इस वर्ष देश में अब सिर्फ बिहार विधानसभा का चुनाव होना है पर इस चुनाव को दिल्ली‚ महाराष्ट्र‚ मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव की सीध में देखें तो राज्यों के बदले अर्थ चरित्र को समझ सकेंगे। दिलचस्प है कि राजनीतिक तौर पर भी यह सीध ‘लाडली योजना’ से ‘लाडला मुख्यमंत्री’ तक पहुंच चुकी है। दरअसल‚ यह बड़ा बदलाव है। जाति और अस्मिता की राजनीति का उत्तर सर्ग विकासवादी तर्कों पर कसा जा रहा है। बड़ी बात यह है कि यह समझ समाज और सरकारों के स्तर पर एक साथ दिखाई पड़ रही है।
बात एक बार फिर से बिहार की करें तो यह उन राज्यों में शामिल है‚ जिसके विकास की संभावनाओं पर लंबे समय तक नकारात्मक तरीके से विचार किया गया। इस पूरे संदर्भ का आगाज १९८० के दशक में तब हुआ‚ जब जनसांख्यिकी और आÌथक नीतियों के विश्लेषक आशीष बोस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में चार बड़े राज्यों बिहार‚ मध्य प्रदेश‚ राजस्थान और उत्तर प्रदेश को ‘बीमारू’ राज्य बताया। इन राज्यों को आÌथक विकास‚ स्वास्थ्य देखभाल‚ शिक्षा और अन्य सूचकांकों के मामले में पिछड़ने के कारण यह नाम दिया गया। इसके बाद से न सिर्फ यह शब्द लगातार प्रचलन में बना रहा‚ बल्कि इस आधार पर इन राज्यों के विकास को अलग से चिह्नित और वर्गीकृत भी किया जाता रहा। पर बीते दशकों में यह स्थिति लगातार बदली है।
इस दौरान विकास को लेकर न सिर्फ राज्यों का नया चरित्र उभरा है‚ बल्कि यह भी देखने में आया है कि राज्य सरकारें अपने राजनीतिक स्थायित्व के लिए विकासवादी लीक पर आगे बढ़ने को विवश हैं। राज्यों का यह विकासवादी चरित्र उस दौर में उभरा है‚ जब बीमारू ठहराए गए राज्य विकास के विभिन्न मोर्चों पर अपने मॉडल के साथ चर्चा में हैं। हाल में बिहार विधानसभा में नीतीश सरकार ने २०२५–२६ का बजट पेश किया। गौरतलब है कि इसमें महिलाओं पर विशेष तौर पर ध्यान दिया गया है। नीतीश सरकार ने महिलाओं के लिए सात बड़ी घोषणाएं की हैं‚ जिनमें कन्या विवाह मंडप निर्माण‚ महिला हाट जिम ऑन व्हील‚ पिंक टॉयलेट‚ कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल‚ पिंक बस और महिलाओं को ट्रेनिंग देना शामिल हैं। इस तरह की पहल का महत्व तब ज्यादा समझ में आता है‚ जब हम ‘जेंडर’ या ‘पिंक बजट’ की बात करते हैं। बिहार सरकार के तकरीबन तीन लाख १७ हजार करोड़ के बजट को पिंक बजट के फ्रेमवर्क के साथ देखा–समझा जाए तो यह राज्य में महिलाओं की जिंदगी में बड़े बदलाव को रेखांकित करता है। यह बजट महिला स्वावलंबन की भी चिंता करता है। मसलन‚ इसमें उनके लिए कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम और आÌथक मदद का प्रबंध किया गया है। अगर यह बात कही जा रही है कि बिहार राज्य पथ परिवहन निगम के चालक‚ परिचालक और डिपो मेंटेनेस स्टाफ के पदों में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की जाएगी‚ तो यह महिला सशक्तिकरण के लिहाज से बड़ा फैसला है।
