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पीके का दांव, हताशा या रणनीति?……………..

UB India News by UB India News
August 28, 2025
in पटना, बिहार
0
दोनों एक-दूसरे की आलोचना करेंगे लेकिन बिहार की असली समस्याओं पर कोई बात नहीं करेंगे….

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समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………

तेजस्वी यादव, मीरा कुमार और शत्रुघ्न सिन्हा की सुरक्षा घटी…..

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जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा, मुस्लिम वोटरों का साथ मिले तो बिहार में नीतीश और बीजेपी को हराएंगे और दो साल बाद यूपी में योगी आदित्यनाथ को भी पराजित कर देंगे. प्रशांत किशोर के इस बयान ने सियासी तौर पर सोचा समझा और एक खास रणनीति के तहत दिया गया बयान प्रतीत होता है. दरअसल, यह बयान उनके उस दावे से इतर है जिसमें वह जाति और धर्म की राजनीति से खुद को अलग होने की बात कहते रहे हैं. मुस्लिमों को मोदी, योगी के नाम पर डराकर वोट लेने की उनकी राजनीतिक मंशा भी जाहिर हो गई है.अब सवाल यह है कि प्रशांत किशोर ने ऐसा क्यों किया या फिर उनको ऐसा क्यों करना पड़ा? क्या उनके तमाम दावों के बावजूद मुस्लिम वोटरों में पीके से अधिक अभी भी लालू यादव और तेजस्वी यादव की आरजेडी का प्रभाव है. क्या प्रशांत किशोर से अधिक प्रभावी अभी भी असदु्ददीन ओवैसी हैं. क्या प्रशांत किशोर चुनाव से पहले अपना दांव चल रहे हैं या फिर वह हताश हो चुके हैं.

आइये सबसे पहले जानते हैं कि उन्होंने कहा क्या था. बुधवार (27 अगस्त) को मोतिहारी के गांधी ऑडिटोरियम में प्रशांत किशोर ने कहा,“मुस्लिम भाई साथ आएं तो बिहार में नीतीश-BJP को धूल चटाएंगे, और 2027 में UP में योगी आदित्यनाथ को भी औंधे मुंह गिरा देंगे! चौंकाने वाली बात यह है कि ये वही PK हैं, जो कभी ‘जाति-धर्म की सियासत नहीं’ का राग अलापते थे. उनकी भाषा भी इस दौरान तल्ख थी और पीके का ‘मोदी-योगी को ठोक देने’ वाला बयान कोई तुक्का नहीं, बल्कि सोचा-समझा दांव है. पीके की इस बात से साफ है कि सीएम नीतीश की कमजोरी और मुस्लिमों के बीच बीजेपी विरोधी भावनाओं को भुनाने की उनकी कोशिश है. लेकिन, जानकारों की नजर में लालू यादव और तेजस्वी यादव के साथ ही असदुद्दीन ओवैसी का प्रभाव तोड़ना आसान नहीं.

PK के आगे RJD और AIMIM की चुनौती

वर्ष 2023 जातीय जनगणना के अनुसार बिहार में लगभग 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और यह सियासी समीकरण बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखती है. इसके साथ बड़ा तथ्य यह है कि राजद का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी की ताकत रहा है. वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद को 77% मुस्लिम वोट मिले थे, जबकि AIMIM ने सीमांचल में 11% वोट के साथ पांच सीटें जीती थीं. यानी साफ है कि असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में RJD की पकड़ को चुनौती दी थी. यह भी स्पष्ट है कि आरजेडी और एआईएमआईएम के बीच मुस्लिम वोटों का शेयर जाता है. अब प्रशांत किशोर ने 40 मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है तो उनकी कोशिश है कि आरजेडी और एआईएमआईएम के खेमे से मुस्लिम पाला बदलें और उनकी तरफ आएं.मगर सवाल यही है कि क्या वे RJD और AIMIM के इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे?

प्रशांत किशोर का दांव, हताशा या रणनीति?

जानकार बताते हैं कि RJD और AIMIM की मजबूत पकड़ के बीच PK का यह दांव हताशा नहीं, बल्कि सियासी रणनीति है. प्रशांत किशोर की रणनीति में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ‘मोदी-योगी डर’ का कार्ड साफ दिखता है. हज भवन में ‘बिहार बदलाव’ कॉन्फ्रेंस और इफ्तार जैसे आयोजनों के जरिए प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय को आबादी के अनुपात में 40 सीटों पर टिकट का भरोसा दिया. जानकार कहते हैं कि यह राजद की ‘लालटेन’ और ओवैसी की सियासी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. उन्होंने जानबूझकर एक दांव चला है और प्रशांत किशोर ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए मोदी-योगी को हराने का दावा किया है.

