बिहार विधानसभा के चुनाव के पहले चरण में हुए 65.8 फीसदी मतदान को लेकर सभी लोग कन्फ्यूज हैं. सत्ताधारी एनडीए हो या विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन, सभी बंपर मतदान को अपने-अपने हक में बता रहे हैं. जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर भी इसे अपने हित में मान रहे हैं. विश्लेषकों की परेशानी यह है कि वे किस मानक पर इसका अनुमान बताएं कि बंपर मतदान किसका खेल बनाएगा और किसका बिगाड़ेगा. अभी तक यह आम धारणा रही है कि जब ज्यादा मतदान होता है तो इसे बदलाव का संकेत माना जाता है. बिहार में विश्लेषकों की उलझन यह है कि यहां इस धारणा के उलट भी परिणाम आए हैं.
1990 से 2000 तक खूब बढ़े वोटिंग प्रतिशत
आजादी मिलने के बाद बिहार में पहली बार विधानसभा के वोट 1952 में पड़े. तब से लेकर 1977 तक धीमी गति से मतदान में वृद्धि होती रही. 1977 में 58.40 प्रतिशत वोट पड़े थे. पर, 1980 के मध्यावधि चुनाव में 56.70 प्रतिशत ही वोटिंग हुई. यहां से फिर मतदान में वृद्धि का सिलसिला शुरू हुआ और 1990 में 52.10 प्रतिशत पर पहुंच गया. उसके बाद लगातार 1995 और 2000 में 60 प्रतिशत से अधिक वोटिंग होती रही. पहली बार 1990 में जब 62.10 प्रतिशत वोटिंग का रिकॉर्ड बना तो बिहार में लालू यादव की सत्ता आई. यहां तो ठीक था कि मतदान बढ़ने पर सत्ता बदल गई, लेकिन उसके बाद भी वर्ष 2000 तक मतदान का प्रतिशत बढ़ता रहा, पर लालू की सत्ता सलामत रही. यानी अधिक मतदान से सत्ता बदलने का मानक बदल गया.
मतदान बढ़ा, पर सत्ता बनी रही
लालू प्रसाद को अधिक मतदान के कारण 1990 में सत्ता मिली. 1995 और 2000 में भी वोटिंग हुई, लेकिन लालू यादव की सत्ता को आंच नहीं आई. चारा घोटाले में जेल में रहने के कारण आरजेडी आखिरी बार वर्ष 2000 में ही सत्ता में आई थी. उस साल चुनाव में 62.50 प्रतिशत वोट पड़े थे, जो उस वक्त तक वोटिंग का रिकॉर्ड था. उसके बाद के चुनावों में 2020 तक मतदान का आंकड़ा 60 प्रतिशत से नीचे ही रहा. यानी मतदान के बढ़ने के बावजूद 2 टर्म लालू परिवार सत्ता में बने रहे. राबड़ी देवी आरजेडी की आखिरी सीएम थीं. इस तरह अधिक वोटिंग से सत्ता बदलने की अवधारणा बिहार में ध्वस्त हो गई.
कम वोटिंग, फिर भी सत्ता बदली
ठीक इसी तरह नीतीश कुमार की सत्ता का आना भी एक नई अवधारणा को जन्म दे गया. 2005 के फऱवरी में जब चुनाव हुए तो 58.20 प्रतिशत वोट पड़े थे. यह आंकड़ा 2000 के चुनाव के 62.50 प्रतिशत के आंकड़े से कम 58.20 प्रतिशत था. उसी साल अक्टूबर में जब चुनाव हुए तो 57.60 प्रतिशत ही वोट पड़े, जो फरवरी में हुए 56.20 प्रतिशत मतदान कम था. इसके बावजूद नीतीश कुमार ने भाजपा के सहयोग से सरकार बना ली. आश्चर्य की बात यह कि उसके बाद मतदान का प्रतिशत घटता गया. 2010 में 52.70 प्रतिशत ही वोट पड़े. 2020 तक मतदान का आंकड़ा 60 प्रतिशत के नीचे ही रहा.
