दरौली विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र बिहार के 243 विधानसभा सीटों में से एक है। यह विधानसभा सीट एक अनुसूचित जाति श्रेणी की विधानसभा सीट है। यह विधानसभा सीट सिवान जिले में स्थित है और सिवान संसदीय सीट के 6 विधानसभा सीटों में से एक है। गौरतलब है कि इस चुनाव में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी चुनावी मैदान में है। जनसुराज पार्टी बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने वाली है। ऐसे में बिहार का विधानसभा चुनाव इस बार और भी ज्यादा दिलचस्प होने वाला है। ऐसे में चलिए आपको बताते हैं सिवान विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास।
पिछले चुनावों में क्या-क्या हुआ?
इस सीट पर साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव की अगर बात करें तो इस सीट से सीपीआईएमएल के उम्मीदवार सत्यदेव राम ने जीत दर्ज की थी। उन्हें 81,067 वोट मिले थे। वहीं दूसरे स्थान पर थे भाजपा के उम्मीदवार रामायण मांझी, जिन्हें 68948 वोट्स मिले थे। वहीं साल 2015 के विधानसभा चुनाव की अगर बात करें तो इस सीट से सीपीआईएमएल के सत्यदेव राम ने जीत दर्ज की थी, जिन्हें 49576 वोट्स मिले थे। वहीं रामायण मांझी दूसरे स्थान पर थे, जिन्हें 39992 वोट्स मिले थे। इसके अलावा तीसरे स्थान पर थे राजद के परमात्मा राम जिन्हें 37345 वोट्स मिले थे।
जातीय समीकरण और मतदाता
साल 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दरौली विधानसभा सीट पर अगर कुल मतदाताओं की बात करें तो उनकी संख्या 320063 है। इस सीट पर कुछ जातियों की आबादी अच्छी खासी है। इस सीट पर यादव समाज के लोग की बहुलता है, ऐसे में इस सीट पर वह निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यहां यादव वोटरों की आबादी 37,127 है। वहीं राजपूत वोटरों की संख्या 29,765 है। इस सीट पर मुस्लिम आबादी भी अच्छी खासी है जो कि निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
दरौली विधानसभा चुनाव 2025 के संदर्भ में मुख्य बातें:
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दरौली विधानसभा सीट बिहार के सिवान जिले में स्थित है और यह अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट है।
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चुनावी मुकाबला आमतौर पर सीपीआई(एमएल)(लिबरेशन) और भाजपा के बीच रहता है। 2010 में भाजपा (रामायण मांझी) ने यहां जीत दर्ज की थी, लेकिन 2015 और 2020 दोनों चुनावों में सीपीआई(एमएल)(लिबरेशन) के सत्यदेव राम ने लगातार जीत हासिल की।
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2020 के चुनाव में सत्यदेव राम (सीपीआई(एमएल)(एल)) को 81,067 वोट (50.50% वोट शेयर) और भाजपा के रामायण मांझी को 68,948 वोट (42.95% वोट शेयर) मिले, जीत का अंतर 12,119 वोट था।
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राजनीतिक रूप से दरौली वामपंथी गढ़ माना जाता है, लेकिन भाजपा भी प्रमुख चुनौती देने वालों में रही है।
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जाति आधारित समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं: दलित (करीब 25%), यादव, कुशवाहा, अति पिछड़ा वर्ग और कुछ ब्राह्मण, राजपूत व मुस्लिम मतदाता यहाँ के प्रमुख निर्णायक वर्ग हैं।
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2025 के लिए मुख्य मुकाबला फिर से सीपीआई(एमएल)(एल) और भाजपा के बीच होने की संभावना है। सीपीआई(एमएल) के कार्यकर्ता सच्चिदानंद यादव को आगे कर सकते हैं, जबकि भाजपा नए चेहरे की तलाश में है।
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महागठबंधन (राजद, कांग्रेस आदि) में तालमेल बिगड़ा तो त्रिकोणीय संघर्ष भी संभव है, लेकिन अभी प्रमुख लड़ाई वाम संघ बनाम भाजपा मानी जा रही है।
दरौली की जनता का रुझान मुद्दों, वर्गीय-जातीय समीकरणों व स्थानीय कार्यकर्ताओं के ग्राउंड नेटवर्क पर निर्भर रहा है। यहां की राजनीति को विचारधारा और लोकल मुद्दे दोनों प्रभावित करते हैं।
2025 के चुनाव में भी यही समीकरण देखने को मिल सकते हैं, हालांकि भाजपा का वोट बेस बढ़ाने का प्रयास और महागठबंधन की रणनीति मुकाबले को रोचक बना सकती है।
2025 के चुनावी मुकाबले में मुख्य मुद्दे रोज़गार (नौकरियाँ), पलायन, सामाजिक न्याय और आरक्षण, जाति जनगणना, युवाओं की अपेक्षाएँ, महिला सशक्तिकरण, और विकास होने की संभावना है।
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रोज़गार: सभी दल—विशेषकर आरजेडी, कांग्रेस और लोकल वाम दल—सरकारी और निजी क्षेत्रों में रोजगार, बेरोजगारी भत्ता और स्थानीय स्तर पर नियोजन को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। युवा वोटरों को आकर्षित करने के लिए तेजस्वी यादव जैसे नेता स्थायी रोजगार के दावे कर रहे हैं और इसे अपने प्रचार अभियान की केंद्रीय धुरी बना चुके हैं।
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सामाजिक न्याय और आरक्षण: बीजेपी और उसके सहयोगी दल सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण—खासकर हाल ही में हुई जाति जनगणना का श्रेय लेने—को केंद्रीय मुद्दा बना रहे हैं। आरजेडी भी 85% तक आरक्षण की मांग के साथ इस वर्ग के मतदाताओं को साधने की रणनीति पर है।
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जाति जनगणना: एनडीए और महागठबंधन दोनों समाज के जातीय समीकरण को संतुलित करने के लिए जाति जनगणना का मुद्दा उठाते रहे हैं और इसका श्रेय लेने में प्रतिस्पर्धा दिखा रहे हैं।
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महिला सशक्तिकरण: एनडीए और विपक्ष दोनों महिलाओं की आर्थिक-शैक्षिक स्थिति सुधारने के लिए योजनाओं की घोषणा कर चुके हैं।
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विकास और आधारभूत ढांचा (सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा): विकास की राजनीति और लोकल वादे (जैसे बिजली, सड़क, शिक्षा) पर भी चुनावी विमर्श केंद्रित रहेगा।
कुछ पारंपरिक मुद्दे, जैसे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा, पिछली बारों की तुलना में 2025 के चुनाव में प्रमुखता से गायब हैं। इस बार सत्तापक्ष और विपक्ष—दोनों ही इससे दूरी बना रहे हैं, खासकर नीतीश कुमार के एनडीए में वापस जाने के बाद।
तो, 2025 के विधानसभा चुनाव में युवा, रोजगार, सामाजिक न्याय, आरक्षण, जाति आधारित समीकरण, और स्थानीय विकास के इर्द-गिर्द मुकाबला केंद्रित रहेगा, जबकि कुछ पुराने मुद्दे हाशिए पर जा सकते हैं।






