बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने राज्य की राजनीति में कई नए रिकॉर्ड बनाए हैं। आज़ादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं ने हिस्सा लिया, जिससे मतदान प्रतिशत ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया। अब सरकार बनने के बाद विधानसभा सत्र की कार्यवाही 1 दिसंबर से शुरू होगी। इस बीच, एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि इस बार सदन में एक भी निर्दलीय विधायक नहीं पहुंच सका, यह स्थिति पिछले 35 साल में पहली बार बनी है।
वोटर ने महागठबधंन और एनडीए के प्रत्याशियों पर ही दिखाया था भरोसा
इस बार के विधानसभा चुनाव को देखें तो बिहार का वोटर अब दो मुख्य गठबंधनों (NDA और महागठबंधन) के बीच पूरी तरह से बंटा रहा। इसका सीधा असर ‘तीसरी ताकत’ (अन्य दल और निर्दलीय) पर पड़ा। इससे इस बार किसी निर्दलीय की विधानसभा में एंट्री नहीं हो सकी। हालांकि कुछ निर्दलीय विधायकों ने चुनौती जरूर पेश की।
चुनाव में केवल चार निर्दलीय उम्मीदवारों ने छोड़ी छाप
बिहार चुनाव में चार निर्दलीय उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे। इनमें दो निर्दलीय उम्मीदवारों को महागठबंधन ने समर्थन दे दिया था। आरजेडी की बागी रितु जायसवाल (65,455 वोट) और जेडीयू के फिरोज अहमद (50,029 वोट) ने अपनी-अपनी सीटों पर राजद और सीपीआई-माले के उम्मीदवारों को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। जबकि महागठंधन समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार गणेश भारती ने 49,244 वोट हासिल किए। वहीं रविशंकर पासवान को 57,538 वोट मिले।
बिहार विधानसभा में निर्दलीय विधायकों का लगातार गिरता ग्राफ
बिहार विधानसभा में एक समय निर्दलीय विधायकों की संख्या भी 30 तक थी। बात उस समय की है, जब लालू यादव ने 1990 में बिहार की कमान संभाली थी। उस समय निर्दलीय विधायकों की संख्या 30 हुआ करती थी। यह संख्या 1995 में घटकर 11 रह गई। लेकिन 2000 में बिहार और झारखंड अलग-अलग हुए, तब हुए चुनाव में फिर से 20 निर्दलीय विधायक जीतकर आए।
2020 में जो इकलौते निर्दलीय सुमित सिंह जीते थे, उन्हें नीतीश कुमार ने मंत्री बनाया था। इस बार सुमित सिंह ने जेडीयू के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए। इस तरह बिहार की राजनीति में निर्दलीय विधायकों का सफर शून्य पर आकर रुक गया है।







