राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट तौर पर कहा कि अगर भारत ने ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों के साथ मिलकर डॉलर को गिराने की कोशिश की, तो उसे 100 फीसदी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है.
अगर भारत पर यह 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका सीधा असर भारतीय प्रोडक्ट्स के निर्यात पर पड़ेगा. भारत से अमेरिका जाने वाले प्रोडक्ट्स की कीमत वहां दोगुनी हो जाएगी, जिससे उनकी बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है. इसका नतीजा यह होगा कि भारतीय प्रोडक्ट्स को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई होगी और भारत का निर्यात प्रभावित हो सकता है.
असल में BRICS साल 2009 में स्थापित हुआ था और यह एकमात्र प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समूह है जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल नहीं है. ट्रंप ने ब्रिक्स देशों के नेताओं को सीधे संदेश दिया कि अगर वे अमेरिकी डॉलर के अलावा किसी दूसरी करेंसी का इस्तेमाल करने की दिशा में कदम उठाते हैं, तो उन्हें 100 फीसदी टैरिफ का सामना करना पड़ेगा.
क्या अमेरिका पर ज्यादा टैरिफ लगाता है भारत?
डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि भारत कई अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर ‘बहुत ज्यादा’ टैरिफ लगाता है. उन्होंने इसे अनुचित बताते हुए यह दोहराया था कि अमेरिका, भारत पर समान जवाबी टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है. यानी ट्रंप का मानना है कि जब अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर भारत ज्यादा शुल्क लगाता है, तो अमेरिका को भी भारत के सामान पर वैसा ही टैरिफ लगाना चाहिए. यह बयान उस समय दिया गया था जब दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर खींचतान बढ़ रही थी.
अब डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में रहते हुए भारत पर टैरिफ का खतरा और बढ़ गया है. अमेरिका का दावा है कि भारत व्यापार में अतिरिक्त लाभ (Trade Surplus) उठाता है, यानी भारत अमेरिका को जो सामान बेचता है, उतना अमेरिका का सामान भारत में नहीं खरीदा जाता है. इस असंतुलन को ठीक करने के लिए ट्रंप प्रशासन भारत पर कड़े टैरिफ लगाने की तैयारी में है.
वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने अमेरिका को $77.51 बिलियन का सामान बेचा, जबकि अमेरिका से केवल $42.2 बिलियन का सामान खरीदा. इस साल अप्रैल से दिसंबर तक भारत का अमेरिका को निर्यात 5.57% बढ़कर लगभग $60 बिलियन हो गया, जबकि आयात लगभग 2% बढ़कर $33.4 बिलियन हो गया.
ट्रंप की ‘टैरिफ’ नीति का अमेरिका पर क्या असर होगा?
ये समझने के लिए एबीपी न्यूज ने वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार मोहम्मद शोएब से बातचीत की. उन्होंने बताया, “मान लीजिए चीन में बन रहा एक EV (इलेक्ट्रिक व्हीकल) अमेरिका में 30 हजार डॉलर का बिकता है. वहीं, किसी अमेरिकी नामी कंपनी का EV 50 हजार डॉलर का बिकता है. तो जाहिर सी बात है ज्यादा EV चाइना वाला ही बिकेगा. लेकिन अगर चाइना के सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लग जाता है तो EV की कीमत डबल (60 हजार डॉलर) हो जाएगी. ऐसे में फिर उस नामी कंपनी का ही EV अमेरिकी खरीदेंगे. इससे अमेरिका के लोकल प्रोडक्शन को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन ये फायदा शॉर्ट टर्म के लिए ही होगा. लंबे समय में अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर होगा. पूरी दुनिया में टैरिफ वॉर छिड़ जाएगा. टैरिफ लगाना कोई समझदारी नहीं है.”
वहीं, एबीपी न्यूज ने JNU से रिटायर्ड इकोनॉमिस्ट प्रोफेसर अरुण कुमार से भी बातचीत की. प्रोफेसर अरुण कुमार ने बताया, ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत ट्रंप अमेरिकी वर्कर्स को प्रोटेक्ट करने की बात करते हैं, लेकिन असल में उन्हें प्रोटेक्शन नहीं मिलेगा. क्योंकि दूसरे देश भी उनके गुड्स पर टैरिफ लगा देंगे, तो अमेरिका का भी प्रोडक्शन कम होगा. प्रोडक्शन कम होने से एंप्लायमेंट कम होगा और दूसरी तरफ महंगाई बढ़ेगी.
