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लोकसभा चुनावों से तय होगा बिहार विधानसभा 2025 का भविष्य

UB India News by UB India News
May 23, 2024
in पटना, बिहार, ब्लॉग
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लोकसभा चुनावों से तय होगा बिहार विधानसभा 2025 का भविष्य
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2024 का लोकसभा चुनाव देश के लिए जितना महत्वपूर्ण है, उससे कम बिहार के लिए नहीं। बिहार विधानसभा के अगले साल होने वाले चुनाव की इबारत भी इस साल हो रहे लोकसभा चुनाव में ही लिखी जाएगी। कई नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की पोल पट्टी तो खुलेगी ही, अगले साल के लिए नए सियासी समीकरण की आधारशिला भी चार जून, 2024 को पड़ जाएगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी यह आकलन होगा कि मोदी मैजिक बरकरार है या बेअसर हो गया है। अगर मोदी मैजिक फेल हो जाता है तो ऐसी स्थिति में विपक्ष में सत्ता संग्राम छिड़ना पक्का है। यह आशंका इसलिए कि विपक्षी गठबंधन में शामिल हर दल के अपने-अपने पीएम फेस हैं।

पीएम पद पर विपक्ष में भिड़ंत संभव
हालांकि मोदी मैजिक फेल होने या विपक्षी ध्रुवीकरण की सफलता गाछे कटहर ओठे तेल की कहावत जैसी बात है, पर अलग-अलग राज्यों में चुनावी परिदृश्य की मीडिया रिपोर्ट्स देख कर और चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले आए ओपिनियन पोल के अनुमानों से तो यही लगता है कि संसद में दूसरे-तीसरे नंबर पर बंगाल और महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टियां ही आ सकती हैं। हालांकि तीसरे नंबर के और भी दावेदार हो सकते हैं। यह जीत कर संसद पहुंचे विपक्षी उम्मीदवारों की संख्या पर निर्भर करता है। सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस का परफॉर्मेंस भी तब मायने रखेगा। कांग्रेस 52 का अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ कर आगे निकलती है या पीछे भागती है, यह देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस को चुनाव में सुफल मिले या उसकी दुर्गति हो, पर श्रेय के असल हकदार तो राहुल गांधी ही होंगे। कांग्रेस को भी इस चुनाव में पता चल जाएगा कि राहुल पर अब भी दांव लगाने की गुंजाइश बची है या संगठन में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। खैर, यह तो महज काल्पनिक बातें हैं, वास्तविकता तो चार जून को पता चल ही जानी है।

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लालू-तेजस्वी की जोड़ी चौंका पाएगी!
विपक्षी दलों का बिहार में महागठबंधन बना कर लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने राज्य स्तर पर जो प्रयोग किया है, उसके सुफल आने के संकेत भी मिल चुके हैं। पहला सुफल महागठबंधन का यह रहा कि नौ साल पहले 2015 में बिहार में उसकी सरकार बन गई थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में भी महज 12 सीटों की कमी से महागठबंधन के सामने दिख रही कुर्सी पर दूसरा कोई आकर बैठ गया। खैर, छोटे स्तर पर विपक्षी गोलबंदी और उसके बेहतर नतीजे तो महागठबंधन के प्रयोग से ही संभव हुए। पर, अब चार साल बीत गए हैं। इस बीच राजनीति में नए प्रयोग भी खूब हुए हैं। तीसरे नंबर की पार्टी जेडीयू के नेता नीतीश कुमार को पहले नंबर की पार्टी भाजपा ने सीएम बना दिया। भाजपा ने नीतीश के लिए त्याग की जो मिसाल कायम की, उसका दुष्परिणाम भी उसे झेलना पड़ा। दो साल बाद ही नीतीश ने आरजेडी से हाथ मिला लिया। फिर दो साल बाद नीतीश भाजपा के साथ मिल गए। यानी चार साल में नीतीश ने राजनीति में पाला बदल के तीन प्रयोग किए। सबसे चौंकाने वाला सियासी प्रयोग नीतीश ने किया। विपक्षी गठबंधन की बुनियाद रखने वाले नीतीश अब सत्ता पक्ष के ही गुण गाने लगे हैं। बड़े भाई बता कर लालू यादव की बृहद वंशावली पर नीतीश सवाल दर सवाल दाग रहे हैं। राजनीति में प्रयोग का सिलसिला इतने तक ही नहीं थमा। पांच सांसदों की पार्टी के सहयोग से मोदी के मंत्री बने नेता पशुपति पारस की पार्टी को भाजपा ने कोई भाव ही नहीं दिया। भाजपा का एक अभिनव प्रयोग यह रहा कि इकलौता सांसद अपनी पार्टी के लिए एनडीए में पांच सीटें पा गया। अब सवाल उठता है कि राजनीति में लगातार हो रहे प्रयोगों के दौर में लालू यादव का 1990 की जातीय गोलबंदी का नुस्खा काम आता है या तेजस्वी की M-Y के साथ आरजेडी को BAAP (Bacward, Agade, Aadhi Abadi, Poor) का स्वरूप देना। सच में बिहार के विपक्षी दलों का महागठबंधन लोकसभा चुनाव के परिणामों से चौंकाता है या फुस्स हो जाता है, इसके लिए चार जून तक इंतजार करना होगा।