अधिक मतदान ने सबको चौंकाया
इस बार 64 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ है, जो अब तक रिकॉर्ड है. सियासी गठबंधनों के नेता इसे अपने-अपने हक में मान रहे हैं. महागठबंधन के नेता इसे तेजस्वी यादव की ओर से की गई आकर्षक घोषणाओं का असर मान रहे हैं तो एनडीए के नेता इसे नीतीश कुमार के विकास कार्यों पर लोगों का बढ़ता भरोसा मान रहे हैं. महज 13 महीने पहले बनी जन सुराज पार्टी भी इसे बदलाव का संकेत मान रही है. प्रशांत किशोर का कहना है कि लोगों ने बदलाव का मूड बना लिया है और इसीलिए मतदान बढ़ा है. लोग विकल्प के तौर पर जन सुराज को देख रहे हैं. उनका दावा है कि वोटिंग में बढ़ोतरी का सीधा अर्थ यह है कि बढ़े वोट जन सुराज पार्टी के खाते में गिर रहे हैं.
क्या इन वजहों से बढ़ी है वोटिंग
मतदान में वृद्धि की वजहों की पड़ताल करें तो कई बातें सामने आती हैं. पहली यह कि नीतीश कुमार ने जिस तरह 125 यूनिट बिजली फ्री की, सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाई, महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपये भेजे, 3 महीने बाद 2 लाख और देने की उम्मीद जगाई और एक करोड़ नौकरी-रोजगार का वादा किया, उससे उत्साहित होकर महिला वोटरों के साथ नीतीश की योजनाओं का लाभ लेने वाले दूसरे लोगों ने बढ़-चढ़ कर मतदान किया.
महागठबंधन के लोग कहते हैं कि बढ़ा मतदान तेजस्वी यादव की घोषणाओं का कमाल है. तेजस्वी ने करीब 2.75 करोड़ परिवारों में सरकारी नौकरी का वादा किया है. माई-बहिन मान योजना के तहत 2500 देने की घोषणा की है. इतना ही नहीं, उन्होंने 14 जनवरी तक हर महिला के खाते में एकमुश्त 30 हजार रुपये भेजने का प्रण लिया है. इससे ही मतदाताओं में उत्साह जागा है. जन सुराज के प्रशांत किशोर का दावा है कि उन्होंने अब तक जनता को जगाने का जो प्रयास किया है, बढ़ा मतदान उसी का परिणाम है.
कहीं SIR का इफेक्ट तो नहीं है
चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) का एनडीए ने जहां समर्थन किया है, वहीं महागठबंधन इसके विरोध में खड़ा है. चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से 65 लाख डुप्लीकेट, मृत या फर्जी नाम हटाए हैं. इससे वास्तविक मतदाताओं का प्रतिशत बढ़ा है. विपक्ष ने इसे वोट चोरी का नाम देकर खूब बावेला मचाया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तो इसे लेकर 15 दिनों तक बिहार की यात्रा भी की.
महागठबंधन के तमाम नेता उनके साथ SIR के विरोध में घूमते रहे. विपक्ष इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गया, लेकिन सीर्ष अदालत ने इस पर रोक नहीं लगाई. इस बीच एनडीए के नेता यह प्रचारित करते रहे कि इससे घुसपैठियों के नाम भी मतदाता सूची से हटाए जा सकेंगे. महागठबंधन घुसपैठियों के समर्थन में खड़ा है. एनडीए का यह प्रचार एक खास तबके के मतदाताओं के ध्रुवीकरण का कारण भी हो सकता है, वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा देकर महागठबंधन ने भी अपने समर्थकों को गोलबंद किया.
संभव है कि SIR के समर्थन और विरोध के कारण मतदाता अधिक निकले हों. पर, मतदान बढ़ने की असल वजह दूसरी है. मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हट जाने से वास्तविक मतदाताओं के वोट ही मतदान के आंकड़े का रिकॉर्ड बनाने में मददगार साबित हुए हैं.