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चुनाव से पहले बदल रहा है बंगाल का राजनीतिक माहौल !

UB India News by UB India News
December 25, 2025
in खास खबर, पश्चिम बंगाल, संपादकीय
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चुनाव से पहले बदल रहा है बंगाल का राजनीतिक माहौल !
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर आज कोई एक समुदाय सबसे अधिक बेचैन, सबसे ज्यादा चर्चा में और सबसे अहम निर्णायक भूमिका में है, तो वह है मतुआ समुदाय. 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतुआ वोट बैंक को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है. यह अब केवल सत्ता की नहीं, बल्कि पहचान, नागरिकता, वोट के अधिकार और सम्मान की लड़ाई बन चुकी है.

20 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नदिया जिले के रानाघाट में मतुआ बहुल इलाके का दौरा बेहद अहम माना जा रहा था. मतुआ समुदाय को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री सीधे उनकी सबसे बड़ी चिंता SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) और वोट कटने के डर पर बात करेंगे, लेकिन खराब मौसम के कारण हेलिकॉप्टर की लैंडिंग नहीं हो सकी और पीएम को वापस लौटना पड़ा, पर जब वर्चुअल माध्यम से उन्होंने वहां के लोगों को संबोधित किया तो SIR के मुद्दे पर उनकी चुप्पी ने मतुआ समुदाय के एक हिस्से में चिंता पैदा कर दी. यहीं से मतुआ राजनीति में एक तेज हलचल आ गई और जिसकी वजह से सोच समझकर शुरू की गई बीजेपी की चुनावी कैंपेन में एक अस्थायी रुकावट आ गई.

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16 दिसंबर को चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का ड्राफ्ट जारी किया. इसके आंकड़े चौंकाने वाले थे. इसमें 58 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए थे जिससे वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई है. SIR की इस ड्राफ्ट सूची ने मतुआ समुदाय में डर का माहौल पैदा कर दिया है.
मतुआ समुदाय बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए स्विंग वोट के रूप में काम करते हैं. राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से 45 विधानसभा सीटों पर उनका वोट निर्णायक होता है. राज्य के कई जिलों में उनकी मौजूदगी है, जैसे- नादिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, पूर्व बर्धमान, दक्षिण बंगाल में हावड़ा, और उत्तर बंगाल में कूच बिहार और मालदा.

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कौन हैं मतुआ समुदाय? उनका इतिहास और उनकी पहचान क्या है?

मतुआ समुदाय भारत में एक प्रमुख अनुसूचित जाति है, जिसमें मुख्य रूप से नामशूद्र शामिल हैं जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश से यहां आए हैं. पश्चिम बंगाल में मौजूद अनुसूचित जाति की आबादी में राजबंशियों (18.4 प्रतिशत) के बाद मतुआ (17.4 प्रतिशत) का स्थान है. पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति में करीब 60 उपजातियां आती हैं, राजबंशियों और मतुआ के बाद तीसरी सबसे बड़ी उपजाति बागड़ी (14.9 प्रतिशत) है.

मतुआ समुदाय को ब्राह्मण विरोधी माना जाता है जो 1870 के दशक में पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में निचली जाति नामशूद्रों के बीच उभरा था. नामशूद्रों का असली नाम चांडाल था. 19वीं सदी में हरिचंद ठाकुर ने इसकी स्थापना की. यह एक ब्राह्मणवाद-विरोधी, जाति-विरोधी समुदाय के रूप में उभरा. समानता, श्रम और आत्मसम्मान इसकी आत्मा थी. समय के साथ, सांप्रदायिक और राजनीतिक दबावों में यह समुदाय हिंदू पहचान में ढलता गया, लेकिन इसकी जड़ों में आज भी जातिगत उत्पीड़न और विस्थापन की पीड़ा है.