सहनी की ताकत का भी पता चलेगा
बिहार में अभी आरजेडी के सबसे बड़े खैरख्वाह विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी हैं। उनका दावा है कि वे निषादों के नेता हैं। इस चुनाव में यह भी साफ हो जाएगा कि सहनी वाकई निषादों के नेता हैं या सिर्फ निषाद नेता हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में सहनी की पार्टी के चार प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे थे। अवांछित सफलता से सहनी ऐसे अकबकाए कि गठबंधन के खिलाफ ही आवाज बुलंद करने लगे। बिहार में भाजपा के साथ चल रही सरकार में शामिल सहनी उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ ही ताल ठोंकने पर आमादा हो गए। नीतीश ने सहनी को विधान परिषद में दोबारा जाने का मौका ही नहीं दिया। सहनी का मंत्री पद तो गया ही, उनके सभी विधायक भी भाजपा के शरणागत हो गए। अब वे आरजेडी के साथ हैं। साथ भी ऐसे कि वे अपने को तेजस्वी यादव के बरक्स मानने लगे हैं। न भी मानते हों, पर ऐसा दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे। अगर महागठबंधन बिहार में चौंकाने वाला परिणाम नहीं दिखाता है तो इसमें सहनी की भी बराबर की हिस्सेदारी होगी। तब अपनी सीटें काट कर सहनी को तीन लोकसभा सीटें देने वाला आरजेडी उन्हें किस करवट बैठाएगा, यह देखने वाली बात होगी।

विपक्ष में हैं कम से कम तीन पीएम
विपक्षी दलों का गठबंधन बनने के पहले से ही विपक्षी दलों में पीएम फेस बनने की होड़ लग गई थी। नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की पहल शुरू की तो उनका नाम पीएम उम्मीदवार के रूप में उभरा। उनके इनकार के बाद कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रोजेक्ट करना शुरू किया। ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खरगे का नाम उछाल कर न सिर्फ नीतीश की राह रोकी, बल्कि राहुल को भी किनारे कर दिया। अब तो टीएमसी की ममता और कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खरगे में इकतरफा प्यार हो गया है। ममता ने अपने बंगाल में कांग्रेस को भाव नहीं दिया, फिर भी खरगे उन्हें इंडी अलायंस का ही नेता बताते हैं। ममता भी गाहे-बगाहे बताती रहती हैं कि वे ही इंडी अलायंस का नेतृत्व करेंगी। अभी अखिलेश यादव लोकसभा में आने वाली सीटों की संख्या का इंतजार कर रहे हैं। बाद में वे भी पीएम पद का दावा ठोंक दें तो कोई आश्चर्य नहीं। वैसे अनुमानों में नरेंद्र मोदी की वापसी पक्की बताई जा रही है, लेकिन जनता का मिजाज भांपना आसान नहीं। अगर जनता ने मोदी को नापसंद किया तो विपक्षी दल अपने-अपने नफा-नुकसान का आकलन कर पीएम पद की दावेदारी से शायद ही परहेज करें। खासकर, ममता और अखिलेश। पर, यह कल्पना तभी साकार होगी, जब सीटों के मामले में टाप थ्री पार्टियां निर्णायक स्थिति में हों।