RJD और AIMIM की ताकत, PK की कमजोर जमीन

जानकार बताते हैं कि RJD और AIMIM की मजबूत पकड़ के बीच PK का यह दांव हताशा नहीं, बल्कि सियासी रणनीति है. प्रशांत किशोर की रणनीति में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ‘मोदी-योगी डर’ का कार्ड साफ दिखता है. हज भवन में ‘बिहार बदलाव’ कॉन्फ्रेंस और इफ्तार जैसे आयोजनों के जरिए प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय को आबादी के अनुपात में 40 सीटों पर टिकट का भरोसा दिया. जानकार कहते हैं कि यह राजद की ‘लालटेन’ और ओवैसी की सियासी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. उन्होंने जानबूझकर एक दांव चला है और प्रशांत किशोर ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए मोदी-योगी को हराने का दावा किया है.

RJD और AIMIM की ताकत, PK की कमजोर जमीन

RJD की ताकत लालू यादव का बनाया हुआ MY समीकरण और तेजस्वी यादव की युवा अपील है. वर्ष 1989 के भागलपुर दंगे के बाद मुस्लिम वोटर RJD के साथ मजबूती से जुड़े तो अब तक नहीं हटे हैं. इस बीच कांग्रेस आरजेडी की पिछलग्गू रही तो मुस्लिमों के पास इधर-उधर देखने का मौका नहीं रहा. वहीं, जब 2020 में असदुद्दीन ओवैसी ने अपना दम दिखाया और करीब 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले सीमांचल के जिलों में अपनी पकड़ बनाई तो मुस्लिमों के वोट थोड़े आरजेडी के पाले से खिसक गए. अब PK का दावा है कि RJD मुस्लिमों को सिर्फ कमजोर सीटों पर टिकट देती है, लेकिन 2020 में RJD के 8 और AIMIM के 5 मुस्लिम विधायक जीते थे. बाद में ओवैसी के विधायक आरजेडी के साथ ही हो लिए. इस बीच कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार से मुस्लिमों का मोहभंग हुआ है और वक्फ बिल विवाद ने राजद को और मजबूत कर दिया है. जाहिर है अगर राजद के पाले में मुस्लिम वोटर खड़े रहे तो पीके की सियासी पकड़ मजबूत नहीं हो पाएगी. ऐसे में उनका यह बयान उनकी कमजोर जमीन को मजबूत करने की कोशिश हो सकती है.

नीतीश-BJP पर निशाना, PK का सियासी मकसद क्या?

प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी को एकसाथ निशाना बनाकर मुस्लिम वोटरों में बीजेपी विरोधी भावनाओं को भुनाने की कोशिश की है. उनका योगी आदित्यनाथ को ‘ठोकने’ वाला बयान आगामी यूपी के 2027 में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भी हो सकता है जो उनकी दीर्घकालिक रणनीति दिखाता है. लेकिन, बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का गठबंधन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा एनडीए को मजबूत बनाता है. गैर यादव हिंदू वोटों की गोलबंदी मोटे तौर पर एनडीए खेमे की ओर ही दिखती है. वहीं, प्रशांत किशोर की सभाओं में भीड़ (हिंदू-मुस्लिम दोनों) तो जुट रही है, पर इसे वोट में बदलना चुनौती है. खास तौर पर जब मुस्लिम समुदाय टेक्टिकल वोटिंग, यानी जहां बीजेपी को हराने वाले को समर्थ देता हो, वहां पीके के लिए चुनौती है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा के अनुसार, पीके की रणनीति दोनों खेमों- एनडीए और महागठबंधन, के वोट काट सकती है पर सफलता लायक वोट मिलेंगे, यह अनिश्चित है.

क्या है PK की मजबूरी?

