पाकिस्तान में शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गैनाइजेशन (एससीओ) के सीएचजी (काउंसिल ऑफ हेड ऑफ गवर्नमेंट्स) की बैठक 16 अक्टूबर को खत्म हो गयी. भारत की तरफ से इसमें हालांकि प्रधानमंत्री मोदी नहीं गए थे, बल्कि विदेश मंत्री एस जयशंकर इसमें हिस्सा लेने गए थे. पाकिस्तानी मीडिया इसी बात पर खुश है कि भारत के विदेशमंत्री ने अपने चिरपरिचित अंदाज में वहां कम से कम पाकिस्तान की बखिया नहीं उधेड़ी, बल्कि उसे अच्छे आयोजन की बधाई देकर चले आए. हालांकि, सच तो सभी को पता है. जयशंकर ने अपनी धारदार वक्तृता से पाकिस्तान और उसके आका चीन को धोया भी और जमकर सुनाया भी. यह बात दीगर है कि उनका कहना ऐसा था कि किसी को समझ आया और किसी को नहीं आया.
भारतीय विदेश नीति फिलहाल सर्वोत्तम हाथों में
अगर इतिहास को देखें, तो अधिक पन्ने नहीं पलटने पड़ेंगे. 2001 का साल बड़ा अहम था, जब रूस, चीन, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान ने जो शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ का विचार मिलकर पनपाया था, उसका पहला समिट शुरू हुआ था. भारत भी 2022 में सीएचजी का हेड बना था. शुरुआत इसकी इसीलिए की गयी थी कि जो अमेरिका विरोधी देश हैं, उनको साथ मिलाकर आगे एक साथ काम किया जाए. इसके मूल में विचार तब अमेरिकी नीतियों का विरोध ही था. साथ ही मानव संरक्षा का विचार भी था. अगर हम आज भी देखें तो पाकिस्तान में जयशंकर की बात करना लाजिमी हो जाता है. इसके लिए थोड़ा पीछे जाकर 2014 से शुरुआत करनी होगी. प्रधानमंत्री मोदी ने जब पहली बार शपथ ली, तब से विश्व के हरेक मंच पर, हरेक प्लेटफॉर्म पर यह विचार जोरदार शब्दों में रख रहा है, स्थापित कर रहा है कि आतंकवाद, अतिवाद (एक्स्ट्रीमिज्म) और रेडिकलाइजेशन यानी कट्टरपंथ और अलगाववाद के खिलाफ एक वैश्विक समझ बने, उसे पारिभाषित किया जाए. भारत आतंकवाद को डिफाइन करने के प्रयासों में लगा है, क्योंकि यह बड़ी अचरज की बात है कि आजतक आतंकवाद को पारिभाषित ही नहीं किया गया है.
इसकी शुरुआत नरेंद्र मोदी ने 2014 में यूएन से की थी. उसके बाद तो एससीओ, क्वाड या फिर ब्रिक्स में भी लगातार भारत इस पर जोर देता आया है. इन सभी मंचो पर चीन और पाकिस्तान को घेरते हुए कोशिश की गयी है कि आतंकवाद को पारिभाषित किया जाए, हालांकि कई देशों ने भारत के स्टैंड को उतना समर्थन नहीं दिया और अभी भी यह मुद्दा अधर में है. यह समझ में नहीं आ रहा है लोगों को कि ये जो आतंकवाद है, वह कुछ राज्यों के समर्थन से पोषित और पल्लवित आतंकवाद है.