मतुआ समुदाय के लोग अलग-अलग चरणों में बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आए हैं- विभाजन, 1971 के युद्ध और हाल ही में बांग्लादेश में सांप्रदायिक अशांति के दौरान इनका भारत में आना हुआ है. बीजेपी के लिए, मतुआ एक धार्मिक उत्पीड़न से त्रस्त हो कर आए हुए हिंदू अल्पसंख्यक शरणार्थी हैं, उन मुसलमानों के विपरीत जो वहां से अवैध ‘घुसपैठिए’ के रूप में आए गए बताए जाते हैं.

मतुआ लोगों में SIR को लेकर नाराजगी क्यों है?

बांग्लादेश की सीमा से लगे उत्तर 24 परगना और नादिया जिलों के विधानसभा क्षेत्रों में मतुआ मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को ‘अनमैप्ड’ चिह्नित किया गया है, जिससे उनके मतदान के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इस वजह से टीएमसी और बीजेपी के बीच राजनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है. SIR से जुड़ी अनिश्चितता के कारण मतुआ समुदाय में गुस्सा बढ़ गया है, जिससे 2026 के चुनावों से कुछ महीने पहले बीजेपी के लिए समर्थन कम होने का खतरा मंडरा रहा है.

चुनाव आयोग के मुताबिक, 2002 की मतदाता सूची को मतदाताओं के वेरिफिकेशन के लिए एक टेम्पलेट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. जिनके नाम, या उनके पूर्वजों (माता-पिता) के नाम इस सूची में नहीं पाए जा रहे हैं, उन्हें SIR की ड्राफ्ट सूची में अनमैप्ड दिखाया जा रहा है. इसकी वजह से कई लोगों के पारिवारिक संबंध या ‘लिंकेज’ स्थापित करना संभव नहीं हो सका है. ड्रॉफ्ट के जारी होने के बाद अब नागरिकता साबित करने के लिए होने वाली सुनवाई में 1950 या 1971 से पहले के डॉक्यूमेंट्स या 2002 से पहले के रहने का सबूत जमा करने को लेकर असमंजस की स्थिति है.

आंकड़े बताते हैं कि मतुआ लोगों का गढ़ माने जाने वाले विधानसभा क्षेत्रों में ‘अनमैप्ड’ वोटरों का प्रतिशत चिंताजनक है. ड्राफ्ट लिस्ट के अनुसार, गाइघाटा में 14.5 प्रतिशत, हाबरा में 13.6 प्रतिशत और बागदा में 12.7 प्रतिशत वोटर मैप नहीं किए जा सके. ये सभी सीमावर्ती इलाके हैं. नदिया जिले के कल्याणी में यह दर 11.9 प्रतिशत, रानाघाट उत्तर-पूर्व में 11.2 प्रतिशत और बनगांव उत्तर में 11.3 प्रतिशत है. इनके अलावा, कृष्णगंज, रानाघाट उत्तर-पश्चिम और दक्षिण, चकदाहा, शांतिपुर और हरिंघटा में 7 से 10 प्रतिशत से अधिक मतदाता भी अनिश्चितता की इस सूची में हैं.

ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के अनुसार, राज्य में करीब 1.8 करोड़ मतुआ मतदाता हैं. वैसे तो उनकी मौजूदगी करीब 100 विधानसभा सीटों पर है, पर 21 सीटों पर मतुआ वोट जीत या हार तय करने वाला फैक्टर हैं. जाहिर है, SIR की ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है.

केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के बनगांव सांसद शांतनु ठाकुर

इस स्थिति पर चिंता जताते हुए केंद्रीय मंत्री और बनगांव से बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर कहा कि केंद्र सरकार को तुरंत CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम) सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए. उनके अनुसार, अगर CAA लागू नहीं हुआ तो स्थिति बहुत खराब हो सकती है.
TMC ने भी पलटवार किया है. तृणमूल सांसद ममता बाला ठाकुर ने कहा कि वे मतुआ समुदाय को बिना शर्त नागरिकता देने की अपनी मांग पर कायम हैं. TMC प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती का कहना है कि BJP ने SIR और CAA की इस जटिल प्रक्रिया से असल में अपना ही वोट बैंक खतरे में डाल दिया है.