दरअसल, प्रशांत किशोर की जन सुराज अभी नई पार्टी है और उनकी विश्वसनीयता स्थापित करना बाकी है. बिहार की जातीय और धार्मिक सियासत में RJD और AIMIM की गहरी जड़ें हैं. वर्ष 2020 में मुस्लिम वोटों का बिखराव (77% RJD, 11% AIMIM, 12% अन्य) दिखाता है कि प्रशांत किशोर के लिए एकमुश्त समर्थन मुश्किल है. इसके बाद 2024 के उपचुनाव में जन सुराज को बेलागंज में 17,000 वोट मिले, जिसने RJD की हार में भूमिका निभाई. यह दिखाता है कि पीके का प्रभाव बढ़ तो रहा है, पर क्या यह RJD-AIMIM को पछाड़ने के लिए काफी है? सवाल यह कि ‘मोदी-योगी’ को टारगेट करना हताशा में उठाया गया कदम है? अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि ‘मोदी-योगी’ कार्ड उनकी हताशा नहीं, बल्कि सियासी दांव है जो युवा और मुस्लिम वोटरों को लुभाने का प्रयास तो है, लेकिन अगर मुस्लिम वोटर RJD और AIMIM के साथ बने रहे तो पीके का यह दांव उल्टा पड़ सकता है.
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा, मुस्लिम वोटरों का साथ मिले तो बिहार में नीतीश और बीजेपी को हराएंगे और दो साल बाद यूपी में योगी आदित्यनाथ को भी पराजित कर देंगे. प्रशांत किशोर के इस बयान ने सियासी तौर पर सोचा समझा और एक खास रणनीति के तहत दिया गया बयान प्रतीत होता है. दरअसल, यह बयान उनके उस दावे से इतर है जिसमें वह जाति और धर्म की राजनीति से खुद को अलग होने की बात कहते रहे हैं. मुस्लिमों को मोदी, योगी के नाम पर डराकर वोट लेने की उनकी राजनीतिक मंशा भी जाहिर हो गई है.अब सवाल यह है कि प्रशांत किशोर ने ऐसा क्यों किया या फिर उनको ऐसा क्यों करना पड़ा? क्या उनके तमाम दावों के बावजूद मुस्लिम वोटरों में पीके से अधिक अभी भी लालू यादव और तेजस्वी यादव की आरजेडी का प्रभाव है. क्या प्रशांत किशोर से अधिक प्रभावी अभी भी असदु्ददीन ओवैसी हैं. क्या प्रशांत किशोर चुनाव से पहले अपना दांव चल रहे हैं या फिर वह हताश हो चुके हैं.

आइये सबसे पहले जानते हैं कि उन्होंने कहा क्या था. बुधवार (27 अगस्त) को मोतिहारी के गांधी ऑडिटोरियम में प्रशांत किशोर ने कहा,“मुस्लिम भाई साथ आएं तो बिहार में नीतीश-BJP को धूल चटाएंगे, और 2027 में UP में योगी आदित्यनाथ को भी औंधे मुंह गिरा देंगे! चौंकाने वाली बात यह है कि ये वही PK हैं, जो कभी ‘जाति-धर्म की सियासत नहीं’ का राग अलापते थे. उनकी भाषा भी इस दौरान तल्ख थी और पीके का ‘मोदी-योगी को ठोक देने’ वाला बयान कोई तुक्का नहीं, बल्कि सोचा-समझा दांव है. पीके की इस बात से साफ है कि सीएम नीतीश की कमजोरी और मुस्लिमों के बीच बीजेपी विरोधी भावनाओं को भुनाने की उनकी कोशिश है. लेकिन, जानकारों की नजर में लालू यादव और तेजस्वी यादव के साथ ही असदुद्दीन ओवैसी का प्रभाव तोड़ना आसान नहीं.

PK के आगे RJD और AIMIM की चुनौती

वर्ष 2023 जातीय जनगणना के अनुसार बिहार में लगभग 18 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और यह सियासी समीकरण बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखती है. इसके साथ बड़ा तथ्य यह है कि राजद का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी की ताकत रहा है. वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद को 77% मुस्लिम वोट मिले थे, जबकि AIMIM ने सीमांचल में 11% वोट के साथ पांच सीटें जीती थीं. यानी साफ है कि असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में RJD की पकड़ को चुनौती दी थी. यह भी स्पष्ट है कि आरजेडी और एआईएमआईएम के बीच मुस्लिम वोटों का शेयर जाता है. अब प्रशांत किशोर ने 40 मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है तो उनकी कोशिश है कि आरजेडी और एआईएमआईएम के खेमे से मुस्लिम पाला बदलें और उनकी तरफ आएं.मगर सवाल यही है कि क्या वे RJD और AIMIM के इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगा पाएंगे?

प्रशांत किशोर का दांव, हताशा या रणनीति?

जानकार बताते हैं कि RJD और AIMIM की मजबूत पकड़ के बीच PK का यह दांव हताशा नहीं, बल्कि सियासी रणनीति है. प्रशांत किशोर की रणनीति में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ‘मोदी-योगी डर’ का कार्ड साफ दिखता है. हज भवन में ‘बिहार बदलाव’ कॉन्फ्रेंस और इफ्तार जैसे आयोजनों के जरिए प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय को आबादी के अनुपात में 40 सीटों पर टिकट का भरोसा दिया. जानकार कहते हैं कि यह राजद की ‘लालटेन’ और ओवैसी की सियासी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. उन्होंने जानबूझकर एक दांव चला है और प्रशांत किशोर ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए मोदी-योगी को हराने का दावा किया है.

