पटना. बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले महागठबंधन में लगातार हो रहे उलटफेर ने नई राजनीतिक तस्वीर बना दी है. जहां कुछ फैसले आखिरी वक्त में कन्फ्यूजन खत्म करने वाले लगते हैं, वहीं कुछ घटनाएं यह सवाल भी खड़ा कर रही हैं कि क्या महागठबंधन की एकजुटता सिर्फ चुनावी मजबूरी है या असल रणनीति. जहानाबाद की सीट इसका ताजा उदाहरण है, क्योंकि महागठबंधन प्रत्याशी राहुल शर्मा को पशुपति पारस गुट के उम्मीदवार प्रमोद यादव ने अपना समर्थन देने की घोषणा की है. दरअसल, यहां RLJP (पशुपति पारस गुट) के प्रमोद यादव के मैदान में आने से वोट स्प्लिट का खतरा था, लेकिन पहले चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन 4 नवंबर को प्रमोद यादव ने नाम वापस लेकर राहुल शर्मा को समर्थन दे दिया. यह कदम साफ तौर पर RJD के लिए राहत की खबर है, क्योंकि वोट बंटवारे का खतरा टल गया और पारस गुट का एक हिस्सा भी लालटेन के साथ आ गया.
त्याग की राजनीति या रणनीति?
जानकारों का मानना है कि प्रमोद यादव का यह निर्णय महागठबंधन में कन्फ्यूजन दूर करने की कवायद है. जानकार कहते हैं, पहले यह सीट महागठबंधन के लिए चुनौती बन रही थी, लेकिन अब राहुल शर्मा के पक्ष में माहौल साफ होता हुआ लग रहा है. कहा जा सकता है कि RJD ने आखिरी वक्त में एक झटका टाल दिया. हालांकि, अंत-अंत कायम रही कन्फ्यूजन की स्थिति के बाद अब यह फैसला राजद के लिए कितना फायदेमंद होगा यह तो आने वाला समय बताएगा. लेकिन, इतना तो तय लग रहा है कि महागठबंधन के भीतर कन्फ्यूजन बने रहने के बीच और कन्फ्यूजन दूर करने की कोशिशें भी जारी हैं.
बता दें कि ठीक ऐसा ही दृश्य दरभंगा की गौड़ा बौराम सीट पर भी दिखा. यहां RJD और VIP (मुकेश सहनी की पार्टी) के बीच फ्रेंडली फाइट जैसी स्थिति थी. VIP के संतोष सहनी (मुकेश सहनी के भाई) और RJD के अफजल अली खान दोनों लालटेन सिंबल पर उतर आए थे. तेजस्वी यादव ने 30 अक्टूबर को संतोष सहनी के लिए समर्थन की अपील की थी. इसके बाद तस्वीर साफ होती लगी. फिर 4 नवंबर को तेजस्वी यादव ने संतोष सहनी को समर्थन की दोबारा अपील की, लेकिन 4 नवंबर को मुकेश सहनी ने खुद अपने भाई का नाम वापस लेकर अफजल को समर्थन देने का ऐलान कर दिया. मुकेश सहनी ने इसे महागठबंधन की एकता के लिए त्याग बताया. लेकिन, राजनीति के जानकार भी मुकेश सहनी के इस कदम से हैरान रह गए कि अचानक ऐसा फैसला क्यों?
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मुकेश सहनी की ओर से कहा जा रहा है कि इस फैसले ने एक ओर निषाद-मल्लाह वोट के साथ ही महागठबंधन के समर्थक वर्ग को एकजुट किया है. वहीं, जानकार यह भी मानते हैं कि इस फैसले से VIP और RJD के बीच चल रही सीट-शेयरिंग की कड़वाहट को भी कुछ हद तक कम किया गया है. लेकिन, इसकी अंदरूनी कहानी यह है कि यह एक तरह का नुकसान-से-बचाव कदम है. इन दोनों घटनाओं से यह साफ है कि महागठबंधन ने आखिरी वक्त में अपने अंदरूनी मतभेदों को संभालने की कोशिश की है. सीट शेयरिंग पर विवाद के बावजूद, अब एक-दूसरे के प्रत्याशियों को समर्थन देने का पैटर्न दिखने लगा है. इसका लाभ सीधे RJD को मिल रहा है जो पूरे गठबंधन की केंद्रीय शक्ति बनकर उभरी है.
महागठबंधन में कन्फ्यूजन मैनेजमेंट
हालांकि, NDA ने इसे ‘डर और बिखराव की राजनीति’ करार दिया है. भाजपा नेताओं का कहना है कि त्याग का तमाशा किया जा रहा है, लेकिन जनता सब देख रही है. भाजपा-जेडीयू खेमे का मानना है कि ये घटनाएं महागठबंधन की मजबूरी को दिखाती है न कि एकता को. बहरहाल, कुल मिलाकर पहले चरण के मतदान से ठीक पहले महागठबंधन ने अपने भीतर के कई पेच सुलझाए हैं. जहानाबाद और गौड़ा बौराम जैसे उदाहरण बताते हैं कि कन्फ्यूजन कम हुआ है, लेकिन अंत-अंत तक बनी रही असमंजस की स्थिति के कारण यह स्थायी समाधान नहीं है. जानकारों की नजर में फिलहाल RJD की रणनीति काम करती दिख रही है, पर असली परीक्षा 6 नवंबर को डाले गए मतों से 14 नवंबर को निकलने वाले नतीजों में होगी, जहां पता चलेगा कि ये एकजुटता वोटों में तब्दील हुई या सिर्फ बयानबाजियों में.
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