अमेरिका में इसी साल नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव होना है. ऐसे में पिछले कुछ महीनों से एक सवाल सभी के मन में था कि रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप आखिर अपना जोड़ीदार किसे बनाएंगे? मतलब, जब वो दोबारा व्हाइट हाउस जीतने की कोशिश करेंगे तो उपराष्ट्रपति उम्मीदवार कौन होगा? अब ये तय हो गया है.
डोनाल्ड ट्रंप ने ओहायो के सीनेटर जेम्स डेविड वेंस को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है. पिछली बार माइक पेंस उनके साथ थे. लेकिन इस बार ट्रंप ने कट्टर समर्थक चुना है. मतलब, ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ वाली सोच को और मजबूत किया है.
39 साल के जेडी वेंस अगर चुनाव में जीत जाते हैं तो वह अमेरिका के सबसे कम उम्र के उप-राष्ट्रपति बनेंगे. खास बात ये है कि वेंस की पत्नी ऊषा चिलुकुरी भारतीय मूल की हैं. उनका परिवार आंध्र प्रदेश से है. इसलिए भारत में लोगों के लिए अच्छी बात है.
ऊषा चिलुकुरी का भारत से कैसे है नाता
ऊषा चिलुकुरी का जन्म और स्कूली पढ़ाई अमेरिकी शहर सैन डिएगो में हुई. उनके माता-पिता साल 1980 में आंध्र प्रदेश से अमेरिका जाकर बस गए थे. उन्होंने अपनी बेटी ऊषा को अमेरिका में रहने के बावजूद भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के अनुसार शिक्षा और संस्कार दिए. बाद में जेडी वेंस भी इन संस्कारों से प्रभावित हुए.
ऊषा की मां एक बायोलॉजिस्ट हैं और पिता इंजीनियर हैं. ऊषा ने येल यूनिवर्सिटी से बैचलर की स्टडी की. इसके बाद गेट्स कैम्ब्रिज स्कॉलरशिप की मदद से कैम्ब्रिज से मास्टर ऑफ फिलॉसफी की डिग्री हासिल की. उनका कहना है कि उन्होंने अपने माता-पिता के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए ही पढ़ाई की है. फिर उन्होंने दोबारा येल यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई की. यहीं उनकी मुलाकात जेडी वेंस से हुई थी. कुछ समय दोनों अच्छे दोस्त बन गए और 2014 में शादी कर ली.
आज ऊषा चिलुकुरी अमेरिका में एक कामयाब वकील हैं. जेडी वेंस ने अपनी मशहूर और बेस्ट सेलिंग बुक ‘हिलबिली एलेजी’ में ऊषा चिलुकुरी को भारतीय प्रवासियों की बहुत होशियार बेटी बताया है.

अमेरिका की राजनीति में और भारतीय मूल के लोग
भारतीय मूल के लोग अमेरिका की राजनीति और अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहे हैं. दो अन्य भारतीय मूल के अमेरिकी निक्की हेली और विवेक रामास्वामी भी रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए दौड़ में रह चुके हैं. वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी से कमला हैरिस अमेरिका की उपराष्ट्रपति हैं. माना जा रहा है कि अगर इस बार बाइडेन अपनी उम्मीदवारी छोड़ते हैं तो कमला हैरिस ही ट्रंप के खिलाफ चुनाव में राष्ट्रपति उम्मीदवार हो सकती है.
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की आबादी केवल 1.5 फीसदी है, लेकिन फिर भी बहुत से क्षेत्र में सफल हैं. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, IBM जैसी बड़ी कंपनियों के मुख्य अधिकारी भारतीय हैं. अमेरिका में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले समूहों में भारतीय ही हैं.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 2014 से अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों से जुड़ने की अक्सर कोशिश करते रहे हैं. 2019 में अपने अमेरिकी दौरे पर पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में शामिल हुए था और वहां 50 हजार से ज्यादा लोगों को संबोधित किया था. इस इवेंट में अपनी स्पीच के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा बोला था, जिसपर भारत में काफी विवाद हुआ था. यह नारा आज भी अमेरिका में ट्रंप के समर्थकों को याद होगा.
कभी ट्रंप के विरोधी रहे थे वेंस
ऊषा चिलुकुरी अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन की पार्टी डेमोक्रैटिक की समर्थक रह चुकी हैं और जेडी वेंस कभी डोनाल्ड ट्रंप के विरोधी थे. ऊषा ने 2014 में डेमोक्रेट्स के रूप में खुद को रजिस्ट्रड किया था. हालांकि, 2018 के बाद उन्होंने अपना राजनीतिक रुख बदल लिया था.
