कुलर रोड के उस मनहूस बंगले की कहानी बयां करना मकसद है. करीब 20 साल से राबड़ी देवी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के नाते इस बंगले में रह रही थीं. यहीं पर लालू यादव भी जमानत पर रिहा होने के बाद रह रहे थे. तेजस्वी यादव को विधायक और नेता प्रतिपक्ष के नाते अलग बंगला आवंटित है, लेकिन वे राबड़ी देवी के साथ इसी बंगले में सपरिवार रहते हैं. रहते तो लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप भी यहीं थे, लेकिन बाद में उन्होंने सरकारी आवास को ठिकाना बना लिया था. लालू-राबड़ी के सीएम रहते यह बंगला अनिरुद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधु यादव के नाम आवंटित था. 9-10 साल साधु यादव इसी बंगले में रहे. राबड़ी देवी के भाई हैं साधु.
बहरहाल, चर्चा का विषय राजद का हाल बयान करना नहीं, बल्कि 10 र्कुलर रोड के उस मनहूस बंगले की कहानी बयां करना मकसद है. करीब 20 साल से राबड़ी देवी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के नाते इस बंगले में रह रही थीं. यहीं पर लालू यादव भी जमानत पर रिहा होने के बाद रह रहे थे. तेजस्वी यादव को विधायक और नेता प्रतिपक्ष के नाते अलग बंगला आवंटित है, लेकिन वे राबड़ी देवी के साथ इसी बंगले में सपरिवार रहते हैं. रहते तो लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप भी यहीं थे, लेकिन बाद में उन्होंने सरकारी आवास को ठिकाना बना लिया था. लालू-राबड़ी के सीएम रहते यह बंगला अनिरुद्ध प्रसाद यादव उर्फ साधु यादव के नाम आवंटित था. 9-10 साल साधु यादव इसी बंगले में रहे. राबड़ी देवी के भाई हैं साधु.
मनहूस साबित हुआ बंगला
अगर बंगले की मनहूसियत की बात करें तो लालू परिवार को यह समय-समय पर गम देता रहा है. साधु यादव इस बंगले में रहते कहां बिला गए, सबको पता है. अव्वल तो बहन-बहनोई से उनका रिश्ता राबड़ी देवी के इसी बंगले में शिफ्ट होने के बाद खत्म हुआ. अब तो दोनों साले- साधु और सुभाष यादव लालू परिवार के कटु आलोचक बन गए हैं. इसी बंगले में रहते राबड़ी देवी को सत्ता से बाहर कराने में साधु यादव की बड़ी भूमिका मानी जाती है. उस दौर में साधु की हनक बताती फिल्म भी बन चुकी है. उन पर यह भी आरोप लगा कि लालू की बेटी की शादी में उन्होंने एक शो रूम से जबरन गाड़ियां मंगवा ली थीं. साधु यादव अर्से से अपनी राजनीतिक जमीन के लिए भटक रहे हैं. राजद के बाद कांग्रेस, बसपा और न जाने किन-किन पार्टियों में वे घूम चुके हैं, लेकिन कहीं उन्हें मुकम्मल जहां नहीं मिलता.
अगर बंगले की मनहूसियत की बात करें तो लालू परिवार को यह समय-समय पर गम देता रहा है. साधु यादव इस बंगले में रहते कहां बिला गए, सबको पता है. अव्वल तो बहन-बहनोई से उनका रिश्ता राबड़ी देवी के इसी बंगले में शिफ्ट होने के बाद खत्म हुआ. अब तो दोनों साले- साधु और सुभाष यादव लालू परिवार के कटु आलोचक बन गए हैं. इसी बंगले में रहते राबड़ी देवी को सत्ता से बाहर कराने में साधु यादव की बड़ी भूमिका मानी जाती है. उस दौर में साधु की हनक बताती फिल्म भी बन चुकी है. उन पर यह भी आरोप लगा कि लालू की बेटी की शादी में उन्होंने एक शो रूम से जबरन गाड़ियां मंगवा ली थीं. साधु यादव अर्से से अपनी राजनीतिक जमीन के लिए भटक रहे हैं. राजद के बाद कांग्रेस, बसपा और न जाने किन-किन पार्टियों में वे घूम चुके हैं, लेकिन कहीं उन्हें मुकम्मल जहां नहीं मिलता.