नीतीश ठगा महसूस करेंगे या विजयी?
नीतीश कुमार के लिए इस बार लोकसभा का चुनाव तो राजनीतिक अस्तित्व बचाने का बन गया है। तमाम अच्छे कामों के बावजूद अब वे लोगों के बीच तेजी से अलोकप्रिय होते जा रहे हैं। इसकी बानगी 2020 के विधानसभा चुनाव में मिल चुकी है। उनकी पार्टी जेडीयू को 43 सीटों पर सिमटना पड़ा था। वैसे नीतीश कुमार ने बहार का जिस तरह काया पलट किया है, वह उनका सकारात्मक पक्ष है, पर बार-बार के पाला बदल ने उन्हें काफी डेंट किया है। बिहार में अगर एनडीए को नुकसान होता है तो इसकी एकमात्र वजह नीतीश कुमार ही होंगे। पाला बदल के कारण बढ़ती अलोकप्रियता के कारण वे किसी भी गठबंधन के लिए अब बोझ बन गए हैं। इसके लिए उनकी उम्र को कारण मानना उचित नहीं लगता, क्योंकि उनकी या उनसे अधिक उम्र वाले मुख्यमंत्रियों का भी देश में रिकार्ड रहा है। उनकी याददाश्त जरूर कमजोर हुई है। इस साल कम से कम तीन चुनावी सभाओं में एनडीए को चार हजार सीटों से जिताने की उनकी अपील याददाश्त कमजोर होने का ही लक्षण है। अगर अपने कोटे की सीटों पर जीत दर्ज करने में नीतीश नाकाम हुए तो जेडीयू को बचा पाना उनके लिए मुश्किल होगा। तब भाजपा को भी यह सोचना पड़ेगा कि उन्हें आगे बतौर सीएम साथ रखा जाए या स्वतंत्र राह ही उचित है।

‘मोदी मौजिक’ बरकरार है या बेअसर
इस बार लोकसभा का चुनाव भाजपा उम्मीदवार सिर्फ तकनीकी तौर पर लड़ रहे हैं। असली लड़ाई तो नरेंद्र मोदी लड़ रहे। भाजपा में मोदी का कद कितना बढ़ गया है कि इस बार भाजपा ने चुनाव घोषणापत्र में गारंटी नहीं दी। मोदी की ही गारंटी दिखी। चुनाव प्रचार में भी मोदी ने जितनी मेहनत की है और पसीना बहाया है, उससे भी लगता है कि यह चुनाव मोदी बनाम विपक्ष का है। लोकसभा क पिछले दो चुनावों में मोदी मैजिक का जबरदस्त असर दिखा। भाजपा के साथ एनडीए में शामिल दलों की सीटें भी बढ़ती रहीं। इस बार के परिणाम यह भी बताएंगे कि मोदी मैजिक बरकरार है या बेअसर हो गया है। ऐसा हुआ तो भाजपा को भी मोदी के विकल्प तलाशने में अधिक देरी नुकसानदायक साबित होगी। मोदी मैजिक का पता सीटों की संख्या से ही चल जाएगा, भले वे सरकार बनाने भर की संख्या हासिल कर लें।

कांग्रेस से नफा-नुकसान आंकेगा RJD
बिहार में कांग्रेस आरजेडी की भरोसेमंद सहयोगी साबित हुई है। पर, 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के परफॉर्मेंस ने आरजेडी को निराश ही किया था। आरजेडी नेताओं को अब भी इस बात का मलाल है कि कांग्रेस को 70 सीटें देकर उसने बड़ी भूल की थी। सिर्फ 19 ही जीत पाए थे। अगर 70 की आधी सीटों पर ही आरजेडी के उम्मीदवार होते तो शायद आज बिहार में महागठबंधन की सरकार होती। यही वजह रही कि इस बार लाख छटपटाने के बावजूद आरजेडी ने टिकट बंटवारे में कांग्रेस की दलीलें नहीं सुनीं। कांग्रेस को औरंगाबाद और पूर्णिया की सीटें न देना आरजेडी की रणनीति का हिस्सा रहा। अगर कांग्रेस अपनी नौ सीटों पर आशातीत सफलता हासिल नहीं करती है तो आरजेडी के आगे उसे और जलील होना पड़ेगा।

चिराग, मांझी, कुशवाहा कितने कारगर
इस बार लोकसभा चुनाव में यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि खुद को दलितों का नेता बताने वाले हम (से) के नेता और पूर्व सीएम जीतन राम मांझी कितने पानी में हैं। यह भी पता चल जाएगा कि चिराग पासवान अपने चाचा और उनकी मंडली को दरकिनार कर अपनी ताकत दिखा पाते हैं, या फेल होते हैं। अब तक कई पार्टियां बना चुके या पाला बदलते रहे उपेंद्र कुशवाहा की अपने समाज में लोकप्रियता का एहसास भी भाजपा को हो जाएगा। बहरहाल, लोकसभा चुनाव में ही बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की इबारत लिखी जानी है। चुनाव परिणामों के बाद नए समीकरण बनने तय हैं। यह एनडीए और इंडी अलायंस यानी दोनों खेमों में दिखेगा।

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