भोजपुरी एक्टर पवन सिंह की बीजेपी में री-एंट्री हो गई है. पवन सिंह की वापसी में क्या पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता आरके सिंह की चेतावनी ने बड़ा रोल अदा किया या फिर प्रशांत किशोर का भ्रष्टाचार पर ‘प्रहार’ काम कर गया? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हाल ही में डेहरी-ऑन-सोन का दौरा पवन सिंह की बीजेपी में री-एंट्री की कहानी तैयार कर गया. मंगलवार को जैसे ही पवन सिंह विनोद तावड़े के साथ उपेंद्र कुशवाहा के आवास पर पहुंचे, बिहार की राजनीति में चर्चा शुरू हो गई कि क्या पवन सिंह का जादू चलेगा? खासकर डेहरी-ऑन-सोन की 24 सीटों पर राजपूत वोट बैंक को बांध कर रख पाएंगे पवन सिंह? क्या डेहरी-ऑन-सोन में इस बार एनडीए के किले को बचाने की जिम्मेदारी पवन सिंह को मिलने वाली है?
भोजपुरी स्टार पवन सिंह की एनडीए में री- एंट्री ने बिहार चुनाव के समीकरणों को एक नया मोड़ दे दिया है. पिछले कुछ दिनों में पवन सिंह की राजनीतिक मुलाकातें संकेत दे रही थीं कि वह जल्द ही अपनी दूसरी राजनीतिक पारी शुरू करने जा रहे हैं. इसमें उन्होंने सीधे बीजेपी के बिहार प्रभारी विनोद तावड़े से मुलाकात की और फिर उपेंद्र कुशवाहा जैसे एनडीए के सहयोगी नेता से मिले. पवन सिंह कुछ दिन पहले बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह से भी मिल चुके हैं. पिछले कुछ दिनों से आरके सिंह की बगावत ने भी पवन सिंह को बीजेपी में दोबारा आने का रास्ता तय कर दिया था. हालांकि, अभी स्पष्ट नहीं हुआ है कि वह चुनाव लड़ेंगे या फिर डेहरी-ऑन-सोन के सभी सीटों पर अहम रोल अदा करेंगे.
पवन सिंह क्या लड़ेंगे चुनाव?
जानकार बताते हैं कि बीजेपी का यह दांव दोहरे खतरे से निपटने की रणनीति मानी जा रही है. पिछले दिनों आरा के पूर्व सांसद आरके सिंह ने अपने बागी तेवर से बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी. उनका बागी तेवर और पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी लड़ाई ने आरा सीट पर अनिश्चितता पैदा कर दी थी. पवन सिंह जो उसी राजपूत समुदाय से आते हैं और आरा के रहने वाले हैं. ऐसे में बीजेपी ने न सिर्फ आरके सिंह के विकल्प को मजबूत किया है, बल्कि राजपूतों के पारंपरिक वोट बैंक में एक स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी उनके साथ है.
प्रशांत किशोर लगातार भ्रष्टाचार और सुशासन की विफलता को मुद्दा बनाकर नीतीश सरकार को घेर रहे हैं. ऐसे में पवन सिंह जैसे सेलिब्रिटी को मैदान में उतारकर बीजेपी चुनाव के नैरेटिव को भ्रष्टाचार से हटाकर युवा अपील, जातिगत समीकरण और मनोरंजन की तरफ मोड़ना चाहती है. पवन सिंह का क्रेज युवा वोटरों और महिलाओं के बीच पीके के गंभीर राजनीतिक मुद्दों से ध्यान भटका सकता है.
बीते महीने पवन सिंह ने आरके सिंह से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा था.
ऐसे में पवन सिंह का विनोद तावड़े के साथ उपेंद्र कुशवाहा से उनकी मुलाकात बेहद महत्वपूर्ण है. राजपूत और कुशवाहा जाति डेहरी-ऑन-सोन में बीजेपी के लिए तरुप का एक्का साबित हो सकते हैं. उपेंद्र कुशवाहा और पवन सिंह की मुलाकात यह भी संकेत देती है कि दोनों पिछले गिले-शिकवे भूलकर अब एक साथ एनडीए के लिए काम करेंगे. क्योंकि काराकाट के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा और राजपूत जाति आमने-सामने आ गए थे. राजपूत वोटरों के पवन सिंह के साथ जाने से उपेंद्र कुशवाहा की हार हुई थी. इसी तरह आरा में कुशवाहा वोटर बीजेपी से छिटक सीपीआई उम्मीदवार के साथ चले गए, जिससे आरके सिंह की हार हुई थी. ऐसे में डेहरी सोन में इस बार बीजेपी आरा, बक्सर, सासाराम और काराकाट लोकसभा के तकरीबन 24 विधानसभा सीटों पर अपना गोटी सेट कर लिया है.