अशुभ घटनाओं का गवाह
राबड़ी देवी को सीएम पद छोड़ने के बाद 10 सर्कुलर रोड का बंगला आवंटित हुआ था. बाद में नेता प्रतिपक्ष के नाते उन्हें यही बंगला दे दिया गया. तब से लालू का परिवार इसी बंगले में रहता था. चूंकि आरजेडी के आलाकमान लालू, राबड़ी और तेजस्वी यहीं रहते थे, इसलिए यह पावर सेंटर बना हुआ था. राजद नेताओं-कार्यकर्ताओं की तो हमेशा यहां आवाजाही रहती थी. लालू यहां मकर सक्रांति, होली और रमजान के अवसर पर भव्य भोज का आयोजन करते थे. लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप की पत्नी ऐश्र्वर्या राय ने बहू बन कर इसी आवास में अपना पहला कदम रखा था. भले बाद में लुट-पिट कर उन्होंने यहीं से मायके की ओर कदम बढ़ाया. तेज प्रताप को भी परिवार से बाहर करने का निर्दयी फैसला लालू ने यहीं बैठ कर लिया. हाल में बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद लालू को जीवन दान देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य भी इसी बंगले में अपमान सहने के बाद रोती-बिलखती निकली थीं.
राबड़ी देवी को सीएम पद छोड़ने के बाद 10 सर्कुलर रोड का बंगला आवंटित हुआ था. बाद में नेता प्रतिपक्ष के नाते उन्हें यही बंगला दे दिया गया. तब से लालू का परिवार इसी बंगले में रहता था. चूंकि आरजेडी के आलाकमान लालू, राबड़ी और तेजस्वी यहीं रहते थे, इसलिए यह पावर सेंटर बना हुआ था. राजद नेताओं-कार्यकर्ताओं की तो हमेशा यहां आवाजाही रहती थी. लालू यहां मकर सक्रांति, होली और रमजान के अवसर पर भव्य भोज का आयोजन करते थे. लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप की पत्नी ऐश्र्वर्या राय ने बहू बन कर इसी आवास में अपना पहला कदम रखा था. भले बाद में लुट-पिट कर उन्होंने यहीं से मायके की ओर कदम बढ़ाया. तेज प्रताप को भी परिवार से बाहर करने का निर्दयी फैसला लालू ने यहीं बैठ कर लिया. हाल में बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद लालू को जीवन दान देने वाली बेटी रोहिणी आचार्य भी इसी बंगले में अपमान सहने के बाद रोती-बिलखती निकली थीं.
कब-कब कौन रहा बंगले में
राजद की सरकार 2005 चली गई. तो 10 स्रकुलर रोड वाला बंगला राबड़ी देवी को मिला था. उसके पहले यह बंगला राबड़ी देवी के भाई अनिरुद्ध यादव उर्फ साधु यादव के नाम विधायक के नाते आवंटित था. नवंबर 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद राबड़ी देवी को 1 अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास खाली करना पड़ा था. जनवरी 2006 में यह बंगला पूर्व मुख्यमंत्री के नाते राबड़ी देवी को मिला. लालू प्रसाद यादव और परिवार के सभी लोग यहीं शिफ्ट हो गए. साधु यादव इसी बंगले में रहते राजनीतिक वियावान में भटके थे. हालांकि सिर्फ वे ही नहीं, बल्कि राजद को भी उसके बाद सियासत का मुकम्मल जहां नसीब नहीं हुआ. राजद के संस्थापकों में साधु यादव शुमार किए जाते हैं. उनका राजनीतिक करियर 1990 के दशक में राजद से ही शुरू हुआ था. लालू-राबड़ी राज में उन्हें काफी प्रभावशाली माना जाता था. साधु 1995-1997 और 1998-2000 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे. 2000-2004 तक गोपालगंज विधानसभा सीट से विधायक रहे. 2004-2009 के दौरान राजद के टिकट पर गोपालगंज लोकसभा सीट से 14वीं लोकसभा के सांसद बने. हालांकि उनका यह उत्थान बंगले की वजह से नहीं, बल्कि लालू-राबड़ी के सहयोग से संभव हुआ.