फिलहाल, हजारों मतुआ परिवारों ने CAA के ज़रिए नागरिकता के लिए अपने आवेदन जमा कर दिए हैं, वो सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं. इस जटिल कानूनी प्रक्रिया के जरिए उनके वोटिंग अधिकारों की रक्षा करना मतुआ समुदाय के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, और यह तय नहीं है कि आने वाले चुनावों में मतुआ किस तरफ जाएंगे.

CAA मतुआ-नामशूद्र समुदाय के लिए उम्मीद भी और डर भी

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और इससे जुड़े नियमों को लेकर चल रही मौजूदा बहस ने मतुआ-नामशूद्र समुदाय में उम्मीद जगा दी है. धार्मिक रूप से उत्पीड़ित हिंदुओं (पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों) के लिए लाइफलाइन के रूप में प्रचारित CAA को मतुआ समुदाय के लिए वरदान बताया गया है. फिर भी, यह वादा समुदाय के ऐतिहासिक संघर्षों, खास तौर पर विभाजन के बाद, के बिल्कुल विपरीत है, जब बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के बीच कई नामशूद्र रिफ्यूजी के रूप में फंसे रह गए थे.

1947 में भारत का विभाजन वो ऐतिहास पल था जब अनगिनत नामशूद्रों ने खुद को सीमा के उस पार पाया. पूर्वी पाकिस्तान (1971 से बांग्लादेश) से बड़ी संख्या में शरणार्थियों का पश्चिम बंगाल में आना हुआ. इससे सांप्रदायिक ताना-बाना बदल गया, जो नामशूद्रों के विस्थापन और पहचान की कहानी में समा गई, जिसकी गूंज आज भी सुनाई पड़ती है. पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से आए ऊंची जातियों के प्रवासियों को जल्दी ही शुरुआती शरण और जगह मिल गई, वहीं निचली जाति के नामशूद्र बंटवारे के बाद बने सख्त नागरिकता कानूनों की वजह से हाशिए पर रह गए, इनमें अधिकांश किसान और मजदूर थे.

इस तरह मतुआ वोटों के लिए टीएमसी का संघर्ष विरोधाभासों से भरा हो जाता है. वर्षों से, यह समुदाय नागरिकता कानूनों की दया पर निर्भर रहा है, जो उनके द्वारा सहन की गई हिंसा और विस्थापन की विरासत का हिसाब देने में विफल रहे हैं. जबकि कई मतुआ मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेजों के जरिए वास्तविक नागरिकता हासिल करने में कामयाब रहे, लेकिन उन पर भी CAA लागू होने की चिंता की एक परत जुड़ गई है. बीजेपी ने पुरानी यादों के सहारे राजनीति के माध्यम से इस समुदाय को धार्मिक उत्पीड़न का शिकार बताते हुए समर्थन जुटाने की कोशिश की है, जो इस समुदाय के ऐतिहासिक बैकग्राउंड में सही लगती है लेकिन साथ ही शक भी पैदा करती है.

बनगांव में मतुआ समुदाय के लोगों के साथ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी मतुआ समर्थन कैसे खींचा?

मतुआ के बीच समर्थन जुटाने की TMC और BJP की कहानियां एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. ममता बनर्जी के नेतृत्व में, TMC ने मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए हरिचंद-गुरुचंद यूनिवर्सिटी की स्थापना और समुदाय के नेताओं को आगे बढ़ाने जैसे सांकेतिक कदम उठाए हैं. हालांकि, यह देखते हुए कि TMC पश्चिम बंगाल की एक क्षेत्रीय पार्टी है और दिल्ली की सत्ता में मौजूद नहीं है, नागरिकता के मुख्य मुद्दे को हल करने में उसकी विफलता ने BJP के लिए दरवाजा खुला छोड़ दिया है.

केंद्र की सत्ता में होने के कारण बीजेपी की असरकारी राजनीतिक रणनीति ने मतुआ समुदाय की पहचान को नया रूप दिया है, उन्होंने उनसे खुद को जातिगत उत्पीड़ित देखने की बजाय ‘विस्थापित हिंदू’ के रूप में देखने का आग्रह किया है.

