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तेजस्वी यादव का नेता प्रतिपक्ष पद सुरक्षित रहेगा या खतरे में!

UB India News by UB India News
December 26, 2025
in पटना, बिहार
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खैनी-चूना की सियासत पर क्यों उतर आए तेजस्वी !
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नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में एनडीए की सरकार बने महीना भर हो गया. अपार बहुमत की सरकार बनते ही नीतीश ने अपने 7 निश्चय के तीसरे चरण की घोषणा कर अपनी प्राथमिकताएं भी गिना दी हैं. उसके अनुरूप फैसले भी होने लगे हैं. नीतीश ने विकास को गति देने के लिए 3 नए विभाग भी बना दिए हैं. अभी मंत्रियों की संख्या कम है, लेकिन फैसलों पर इसका कोई असर नहीं दिखता. खुद नीतीश की सक्रियता देखते बनती है. जब से उन्होंने 10वीं बार सीएम पद की शपथ लेकर वैश्विक रिकार्ड बनाया है, उनके दौरों और बैठकों का सिलसिला तेज हो गया है. अव्वल तो बिहार में चल रही महत्वाकांक्षी योजनाओं का वे खुद निरीक्षण करने पहुंच जाते हैं. पटना में रहते समीक्षा बैठकें करते हैं. हाल ही में उन्होंने दिल्ली का दौरा भी किया, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. मुलाकात में बात क्या हुईं, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी तो सामने नहीं आई है, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार के विकास के लिए केंद्र से उन्होंने अतिरिक्त मांगी होगी. अप्रैल 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव पर भी चर्चा हुई होगी. एक और बात पर चर्चा होने की संभावना लोग जता रहे हैं. संभावना अगर सच है तो मुलाकात का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु वही होगा.

RJD को अब भी चमत्कार की उम्मीद
चर्चा के जिस महत्वपूर्ण बिंदु की संभावना जताई जा रही है, उस पर आने से पहले आरजेडी नेताओं के बयानों पर गौर करिए. आरजेडी के एक प्रवक्ता हैं मृत्युंजय तिवारी. तिवारी का दावा है कि जेडीयू के 65 विधायक आरजेडी के संपर्क में हैं. मसलन जेडीयू से ये विधायक अलग होने को तैयार हैं. उनका यह बयान जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार के दावे के बाद आया है. नीरज का कहना है कि आरजेडी के 17-18 विधायक जेडीयू के संपर्क में हैं. यह बात वे कई बार कह चुके. यही बात भाजपा विधायक नीरज कुमार बबलू ने भी कही है. इन दावों में कितनी सच्चाई है, यह तो वे ही जानें, लेकिन आरजेडी के विधायकों की संख्या सिर्फ 25 रहने के कारण नीरज कुमार की बात ही अधिक सटीक लगती है. खैर, विधायकों को तोड़ने और जोड़ने की जरूरत फिलवक्त एनडीए को नहीं है. इसलिए कि कुल 243 सीटों में में 202 पर तो एनडीए के ही विधायक हैं. नीतीश कुमार के नाम पर AIMM के 5 विधायकों ने भी सरकार को समर्थन देने की घोषणा कर दी है.

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नीतीश को जोड़-तोड़ की जरूरत ही नहीं
सबसे बड़ी बात कि नीतीश कुमार भाजपा के साथ मजे में हैं. भाजपा ने उन्हें जो मान-सम्मान दिया है, वैसा उन्हें महागठबंधन के साथ रहने पर भी नहीं मिला. चुनाव से पहले यह आशंका जरूर थी कि जेडीयू को कम सीटें आने पर नीतीश कुमार को भाजपा सीएम नहीं बनाएगी. यह आशंका भी इसलिए पैदा हुई थी कि अमित शाह ने एनडीए के सीएम फेस के सवाल पर साफ-साफ बोलने के बजाय इससे पल्ला झाड़ लिया था. उन्होंने कहा था कि सीएम का चुनाव एनडीए विधायक और संसदीय बोर्ड करेंगे. अलबत्ता चुनाव नीतीश के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा. इससे यह मैसेज गया कि भाजपा इस बार नीतीश को किनारे लगाना चाहती है. चुनावी माहौल में विपक्ष ने इसे खूब प्रचारित किया. यह आशंका तब निर्मूल हो गई, जब बिना किसी अवरोध के नीतीश को एनडीए विधायकों ने अपना नेता चुन लिया. अब नीतीश मजे में भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहे हैं.

सीटें कम, फिर भी नीतीश ही CM बने
यहां यह उल्लेख आवश्यक है कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को 2020 की तरह 2025 में भी भाजपा से कम ही सीटों पर सफलता मिली. 2020 में तो भाजपा को 74 सीटों पर जीत मिली थी. जेडीयू 43 पर ही अंटक गया था. 2025 में जेडीयू की स्थिति में जबरदस्त सुधार हुआ, लेकिन पार्टी 85 पर ही रह गई. भाजपा की भी स्थिति सुधरी और उसे जेडीयू से 4 सीटें अधिक मिलीं. यानी 89 सीटें जीतने में भाजपा कामयाब रही. इसके बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार को दोनों बार सहर्ष सीएम बना दिया. नीतीश कुमार भाजपा की इस उदारता को कैसे भूल सकते हैं.