विदेश नीति बिल्कुल साफ, आतंक और बात साथ नहीं
जहां तक पाकिस्तान में जयशंकर के भाषण का सवाल है, तो वह बिल्कुल स्पष्ट है. उन्होंने क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म की चर्चा की. वह वैश्विक आतंकवाद की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि पड़ोसी मुल्क से निर्यात होनेवाले आतंकवाद की बात कर रहे थे. पाकिस्तान 80-90 के दशक से ही छद्म युद्ध में व्यस्त है, क्योंकि वह आमने-सामने के युद्ध में उससे पहले तीन बार मुंह की खा चुका था. वह आतंकियों को फंडिंग, ट्रेनिंग और बाकी साधन मुहैया कराता है, कोशिशों की जहां तक बात है, तो अजीत डोवल भी एससीओ के गिर्द और सुषमा स्वराज भी 2016 में हार्ट ऑफ एशिया के सम्मेलन में गयी थीं और उन्होंने पाकिस्तान को सुधर जाने की सलाह भी दी थी. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉस्को से लौटते वक्त सारे प्रोटोकॉल तोड़ कर तत्कालीन पाकिस्तानी पीएम नवाज शरीफ की पोती की शादी में शिरकत करने चले गए थे. बात केवल इतनी सी है कि टेररिज्म और टॉक साथ नहीं चल सकते. हमारे प्रधानमंत्री भी इस बात को दुहरा चुके हैं कि जब तक पाकिस्तान अलगाववाद और आतंकवात को समर्थन देना बंद नहीं करेगा, तब तक भारत और पाकिस्तान के बीच डिप्लोमैटिक बातचीत नहीं हो सकती है.
पाकिस्तान नहीं सुधरेगा तो हालात ऐसे ही रहेंगे
जो ओल्ड स्कूल के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार हैं, वे जानते और मानते हैं कि भारत उत्तर पूर्व से लेकर कश्मीर औऱ पंजाब तक में भारत को पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छद्म युद्ध का सामना करने के लिए पैसों की, जवानों की और संसाधनों की कुर्बानी देनी पड़ती है. एक तरफ तो वे हमारे जवानों को बलिदान करते हैं, दूसरी तरफ अगर बातचीत की बात की जाए तो ये कहां तक तर्क संगत है. पाकिस्तान हालांकि भारत से संबंध सुधारने की लगभग गिड़गिड़ा रहा है. पाकिस्तान के पूर्व पीएम ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी आते तो बेहतर होता, बिलावल भुट्टो ने अपनी छवि के विपरीत बेहदत संजीदा और संयत बयान दिया है, कोई बेहूदगी नहीं की है, लेकिन भारत अब अपनी बात पर अड़ गया है कि पहले आतंक की खेती बंद हो, उसके बाद ही कुछ होगा. यह बात अलग है कि आप अपने पड़ोसी नहीं चुन सकते, लेकिन पाकिस्तान जैसा पड़ोसी अगर हो, तो आपको कुछ कठोर कदम उठाने पड़ते हैं.
भारत पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की हर चंद कोशिश कर रहा है. डोवाल ने अमेरिका में बात की, मोदी जी भी अमेरिका में यूएन के समिट में पाकिस्तानी समकक्ष से मिले, लेकिन जब मोदी जी की तीसरी पारी का शपथ ग्रहण चल रहा था, तभी कश्मीर में बेहद घातक आक्रमण किया, जिसमें हमारे कई जवानों ने बलिदान दिया. तो, पाकिस्तान ऐसा कोई मौका नहीं चूकता है, जब वह भारत को दिखा सके कि वह सुरक्षा के मामले में भारत को लगातार अंगूठे पर रखेगा. पाकिस्तान का जो आरोप है कि वह तो बातचीत चाहता है, लेकिन भारत पहल नहीं करता या प्रतिक्रिया नहीं देता, वह गलत है.
कश्मीर में अभी जो चुनाव के बाद नेशनल कांफ्रेंस की सरकार बनी, उससे पाकिस्तान के हाथों से वह मुद्दा ही चला गया है. इससे पहले आर्टिकल 370 को हटाकर भी सरकार ने पहले से ही संकेत दे दिए थे कि वह पाकिस्तान का झुनझुना छीन कर मानेगी. जब तक पाकिस्तान सीमा पार से आतंक की खेती नहीं बंद करता, इसके सबूत जब तक हमारी सरकार और खुफिया एजेंसियों को नहीं मिल जाते, तब तक हमारी सरकार को उनसे बातचीत करने में मुश्किल होगी. तब तक माहौल में इतनी ही तल्खी रहेगी और कम से कम भारत तो अब झुकने वाला नहीं ही है. एकमात्र उपाय है कि पाकिस्तान सुधर जाए, वरना वैसे भी उसकी हालत बेहद खराब है ही.