ट्रंप की ‘टैरिफ’ नीति का भारत पर क्या असर होगा?
इकोनॉमिस्ट प्रोफेसर अरुण कुमार ने बताया, “अमेरिकी टैरिफ से भारत का एक्सपोर्ट कम हो सकता है. एक्सपोर्ट घटेगा तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा. वहीं, जब अमेरिका टैरिफ लगाएगा, तो दूसरे तमाम देश भी अपने देश का मार्केट प्रोटेक्ट करने के लिए टैरिफ लगाना शुरू कर देंगे. इससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ेगी और सप्लाई चैन बाधित हो जाएगी. महंगाई बढ़ने से लोगों की डिमांड भी कम होगी. टैरिफ का असर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर की अर्थव्यवस्था नीचे गिरने लगेगी.”
‘टैरिफ’ से निपटने के भारत के पास क्या रास्ते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद शोएब ने बताया, ‘भारत के पास अगर वर्ल्ड एक्सचेंज रिजर्व है तो अमेरिकी टैरिफ का तुरंत कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. ‘टैरिफ’ से निपटने के भारत के पास दो अहम रास्ते हैं: एक एक्सपोर्ट बढ़ाना होगा. अमेरिका के अलावा एक्सपोर्ट प्रमोशन और इंपोर्ट सब्सीट्यूशन पर जोर देना होगा. दूसरा भारत को अपना इंपोर्ट कम करना होगा. जिन चीजों को हम अमेरिका से आयात करते हैं, उनका ब्रिक्स देशों से आयात करना पड़ेगा या धीरे-धीरे खुद प्रोडक्शन करना पड़ेगा.’
“अगर कुछ चीजों का आयात कम करके काम चलाया जा सकता है तो चलाना चाहिए. इंपोर्ट कम करने से इंपोर्ट बिल कम हो जाएगा. अगर भारत अपना इंपोर्ट कम कर लेगा (जैसे- गोल्ड कम खरीदना) तो भी आराम से टैरिफ की समस्या से निपट सकता है.”
उन्होंने आगे कहा, ‘इसके अलावा, भारत को गल्फ कंट्रीज से भारतीय कुशल श्रमिकों की भर्ती पर बात करनी चाहिए. साथ ही अमेरिका के साथ अपने इंपोर्ट को कम करके दूसरे मार्केट (सप्लायर) ढूंढने चाहिए. ब्रिक्स देशों के साथ-साथ दूसरे देशों से भी करेंसी स्वैप एग्रीमेंट और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स साइन करने होंगे. सामान के बदले सामान का एक्सचेंज कर सकते हैं. डॉलर रिजर्व की कमी को पूरा करने के लिए भारत को इस दिशा में काम करना पड़ेगा, ताकि यह एक शॉक ऑब्जर्वर की तरह काम करे. इस तरह अमेरिकी टैरिफ का होने वाला असर कम किया जा सकता है.’

वहीं, रिटायर्ड इकोनॉमिस्ट प्रोफेसर अरुण कुमार ने बताया, ‘अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए भारत को अपना सामान सस्ता करना होगा. लेकिन इसके लिए मजदूरों की तनख्वाह कर करनी पड़ सकती है, कंपनी को अपना प्रोफिट छोड़ना पड़ सकता है. अगर अमेरिका 10 फीसदी टैरिफ लगाता है, तो भारत को अपने दाम 10 फीसदी कम करने होंगे, तभी अमेरिका में उसी कीमत पर सामान बिक पाएगा. समस्या ये है कि ये करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि कोई कंपनी या मजदूर अपना प्रोफिट कम नहीं करना चाहेंगे. मतलब, इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है.’
प्रोफेसर अरुण कुमार ने आगे कहा, भारत के पास एकमात्र यही रास्ता बचेगा कि हमें अपना मार्केट और अच्छे से डवलप करना होगा. अभी हम सिर्फ एक्सपोर्ट की बात करते हैं. गरीब और आम लोगों की आमदनी पर ध्यान ही नहीं देते हैं. अगर उनकी आमदनी बढ़ती है तो एक्सपोर्ट में आने वाली कमी जितनी ही डिमांड अपने देश में ही जनरेट की जा सकती है.
क्या भारत को टैरिफ के काउंटर टैरिफ या कोई प्रतिबंध लगा सकता है?
इस पर प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा, भारत को अपना मार्केट प्रोटेक्ट करने के लिए ऐसा करना ही पड़ेगा और करना भी चाहिए. भारत ही नहीं, बाकी देश भी काउंटर टैरिफ लगाना शुरू कर देंगे. इस तरह पूरी दुनिया डी-ग्लोबलाइजेशन की ओर चली जाएगी.
