बिहार में हफ्ते भर के अंदर पुलिस पर हमले की दो चर्चित घटनाएं हुईं। मुंगेर में एक विवाद को सुलझाने गए एएसआई संतोष सिंह को गांव वालों ने धारदार हथियार से हमला कर मार डाला। उसके दूसरे ही दिन मुंगेर के हवेली खड़गपुर थाना क्षेत्र में डायल 112 के पुलिस जवानों पर फिर हमला हुआ। इस हमले में एक कांस्टेबल गंभीर रूप से जख्मी हो गया, जबकि अन्य कई पुलिस वाले ग्रामीणों के पथराव से घायल हो गए। तीन दिनों के अंदर तीसरी घटना मुजफ्फरपुर में हुईं, जहां थाने पर उपद्रवियों ने पथराव किया। ये तो कुछ बानगी भर हैं। बालू माफिया से पुलिस की भिड़ंत की खबरें भी आती ही रहती हैं। शराब की सूचना पर पहुंचने वाली पुलिस भी अक्सर पिटती है।
बिहार की कानून व्यवस्था को केंद्र कर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन के सीएम फेस तेजस्वी यादव तो पिछले कई महीनों से लगातार क्राइम बुलेटिन जारी करते रहे हैं। आम आदमी को निशाना बनाने में अपराधी अब तनिक भी संकोच नहीं करते। जनता के रक्षक भी असुरक्षित हैं। यह तीन दिनों में उन पर हमले की तीन घटनाओं से समझा जा सकता है। तेजस्वी यादव अगर इसके लिए नीतीश कुमार को जिम्मेवार ठहराते हैं तो इसमें बचाव की भी कोई गुंजाइश नहीं बचती। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में लूट की घटनाएं भी धड़ल्ले से हो रही हैं। भोजपुर में तनिष्क शो रूप से लूट ने सबको चौंका दिया है।
बिहार में 2020 से बिगड़ी है स्थिति
दरअसल ऐसी स्थिति हाल के दिनों में ही नहीं उत्पन्न हुई है। सच तो यह है कि 2020 से ही ऐसे हालात बने हुए हैं। शायद ही कोई महीना बीतता हो, जब पुलिस पर हमले की घटना न हो। हत्या, लूट जैसी घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गई हैं। यह सब उसी बिहार में हो रहा है, जहां 2005 से ही नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार चलती रही है। क्राइम कंट्रोल के नीतीश कुमार के तरीके को देख कर बिहार की जनता ने 2010 आते-आते उन्हें सुशाशन कुमार और सुशासन बाबू कहना शुरू किया था। बिहार के सुशासन की सर्वत्र चर्चा होने लगी थी। ठीक उसी तर्ज पर जैसे उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की चर्चा आजकल दूसरे राज्यों में होती है। नीतीश कुमार ने 2013 में एनडीए छोड़ दिया। तब से ही कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है।
खत्म हो गया है नीतीश का इकबाल
पहले नीतीश कुमार की हनक थी। स्थितियों पर उनकी नजर रहती थी। उनका आदेश पुलिस और दूसरे महकमों के अफसरों के लिए ब्रह्म वाक्य होता था। बड़े-बड़े अपराधी जेलों में ठूंस दिए गए थे। बचे अपराधियों ने बिहार छोड़ना ही मुनासिब समझा। उनका ठिकाना दूसरे रज्य बन गए। तब नीतीश की सख्ती ऐसी थी कि उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दे रखा था कि किसी अपराधी की पैरवी अगर कोई जनप्रतिनिधि भी करने आए तो उनकी नहीं सुनना है। अफसरों ने भी सख्ती और ईमानदारी दिखाई। बिहार में क्राइम कंट्रोल हो गया और नीतीश की सख्ती की सर्वत्र सराहना होने लगी। नीतीश अगर बार-बार कहते हैं कि 2005 के पहले शाम के बाद कोई घर से निकलता था जी तो इसकी यही वजह कि उनकी सख्ती से बाद के दिनों में अपराधियों के होश फाख्ता हो गए थे।
आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर कहते हैं कि नीतीश कुमार से बिहार संभल नहीं रहा। दोनों नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति पर भी सवाल उठाते हैं। उन्हें बीमार और लाचार सीएम ठहराने का तेजस्वी को अगर मौका मिला है तो इसकी वजह सिर्फ कानून व्यवस्था की दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही स्थिति है। राज्य के सुदूर इलाकों को छोड़ भी दें तो जिस पटना में सत्ता और शासन के सर्वोच्च लोग बैठते हों, वहां भी अपराध बेकाबू हैं। रोज ब रोज हत्या, फायरिंग और बम विस्फोट जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। छिनतईबाज तो शहरों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। सरकार ने पुलिस को शराबबंदी कानून का पालन कराने के काम लगा रखा है। शराब के धंधेबाजों और पीने वालों के खिलाफ ही पुलिस की सारी ऊर्जा जाया हो रही है। अपराधियों पर नकेल कसने की किसी को फुर्सत ही नहीं है।
ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार जान-बूझ कर अपराधियों को खुली छूट दिए हुए हैं। वे कबूल भले न करें, लेकिन सच यही है कि अपराध नियंत्रण के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही। पुलिस महकमे में बड़े पैमाने पर ताबदले होते रहे हैं। सस्पेंशन की कार्रवाई भी होती रहती है। हाल के दिनों में तो एनकाउंटर भी हुए हैं। अभी तक करीब आधा दर्जन खूंखार अपराधी पुलिस की गोली का शिकार बन चुके। इसके बावजूद अपराधी बेलगाम हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर तो बेकाबू अपराध के पीछे की सच्चाई कुछ और ही देखते हैं। वे बताते तो नहीं, लेकिन कहते हैं कि किसी रिटायर्ड जज से अपराधों की जांच कराई जानी चाहिए, जिससे पता चल सके कि यह किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं। क्योंकि अपराधों की अचानक आई बाढ़ सामान्य नहीं लगती। ऐसा लगता है कि C से सिर्फ क्राइम ही नहीं, बल्कि C से कॉन्सपिरेसी भी है।