2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में BJP की जीत में मतुआ समुदाय ने अहम भूमिका निभाई थी. तब CAA के वादे ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से आए मतुआ शरणार्थियों में उम्मीद जगाई थी. वह उम्मीद और BJP पर भरोसा बहुत हद तक 2021 के विधानसभा चुनावों में भी कायम रहा. नदिया, उत्तर और दक्षिण 24-परगना और उत्तर बंगाल के बड़े हिस्सों में 20 विधानसभा सीटें हैं, जहां मतुआ समुदाय का दबदबा है.

फिर भी, जैसे-जैसे 2026 के चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो रही है, BJP की पकड़ कमजोर होती दिख रही है. मतुआ समुदाय का समर्थन पक्का करने के मकसद से जारी किए गए नागरिकता संशोधन नियमों (CAR) के नोटिफिकेशन ने नई मुश्किलें को जन्म दिया है. आवेदन प्रक्रिया से जुड़ी बाधाएं परेशान करने वाली कमियों को उजागर करती दिखाई देती हैं; कई आवेदकों के पास अपने पहले के देशों के अहम दस्तावेज नहीं हैं और बांग्लादेश में अपने अतीत के बारे में बताने से होने वाले कानूनी नतीजों का डर उन्हें सता रहा है.

टीएमसी की राज्यसभा सांसद ममता बाला ठाकुर

कुछ मतुआ लोगों को चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के बीच मताधिकार से वंचित होने का डर है.

जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बीच मतुआ आबादी के एक हिस्से को वोट देने का अधिकार छिन जाने का डर है. खबरों के मुताबिक, कथित तौर पर कई मतुआ 2002 की मतदाता सूची से अपना या अपने माता-पिता का मेल करवा पाने में असमर्थ हैं.

TMC नेताओं ने मतुआ समुदाय के वोटिंग अधिकार खोने की आशंका को सीधे तौर पर संबोधित करने में मोदी की विफलता के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे करना शुरू कर दिया है. रानाघाट के दौरे के बाद पीएम मोदी की कोलकाता में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मतुआ समुदाया की TMC सांसद ममता बाला ठाकुर ने कहा, “मतुआ लोगों को उम्मीद थी कि मोदी जी रानाघाट दौरे के दौरान उन्हें आश्वस्त करेंगे. पर मतुआ लोगों के बीच SIR प्रक्रिया को लेकर डर और प्रधानमंत्री मोदी की उसपर चुप्पी ने उनकी चिंता, डर और गुस्से को और बढ़ा दिया है.”

टीएमसी सांसद ममता बाला ठाकुर ने ये भी कहा कि, “SIR प्रक्रिया के बाद मतुआ समुदाय अनिश्चितता में जी रहा है; समुदाय के करीब 95 फीसद सदस्यों के पास 2026 में वोट देने के लिए चुनाव आयोग के जरूरी 11 डॉक्यूमेंट्स में से एक भी नहीं है.”

मतुआ वोट बैंक की लड़ाई

यह वैचारिक विभाजन अहम है क्योंकि यही मतुआ समुदाय के बीच दोनों पार्टियों की छवि बनाता है. जहां बीजेपी खुद को हिंदू पहचान के रक्षक के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं टीएमसी का समावेशिता और सामुदायिक कल्याण पर जोर है, इससे मतुआ समुदाय एक उलझन वाले राजनीतिक माहौल में खुद को पा रहा है.

इस बदलते परिदृश्य में, मतुआ वोट बैंक केवल संख्या बल नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक चीजों का प्रतिनिधित्व करता है. यह भारतीय लोकतंत्र की गंभीर चर्चा में अपनी पहचान, गरिमा और मान्यता के संघर्ष का भी प्रतिनिधित्व है. जैसे-जैसे 2026 नजदीक आएगा, बीजेपी और टीएमसी के बीच मुकाबला न केवल उनकी चुनावी किस्मत तय करेगा बल्कि उस कहानी को भी आकार देगा जो बताती है कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समृद्धि से भरे क्षेत्र में होने का क्या मतलब है.

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