वहीं, अर्थशास्त्री मोहम्मद शोएब का कहना है कि भारत ऐसा बिल्कुल कर सकता है. हर देश ऐसे निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन भारत को ये देखना होगा कि कहीं उस देश या सप्लायर की किसी प्रोडक्ट में मोनोपॉली तो नहीं है. ऐसे में टैरिफ नहीं लगा पाएंगे. अगर हम टैरिफ लगा देते हैं तो भारत की प्रोडक्शन कॉस्ट भी बढ़ सकती है. क्योंकि कच्चे माल के लिए अक्सर भारतीय कंपनियों को दूसरे देश पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे प्रोडक्ट की लागत बढ़ेगी.
“असल में जब अमेरिका प्रोडक्शन कर रहा था तो उसमें काफी ग्लोबलाइजेशन होना चाहिए था. हर देश को अपना मार्केट ओपन करके ग्लोबलाइजेशन करना चाहिए. चीन इस मामले में सबसे आगे निकल गया, भारत पीछे रह गया. ऐसे में आज दुनियाभर में ज्यादातर चाइन का ही सामान बिकता है, क्योंकि उसका सामान सस्ते के साथ-साथ अच्छा भी होता है. जब अमेरिका को लगा कि उसका नुकसान हो रहा है तो टैरिफ लगाना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा डी-ग्लोबलाइजेशन होना चाहिए. अब जब बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब (ब्रिक्स देश) एक साथ आ गए हैं तो फिर उन्होंने कहा ग्लोबलाइजेशन करो. तो ग्लोबलाइजेशन, डी-ग्लोबलाइजेशन और री-ग्लोबलाइजेशन हो रहा है. ये ब्रिक्स देश लगातार बढ़े होते जा रहे हैं. ऐसे में अमेरिका टैरिफ नीति ज्यादा समय के लिए टिकाऊ नहीं है.”
ट्रंप प्रशासन में भारत के लिए क्या है व्यापारिक अवसर
अमेरिकी राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के पहले ही दिन डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट ट्रेड पॉलिसी’ जारी की. इस मेमो में ट्रंप ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) को निर्देश दिया है कि वे उन देशों की पहचान करें, जिनके साथ अमेरिका द्विपक्षीय या सेक्टर स्पेसिफिक ट्रेड एग्रीमेंट्स पर बातचीत कर सकता है.
यह मेमो भारत के लिए एक पॉजिटिव साइन हो सकता है. द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत के दौरान भारत अपने प्रोडक्ट्स के निर्यात को बढ़ावा देने और अमेरिकी बाजारों तक अधिक पहुंच बनाने के लिए इन अवसरों का फायदा उठा सकता है.
भारतीय सरकार इस मेमो का गहराई से अध्ययन कर रही है. सरकारी सूत्रों ने पीटीआई को बताया, “हम इस मेमो का अध्ययन और जांच कर रहे हैं. किसी भी रणनीति को बनाने से पहले हमें सभी पहलुओं का मूल्यांकन करना होगा. अभी तक, इसे पढ़ने पर कोई ऐसा मुद्दा नजर नहीं आता जिससे चिंता हो.”

मोदी और ट्रंप की संभावित बैठक कब?
भारतीय और अमेरिकी राजनयिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच इसी साल फरवरी में वॉशिंगटन में एक बैठक आयोजित करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, यह तय नहीं है कि यह बैठक फरवरी में हो पाएगी. दोनों नेताओं के बीच फरवरी में बैठक की योजना बनाई जा रही है, लेकिन इसे लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है. अमेरिकी और भारतीय अधिकारियों के बीच इस मामले पर चर्चा जारी है.
अगर फरवरी में बैठक संभव नहीं हो पाती, तो इस साल बाद में एक द्विपक्षीय बैठक आयोजित की जा सकती है. यह बैठक तब हो सकती है जब भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के नेताओं का क्वाड समूह भारत में आयोजित एलवल समिट के लिए एकत्रित होगा. इस बैठक के दौरान मोदी और ट्रंप के बीच बातचीत का अवसर बन सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच एक बैठक की संभावनाएं इस समय राजनयिक प्रयासों पर निर्भर करती हैं. चाहे यह बैठक फरवरी में हो या कुछ महीनों बाद, यह दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने में मददगार साबित हो सकती है.







