स्टालिन ने पहले केंद्र से 1971 की जनगणना-आधारित परिसीमन को 2026 से आगे 30 साल के लिए बढ़ाने के लिए कहा था. उन्होंने कहा था, “यथास्थिति कम से कम तीन दशकों तक जारी रहनी चाहिए, 2056 तक.” दूसरी ओर, कांग्रेस ने सावधानी से काम लिया. पार्टी के कम्युनिकेशन प्रमुख जयराम रमेश ने कहा, “2021 में होने वाली जनगणना को 23 महीने और टालने का कोई कारण नहीं है. मोदी सरकार सिर्फ सुर्खियां बटोरने में सक्षम है, समयसीमा पूरी करने में नहीं. गृह मंत्रालय की घोषणा के अनुसार, “जनगणना-2027 के लिए कट ऑफ एक मार्च 2027 होगी.” सूत्रों ने बताया कि जनगणना फरवरी 2027 में पूरी हो जाएगी और अंतिम रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में जारी कर दी जाएगी. इससे अंततः परिसीमन के लिए दरवाजे खुल जाएंगे. सरकार ने परिसीमन के बाद संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने का भी वादा किया है.
दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक पार्टियों को डर है कि अगर हालिया जनगणना के आधार पर परिसीमन किया गया तो वे संसद में अपना प्रतिनिधित्व खो देंगे. उनका तर्क है कि पिछले कुछ सालों में दक्षिणी राज्य उत्तरी राज्यों की तुलना में अपनी आबादी को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में सक्षम रहे हैं. इसलिए अगर जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित की गईं तो उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा. इस साल की शुरुआत में तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके ने जनगणना आधारित परिसीमन का विरोध करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया था.
अगर परिसीमन किया जाता है तो 2029 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उत्तरी राज्यों को 32 सीटों का फायदा होगा, जबकि दक्षिणी राज्यों को 24 सीटों का नुकसान होगा. थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस द्वारा 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रकाशित ‘भारत के प्रतिनिधित्व का उभरता संकट’ शीर्षक वाले अध्ययन में कहा गया था कि इस प्रक्रिया में तमिलनाडु और केरल राज्य मिलकर 16 सीटें खो देंगे. मार्च में स्टालिन के नेतृत्व में चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों और तीन अन्य राजनीतिक दलों की संयुक्त कार्रवाई समिति (जेएसी) ने निष्पक्ष परिसीमन की मांग की थी. जेएसी ने केंद्र से संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन पर रोक को तीन दशक तक बढ़ाने का आग्रह किया.
एक बार जब अंतिम डेटा आ जाएगा तो परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए दरवाजे खुल जाएंगे. परिसीमन आयोग के गठन का रास्ता साफ करने के लिए संसद को परिसीमन अधिनियम पारित करना होगा. इसके बाद यह आयोग राज्य सरकारों सहित विभिन्न हितधारकों के परामर्श से एक फार्मूला (प्रति निर्वाचन क्षेत्र जनसंख्या) तैयार करेगा, जिसके आधार पर परिसीमन का काम जाएगा. संसद में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक संविधान संशोधन विधेयक लाना होगा, जो अभी भी 543 पर स्थिर है. संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के तहत परिसीमन अनिवार्य है और हर जनगणना के बाद इसे किया जाना जरूरी है. 1951, 1961 और 1971 की जनगणना के आधार पर यह तीन बार हुआ.
आपातकाल के दौरान (25 जून 1975-21 मार्च 1977) प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 42वां संशोधन पारित किया था. जिसे आधिकारिक तौर पर संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 के रूप में जाना जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि 2000 के बाद पहली जनगणना तक 1971 की जनगणना को संदर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया गया. इसने मूलतः 2000 के बाद पहली जनगणना होने तक लोकसभा सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया. 2002 में, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने अगले 25 सालों के लिए कम से कम 2026 तक के लिए इस रोक को बढ़ा दिया. यह लोकसभा सीटों की संख्या पर रोक ही है जिसे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन केंद्र से अगले 30 वर्षों के लिए बढ़ाने का आग्रह कर रहे हैं.
अमित शाह ने दिया था भरोसा
इसी साल फरवरी में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया था कि परिसीमन की वजह से तमिलनाडु सहित किसी भी दक्षिणी राज्य में संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी नहीं आएगी. अमित शाह ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, “मैं दक्षिण भारत की जनता को आश्वस्त करना चाहता हूं कि मोदी जी ने आपके हित को ध्यान में रखा है और यह सुनिश्चित किया है कि एक भी सीट कम न हो. जो भी वृद्धि होगी, दक्षिणी राज्यों को उसका उचित हिस्सा मिलेगा, इसमें संदेह करने का कोई कारण नहीं है.”







