पिछले तीन दशकों में बिहार की सियासत में कांग्रेस का वोट बैंक तेजी से सिकुड़ता गया है. 1990 में जहां पार्टी का वोट शेयर करीब 25% था, वहीं 2020 तक यह घटकर लगभग 9% पर आ गया. इस भारी गिरावट ने कांग्रेस को बिहार में हाशिए पर ला खड़ा किया है. खासकर, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ गठबंधन ने कांग्रेस की स्थिति को और कमजोर किया. अब राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बिहार में नई रणनीति के साथ अपने पुराने गौरव को पुनर्जनन की कोशिश में है. लेकिन, सवाल यह है कि क्या यह रणनीति कामयाब होगी, या कांग्रेस और हाशिए पर जाने को मजबूर होगी?
1990 के दशक तक बिहार में कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक था, जिसमें दलित, मुस्लिम, और सवर्ण समुदाय शामिल थे. लेकिन, मंडल आयोग और क्षेत्रीय दलों के उभार ने इस आधार को छिन्न-भिन्न कर दिया. लालू प्रसाद यादव की आरजेडी ने मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण बनाकर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई. नीतीश कुमार की जेडीयू ने भी महादलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को अपने पक्ष में कर लिया. 2005 से नीतीश के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस का वोट शेयर लगातार घटा. 2010 में पार्टी को मात्र 4 सीटें मिलीं, और 2020 में महागठबंधन के हिस्से के रूप में भी केवल 19 सीटें ही हासिल हुईं.
क्या है राहुल गांधी की नई रणनीति?
राहुल गांधी अब दलित और अति पिछड़ा (EBC) वोट बैंक को फिर से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पिछले पांच महीनों में उनकी बिहार की बार-बार यात्राएं, जैसे अंबेडकर छात्रावास का दौरा और ज्योतिबा फुले पर बनी फिल्म देखना, सामाजिक न्याय के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं. पार्टी ने संगठन में भी बदलाव किए हैं. सवर्ण नेता अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, और सुशील पासी को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया. राहुल की ‘शिक्षा न्याय संवाद’ यात्रा और जातिगत जनगणना की मांग भी दलित-पिछड़ा वर्ग को लुभाने का हिस्सा है.
कांग्रेस के लिए दोधारी तलवार की तरह RJD
कांग्रेस और आरजेडी का गठबंधन बिहार में इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन यह गठबंधन कांग्रेस के लिए दोधारी तलवार साबित हुआ है. आरजेडी का MY समीकरण और दलित वोटों पर उसकी पकड़ कांग्रेस के लिए चुनौती है. विशेषज्ञों का मानना है कि राहुल की सक्रियता आरजेडी पर अधिक सीटों के लिए दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है. हालांकि, गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर तनाव और दलित वोटों के लिए प्रतिस्पर्धा से वोटों का बिखराव हो सकता है. 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की 19% दलित आबादी निर्णायक होगी. कांग्रेस की रणनीति अगर सफल रही, तो वह न केवल बिहार में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है, बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भी इसका असर दिख सकता है. लेकिन आरजेडी और अन्य क्षेत्रीय दलों की मजबूत पकड़ के बीच राहुल गांधी का यह दांव कितना कारगर होगा, यह समय ही बताएगा.