RJD और AIMIM की ताकत, PK की कमजोर जमीन

जानकार बताते हैं कि RJD और AIMIM की मजबूत पकड़ के बीच PK का यह दांव हताशा नहीं, बल्कि सियासी रणनीति है. प्रशांत किशोर की रणनीति में मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ‘मोदी-योगी डर’ का कार्ड साफ दिखता है. हज भवन में ‘बिहार बदलाव’ कॉन्फ्रेंस और इफ्तार जैसे आयोजनों के जरिए प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय को आबादी के अनुपात में 40 सीटों पर टिकट का भरोसा दिया. जानकार कहते हैं कि यह राजद की ‘लालटेन’ और ओवैसी की सियासी पकड़ को कमजोर करने की कोशिश है. उन्होंने जानबूझकर एक दांव चला है और प्रशांत किशोर ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए मोदी-योगी को हराने का दावा किया है.

RJD और AIMIM की ताकत, PK की कमजोर जमीन

RJD की ताकत लालू यादव का बनाया हुआ MY समीकरण और तेजस्वी यादव की युवा अपील है. वर्ष 1989 के भागलपुर दंगे के बाद मुस्लिम वोटर RJD के साथ मजबूती से जुड़े तो अब तक नहीं हटे हैं. इस बीच कांग्रेस आरजेडी की पिछलग्गू रही तो मुस्लिमों के पास इधर-उधर देखने का मौका नहीं रहा. वहीं, जब 2020 में असदुद्दीन ओवैसी ने अपना दम दिखाया और करीब 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले सीमांचल के जिलों में अपनी पकड़ बनाई तो मुस्लिमों के वोट थोड़े आरजेडी के पाले से खिसक गए. अब PK का दावा है कि RJD मुस्लिमों को सिर्फ कमजोर सीटों पर टिकट देती है, लेकिन 2020 में RJD के 8 और AIMIM के 5 मुस्लिम विधायक जीते थे. बाद में ओवैसी के विधायक आरजेडी के साथ ही हो लिए. इस बीच कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार से मुस्लिमों का मोहभंग हुआ है और वक्फ बिल विवाद ने राजद को और मजबूत कर दिया है. जाहिर है अगर राजद के पाले में मुस्लिम वोटर खड़े रहे तो पीके की सियासी पकड़ मजबूत नहीं हो पाएगी. ऐसे में उनका यह बयान उनकी कमजोर जमीन को मजबूत करने की कोशिश हो सकती है.

नीतीश-BJP पर निशाना, PK का सियासी मकसद क्या?

प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी को एकसाथ निशाना बनाकर मुस्लिम वोटरों में बीजेपी विरोधी भावनाओं को भुनाने की कोशिश की है. उनका योगी आदित्यनाथ को ‘ठोकने’ वाला बयान आगामी यूपी के 2027 में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भी हो सकता है जो उनकी दीर्घकालिक रणनीति दिखाता है. लेकिन, बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का गठबंधन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा एनडीए को मजबूत बनाता है. गैर यादव हिंदू वोटों की गोलबंदी मोटे तौर पर एनडीए खेमे की ओर ही दिखती है. वहीं, प्रशांत किशोर की सभाओं में भीड़ (हिंदू-मुस्लिम दोनों) तो जुट रही है, पर इसे वोट में बदलना चुनौती है. खास तौर पर जब मुस्लिम समुदाय टेक्टिकल वोटिंग, यानी जहां बीजेपी को हराने वाले को समर्थ देता हो, वहां पीके के लिए चुनौती है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा के अनुसार, पीके की रणनीति दोनों खेमों- एनडीए और महागठबंधन, के वोट काट सकती है पर सफलता लायक वोट मिलेंगे, यह अनिश्चित है.

क्या है PK की मजबूरी?

दरअसल, प्रशांत किशोर की जन सुराज अभी नई पार्टी है और उनकी विश्वसनीयता स्थापित करना बाकी है. बिहार की जातीय और धार्मिक सियासत में RJD और AIMIM की गहरी जड़ें हैं. वर्ष 2020 में मुस्लिम वोटों का बिखराव (77% RJD, 11% AIMIM, 12% अन्य) दिखाता है कि प्रशांत किशोर के लिए एकमुश्त समर्थन मुश्किल है. इसके बाद 2024 के उपचुनाव में जन सुराज को बेलागंज में 17,000 वोट मिले, जिसने RJD की हार में भूमिका निभाई. यह दिखाता है कि पीके का प्रभाव बढ़ तो रहा है, पर क्या यह RJD-AIMIM को पछाड़ने के लिए काफी है? सवाल यह कि ‘मोदी-योगी’ को टारगेट करना हताशा में उठाया गया कदम है? अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि ‘मोदी-योगी’ कार्ड उनकी हताशा नहीं, बल्कि सियासी दांव है जो युवा और मुस्लिम वोटरों को लुभाने का प्रयास तो है, लेकिन अगर मुस्लिम वोटर RJD और AIMIM के साथ बने रहे तो पीके का यह दांव उल्टा पड़ सकता है.
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