आरजेडी 25 सीटों के बाटम लाइन पर
विपक्षी दलों के महागठबंधन की स्थिति ऐसी हो गई कि कुल जमा 35 सीटों से ही उसे संतोष करना पड़ा है. सबसे अधिक दुर्गति तो महागठबंधन में शामिल कांग्रेस की हुई. भाजपा और मोदी के खिलाफ लोगों को गोलबंद करने के लिए राहुल गांधी की वोट चोरी और SIR के मुद्दे पर बिहार में पखवाड़े भर की यात्रा को मतदाताओं ने खारिज कर दिया. मतदाताओं में मजबूत पकड़ के बावजूद तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन की हवा निकल गई. आरजेडी की सीटें लगातार तीसरी बार विधानसभा में घट गईं. महज 25 सीटें आरजेडी को मिलीं. इससे तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष का दर्जा हासिल करने में कामयाब तो हो गए, लेकिन उनका यह रुतबा बरकरार रहेगा, इसमें संदेह है.

मुकेश सहनी की तो हवा ही निकल गई
सबसे हास्यास्पद स्थिति वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी की रही. 2 मोर्चों पर उन्हें कामयाबी तो मिली, लेकिन नतीजे में वे शून्य पर सिमट गए. यह भी जान लें कि वे 2 मोर्चे कौन थे. पहला तो उन्होंने महागठबंधन की संभावित सरकार में अपने को डेप्युटी सीएम बनाने की घोषणा की जिद ठान ली थी. महागठबंधन में चलते-चलाते इसकी घोषणा भी तेजस्वी को सीएम बनाने के साथ हो गई. अब सीटों की संख्या और विधानसभा क्षेत्र की बात थी. यह भी जैसे-तैसे हो तो गया, लेकिन भारी फजीहत के बाद. कुल मिला कर इस बार चुनाव में महागठबंधन की ऐसी फजीहत हुई कि अब यह बिखरता दिख रहा है.

अब भ्रम फैलाने में लगे हैं राजद नेता
विपक्ष पर झूठ और भ्रम फैलाने के आरोप भाजपा और उसके नेतृत्व वाले एनडीए की पार्टियों के नेता तो लगाते ही रहते हैं. इसे सिर्फ विपक्ष को कमजोर करने की एनडीए की कोशिश कह कर खारिज नहीं किया जा सकता. बिहार में महागठबंधन का नेतृत्व करने वाले आरजेडी के नेता अब भी भ्रम फैलाने से बाज नहीं आ रहे. कभी वे जेडीयू के 65 विधायकों के टूटने का दावा करते हैं तो कभी नीतीश के पाला बदल का हवाला देकर ‘खेला’ होने के इशारे कर रहे हैं. आरजेडी में 1-2 मामलों को छोड़ कर अधिकतर फैसले लेने का हक पाकर नए आलाकमान बने तेजस्वी तो शपथ लेने के बाद से ही सप्तनीक सैर पर निकल गए थे. इसलिए मृत्युंजय तिवारी, एजाज अहमद जैसे प्रवक्ता और भाई वीरेंद्र जैसे दूसरे-तीसरे स्तर के नेताओं ने कमान संभाल रखी है. खेला होने के बयान के साथ वे गणित भी समझाते हैं. बताते हैं कि जेडीयू के 85, आरजेडी के 25, कांग्रेस के 6. आईआईपी के 1, बसपा 1, AIMIM के 5 और वाम विधायकों को मिला कर सरकार बनाने के लिए जरूरी 122 के आंकड़े से संख्या अधिक ही हो जाती है. नीतीश चूंकि पहले जोड़-तोड़ से ऐसा कर चुके हैं, इसलिए एकबारगी तो इस पर किसी को कुछ देर के लिए भ्रम हो ही सकता है.

पर, नीतीश क्यों छोड़ेंगे BJP का साथ
पर, नीतीश कुमार क्यों इस जोड़-तोड़ के लफड़े में पड़ेंगे? नीतीश की अब उम्र भी हो गई. उम्रजनित बीमारियां भी स्वाभाविक और संभव हैं. उन्हें तो अब अभिभावक की भूमिका में रहना है. काम करने वाले सम्राट चौधरी जैसे भरोसेमंद व्यक्ति भी उनके साथ हैं. गृह विभाग सम्राट के हवाले कर और साथ मिले दो काम करने वाले डेप्युटी सीएम के सहारे वे मजे से मानिटरिंग करते रहें. गलतियों पर रोकें-टोकें. यह भी नजर रखें कि कोई उनकी मर्जी के खिलाफ फैसला न ले. यानी बीच-बीच में यह एहसास कराते रहें कि कुंजी मेरे पास है. उनकी सहयोगी भाजपा भी अब समझदार हो गई है. अभी उसे अपने बूते खड़ा होने में संदेह है. हालांकि नए कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बिहार में भाजपा के लिए ‘पंचायत से पार्लियामेंट’ की जो लाइन तय की है, उससे भाजपा के अपने दम पर खड़ा होने की उम्मीद जगी है. भाजपा जानती है कि नीतीश के साथ रहने पर परस्पर फायदा है. उसकी खुद की सीटें आल टाइम हाई यानी 89 पर पहुंच गई हैं. भाजपा की बढ़ती ताकत का नीतीश को भी एहसास है. 43 से जेडीयू की सीटें अगर 85 हो गईं तो इसके पीछे अकेले नीतीश की ही नहीं, बल्कि भाजपा की भी ताकत थी. इसलिए वे लंबे समय तक आजमाए साथी से अब अलग होने की सोच भी नहीं सकते.

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