बिहार की सियासत का आज ‘सुपर संडे’ का माहौल है क्योंकि तीन प्रमुख नेता-चिराग पासवान, तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजनीतिक रैलियां करने जा रहे हैं. ये रैलियां आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए सियासी ताकत का प्रदर्शन करने और अलग-अलग जाति और वर्ग को अपने पाले में साधने की रणनीति का हिस्सा हैं. तेजस्वी यादव जहां वैश्य वोटों को लुभाने के लिए बेरोजगारी और वोटर लिस्ट जैसे मुद्दों को हवा दे रहे हैं तो चिराग का ‘बिहार फर्स्ट’ का नारा दलितों में जोश भर रहा है. वहीं, कुशवाहा कोइरी समाज को एकजुट करने के लिए परिसीमन सुधार का दांव खेल रहे हैं. इन रैलियों के माध्यम से बिहार की जनता की निगाहें अब इन नेताओं के अगले कदम पर टिकी हैं. आइये जानते हैं तीनों कार्यक्रमो की डिटेल जानते हैं.
आरजेडी के जातिगत आधार का विस्तार कर रहे तेजस्वी- राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव आज पटना के बापू सभागार में वैश्य प्रतिनिधि सम्मेलन को संबोधित करेंगे. इस सम्मेलन में पूरे बिहार से वैश्य समाज के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे. तेजस्वी यादव का यह कदम वैश्य वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है. तेजस्वी बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा जैसे मुद्दों को उठाकर युवाओं और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को लुभाने की कोशिश करेंगे. उन्होंने हाल ही में वोटर लिस्ट संशोधन को लेकर नीतीश सरकार पर सवाल उठाए हैं और इसे गरीबों और अल्पसंख्यकों के वोटिंग अधिकारों पर हमला बताया है.
दलितों का एकमात्र नेता बनने की चाहत!
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान नालंदा के राजगीर में ‘बहुजन भीम समागम’ को संबोधित करेंगे. इस रैली में तीन लाख से अधिक बहुजन और पार्टी कार्यकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद है. चिराग पासवान का ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का नारा दलित समुदाय, खासकर पासवान जाति (5.31% आबादी) के बीच उनकी मजबूत पकड़ को बताता है. चिराग की बढ़ती सक्रियता और उनकी पार्टी की 2024 लोकसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत ने उन्हें एनडीए में एक माहिर और मजबूत खिलाड़ी बनाया है. हालांकि, उनकी विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा ने नीतीश कुमार और अन्य सहयोगियों में बेचैनी पैदा की है.
सियासी जमीन मजबूत करने की कवायद
एनडीए की सहयोगी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा गया के गांधी मैदान में ‘संवैधानिक अधिकार परिसीमन सुधार महारैली’ को संबोधित करेंगे. यह रैली कोइरी समुदाय (4.21% आबादी) को टारगेट कर आयोजित किया जा रहा है. वह अपनी इस रैली के माध्यम से कुशवाहा समाज में अपनी ताकत दिखाने के साथ ही सामाजिक न्याय और परिसीमन सुधार जैसे मुद्दों को उठाकर अपने समुदाय को एकजुट करने की कोशिश करेंगे.
बिहार विधानसभा चुनाव पर क्या होगा असर?
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. तेजस्वी यादव महागठबंधन को मजबूत करने और वैश्य वोटों को साधने की कोशिश में हैं, जबकि चिराग और कुशवाहा एनडीए के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ दलित और कोइरी वोट बैंक को एकजुट कर रहे हैं. चिराग की महत्वाकांक्षा और उनकी ‘वोट कटुआ’ भूमिका की आशंका ने एनडीए में टेंशन बढ़ा दिया है, खासकर नीतीश कुमार के लिए. दूसरी ओर तेजस्वी विपक्ष के रूप में एनडीए की कमजोरियों को भुनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.जाहिर है ये रैलियां बिहार की जातिगत और सामाजिक गणित को साधने का प्रयास हैं जो चुनावी रणनीति में निर्णायक साबित हो सकती हैं.
वक्फ कानून और शिवाजी पर जुटान
इसके साथ ही बिहार में वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 और शिवाजी स्मारक विवाद को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है.आज पटना के गांधी मैदान में ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली का आयोजन हो रहा है जिसमें हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल होंगे. रैली में वक्फ बिल को ‘काला कानून’ बताकर इसका विरोध किया जाएगा. दूसरी ओर, बेगूसराय में शिवाजी स्मारक को लेकर जनता का गुस्सा भड़क रहा है जहां स्थानीय लोग बीजेपी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी इसे सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला बता रहे हैं. ये दोनों मुद्दे बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल को गरमा रहे हैं.