राजद की सरकार 2005 चली गई. तो 10 स्रकुलर रोड वाला बंगला राबड़ी देवी को मिला था. उसके पहले यह बंगला राबड़ी देवी के भाई अनिरुद्ध यादव उर्फ साधु यादव के नाम विधायक के नाते आवंटित था. नवंबर 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद राबड़ी देवी को 1 अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास खाली करना पड़ा था. जनवरी 2006 में यह बंगला पूर्व मुख्यमंत्री के नाते राबड़ी देवी को मिला. लालू प्रसाद यादव और परिवार के सभी लोग यहीं शिफ्ट हो गए. साधु यादव इसी बंगले में रहते राजनीतिक वियावान में भटके थे. हालांकि सिर्फ वे ही नहीं, बल्कि राजद को भी उसके बाद सियासत का मुकम्मल जहां नसीब नहीं हुआ. राजद के संस्थापकों में साधु यादव शुमार किए जाते हैं. उनका राजनीतिक करियर 1990 के दशक में राजद से ही शुरू हुआ था. लालू-राबड़ी राज में उन्हें काफी प्रभावशाली माना जाता था. साधु 1995-1997 और 1998-2000 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे. 2000-2004 तक गोपालगंज विधानसभा सीट से विधायक रहे. 2004-2009 के दौरान राजद के टिकट पर गोपालगंज लोकसभा सीट से 14वीं लोकसभा के सांसद बने. हालांकि उनका यह उत्थान बंगले की वजह से नहीं, बल्कि लालू-राबड़ी के सहयोग से संभव हुआ.
साधु यादव के लिए भी अशुभ
इस बंगले में रहते ही साधु यादव के दुर्दिन शुरू हुए. राजद की सत्ता जाने का ठीकरा उनके बहन-बहनोई ने उन पर फोड़ा और राबड़ी आवास में उनकी आवाजाही रोक दी गई. राजद में भी उन्हें तरजीह नहीं मिली. आखिरकार उन्होंने दूसरे रास्ते अख्तियार किए. 2009 में वे कांग्रेस का हिस्सा बन गए. पश्चिम चंपारण लोकसभा सीट से चुनाव लड़े. सफलता नहीं मिली. कांग्रेस में वे नहीं टिक पाए. फिर 2015 में अपनी पार्टी बनाई. 2020 के विधानसभा चुनाव में वे बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में गोपालगंज से लड़े, लेकिन इसमें भी उन्हें कामयाबी नहीं मिली. अब वे किस दल के साथ हैं, बता पाना मुश्किल है.
इस बंगले में रहते ही साधु यादव के दुर्दिन शुरू हुए. राजद की सत्ता जाने का ठीकरा उनके बहन-बहनोई ने उन पर फोड़ा और राबड़ी आवास में उनकी आवाजाही रोक दी गई. राजद में भी उन्हें तरजीह नहीं मिली. आखिरकार उन्होंने दूसरे रास्ते अख्तियार किए. 2009 में वे कांग्रेस का हिस्सा बन गए. पश्चिम चंपारण लोकसभा सीट से चुनाव लड़े. सफलता नहीं मिली. कांग्रेस में वे नहीं टिक पाए. फिर 2015 में अपनी पार्टी बनाई. 2020 के विधानसभा चुनाव में वे बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में गोपालगंज से लड़े, लेकिन इसमें भी उन्हें कामयाबी नहीं मिली. अब वे किस दल के साथ हैं, बता पाना मुश्किल है.
बंगला क्यों करना पड़ा खाली
दरअसल राबड़ी देवी को यह बंगला पूर्व मुख्यमंत्रियों के कोटे से मिला था. 2019 में पटना हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला देने की व्यवस्था को असंवैधानिक करार दे दिया. उसके बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला देने की व्यवस्था बंद कर दी गई. पर, राबड़ी देवी के मामले में नियम को इसलिए शिथिल कर पूर्व सीएम के नाते बंगले को उनके नाम कर दिया गया कि वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष थीं. इसीलिए 2005 से ही उनका बंगला परिवार का स्थायी ठिकाना बन गया था.
दरअसल राबड़ी देवी को यह बंगला पूर्व मुख्यमंत्रियों के कोटे से मिला था. 2019 में पटना हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला देने की व्यवस्था को असंवैधानिक करार दे दिया. उसके बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला देने की व्यवस्था बंद कर दी गई. पर, राबड़ी देवी के मामले में नियम को इसलिए शिथिल कर पूर्व सीएम के नाते बंगले को उनके नाम कर दिया गया कि वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष थीं. इसीलिए 2005 से ही उनका बंगला परिवार का स्थायी ठिकाना बन गया था.