जो लोग बिहार के जिलों‚ यहां के विषम भूगोल और परिवहन सेवाओं को लेकर जमीनी समझ रखते हैं‚ वे समझ पाएंगे कि इससे महज प्रदेश की महिलाओं को रोजगार ही नहीं मिलेगा‚ बल्कि लैंगिक समानता का एक नया दौर भी शुरू होगा। पंचायत में महिलाओं को पचास फीसद आरक्षण सबसे पहले देने वाले राज्य में यह पहल उस सिलसिले की नई कड़ी है‚ जिसमें बालिका शिक्षा और जीविका योजना जैसी पहल पहले से बदलाव के नये सुलेख साबित हो रही हैं। इस सुलेख की सबसे अच्छी बानगी है कि यह राज्य आज देश में पुलिस सेवा में शीर्ष महिला सहभाग वाला सूबा है। बात विकास और चुनाव को लेकर एक साथ करें तो इस लिहाज से भी कई बातें देखने और समझने की हैं। इस नई चर्चा और समझ के केंद्र में है नीतीश कुमार की प्रगति यात्रा। खास तौर पर पारंपरिक ढर्रेदार चुनावी विमर्श में यह यात्रा बड़ा मोड़ और मास्टरस्ट्रोक है। बिहार के अनुभवी मुख्यमंत्री को इस बात की दाद तो मिलनी ही चाहिए कि ये सब वे बिना किसी सियासी हड़कंप और शोर–शराबे के कर रहे हैं। यह जरूर है कि अब जब उनकी प्रगति यात्रा पूरी हो चुकी है तो उनके इस कदम को लेकर राजनीतिक गुणा–गणित का दौर तेज हो रहा है। राजनीतिक पंडित भी अब कहने लगे हैं कि बिहार में राजनीति को विकास के जिलावार खाके के साथ नीतीश ने नई जमीन तैयार कर दी है। ॥ दिलचस्प है कि देश के राजनीतिक दिग्गजों की जमात में नीतीश ऐसे वाहिद राजनेता हैं‚ जो रोडशो वाली राजनीति के दौर में भी सीधे जनता के बीच पहुंचने की राह पर हैं। २००५ से अब तक उन्होंने १५ यात्राएं की हैं। २००५ की न्याय यात्रा से लेकर मौजूदा प्रगति यात्रा तक उन्होंने बिहार की राजनीति और उसके प्रगतिशील लIयों को नये पर्याय दिए हैं‚ नये मानक दिए हैं। विकास को लेकर प्रतिबद्धता और दूरदÌशता का ही हासिल है कि बीमारू कहा जाने वाला बिहार आज रोड कनेक्टिविटी से लेकर महिला सशक्तिकरण का सर्वथा नया आख्यान रच रहा है। जाहिर तौर पर बदलाव की इस इबारत को पढ़ने के लिए पूर्वाग्रह को छोड़ एक धुली और तटस्थ दृष्टि की दरकार है। इस दरकार के साथ ही समझा जा सकता है कि जिस राज्य में बिजली उत्पादन २००५ में ७०० मेगावाट होता था‚ वह २०२५ तक आते–आते ८‚००० मेगावाट से ज्यादा हो गया है। स्कूलों में नामांकन की जो दर दो दशक पहले ४५ फीसद थी‚ वह आज ९० फीसद से ऊपर है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा जॉब कार्डधारकों की संख्या २००५ में १० लाख थी‚ जो २०२३ में १.२५ करोड़ से ज्यादा हो गई। इसी तरह महिलाओं के जीविका समूहों की संख्या बीते २० वर्षो में दस हजार से १२ लाख से भी ज्यादा हो गई है। दरअसल‚ बिहार आज देश में राज्यों के बदले अर्थ चरित्र का अग्रणी राष्ट्र है‚ जो सामाजिक सहभाग के साथ विकास की राह पर बढ़ रहा है। बेहतर होगा कि ऐसे बदलाव की चर्चा में तात्कालिक राजनीतिक समझ को किनारे छोड़ दिया जाए। ऐसा होने पर ही हम देख पाएंगे कि आशीष बोस के उलट आज ज्यादा प्रगतिशील आÌथक व्याख्याकारों की जरूरत हो‚ जो विकास के नये मानदंडों के साथ उसके मीलस्तंभों की चर्चा को आगे बढ़ाए।