वहीं ट्रंप समर्थक बनने से पहले 2021 तक जेडी वेंस उनके बड़े विरोधी हुआ करते थे. 2016 में एक इंटरव्यू में जेडी वेंस ने ट्रंप के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए थे. फिर 2021 में उन्होंने इसके लिए ट्रंप से माफी मांगी और रिपब्लिकन पार्टी से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की. इसके बाद दोनों अच्छे साथी बन गए. 2022 में वेंस ओहायो से चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की.
चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं सीनेटर वेंस
सीनेटर वेंस अक्सर विदेश नीति पर बयान देते हैं. इन बयानों में उन्होंने चीन को अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंदी बताया है. उनका कहना है कि चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका को और ज्यादा सख्त कदम उठाने चाहिए.
इस साल की शुरुआत में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में जेडी वेंस कहा था कि अगले 40 सालों तक अमेरिकी विदेश नीति का मुख्य फोकस पूर्वी एशिया होना चाहिए. वहीं इसी हफ्ते फॉक्स न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था.
इससे पहले ट्रंप भी चीन को सीधे-सीधे अमेरिका का दुश्मन बता चुके हैं. वहीं रिपब्लिकन पार्टी ने 2024 के अपने एजेंडे में चीन को दिया हुआ ‘सबसे पसंदीदा देश’ छीनने की बात कही है. तो साफ है कि अगर ये वेंस सत्ता में आए तो चीन के खिलाफ बहुत सख्त रुख अपनाएंगे और ये भारत के लिए अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि चीन के खिलाफ अमेरिका का कड़ा रुख भारत के हित में होगा.
यूरोप और एशिया के बड़े देशों से दोस्ती करना चाहते हैं वेंस
जेडी वेंस का मानना है कि यूरोप और एशिया के बड़े देशों से दोस्ती बनाए रखनी चाहिए. वेंस ने भले ही अबतक भारत का नाम नहीं लिया है, भारत एशिया के बड़े देशों की लिस्ट में आता है. हालांकि, ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भारत और पीएम मोदी को अपना अच्छा दोस्त बता चुके हैं.
यूक्रेन-रूस युद्ध पर वेंस का नजरिया कुछ अलग है. उनका कहना है कि अमेरिका को यूक्रेन को अब और फंड नहीं देना चाहिए. उनका मानना है कि यूक्रेन को रूस से बात कर लेनी चाहिए, क्योंकि पश्चिमी देश उसकी मदद करते-करते थक गए हैं और यूरोप के लोग परेशान हैं. वहीं वेंस ये भी चाहते हैं कि यूरोप खुद अपनी सुरक्षा पर ध्यान दे और खुद ही ज्यादा पैसा भी खर्च करे, ताकि अमेरिका चीन पर ध्यान दे सके.
अगर अमेरिका यूरोप से ध्यान हटाकर एशिया पर फोकस करेगा तो भारत के लिए ये अच्छा हो सकता है. हाल ही में जब पीएम मोदी रूस के दौरे पर गए थे. वहां पीएम मोदी और व्लादिमीर पुतिन को गर्मजोशी से मुलाकात करते देख दुनियाभर के देशों को मिर्ची लगी थी. यूरोप के कई देश नाराज हो गए थे. ऐसे में अगर अमेरिकी में ट्रंप-वेंस सरकार होती है तो भारत-रूस के रिश्तों पर कोई दबाव नहीं होगा.
भारत की क्या है मुश्किल
रूस-यूक्रेन के अलावा उधर मध्य पूर्व में इजरायल का लंबे समय से हमास और फिलिस्तीन से युद्ध चल रहा है. भारत तो हमेशा से इजरायल और फिलिस्तीन दोनों से अच्छे संबंध रखने की कोशिश करता रहा है. यहां तक कि भारत वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनी लोगों की मदद भी करता रहा है. मगर जेडी वेंस पूरी तरह से इजरायल के समर्थक हैं. वह चाहते हैं कि अमेरिका को इजरायल की युद्ध में ज्यादा से ज्यादा मदद करनी चाहिए. वह फिलिस्तीनी लोगों को ‘कट्टरपंथी’ तक बता चुके हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने ये भी कहा है कि गाजा युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कॉलेज को सरकारी पैसा नहीं मिलेगा.
ऐसी स्थिति में भारत को सोचना होगा कि कैसे इस मुश्किल स्थिति में संतुलन बनाकर रखा जाए. एक तरफ अमेरिका जैसा बड़ा दोस्त है तो दूसरी तरफ फिलिस्तीन के साथ पुराने रिश्ते. खैर, ये चिंता की बात तभी है जब ट्रंप और वेंस चुनाव जीतकर अमेरिका की सत्ता में आ जाए.







