बांकीपुर उपचुनाव में अपनी सीट को बचाना बीजेपी के लिए चुनौती बन गया है। सियासी परिस्थिति को देखते हुए बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। ओवरऑल बांकीपुर में क्या चल रहा है, इसे लेकर वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में अब नीतीश जी को भी प्रचार में उतार दिया है। अभी मैंने नीतीश जी की एक वीडियो अपील सुनी, जिसमें उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने की अपील की है।
बांकीपुर से विधायक थे नितिन नवीन
उन्होंने आगे कहा हैकि यह वही क्षेत्र है जहां से नितिन नवीन पहले भाजपा के विधायक थे। अब वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी वे अपने पुराने विधानसभा क्षेत्र में एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह गली-गली घूमकर अपने दल के उम्मीदवार के लिए वोट माँग रहे हैं। यह अपने आप में बताता है कि भाजपा इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही है।
बीजेपी इतनी चिंतित क्यों दिखाई दे रही है- तिवारी
उन्होंने एक बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने पूछा है कि सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी इतनी चिंतित क्यों दिखाई दे रही है? इसकी कई वजहें हैं। पहली बात, उम्मीदवार के चयन में भाजपा ने जिस तरह का भ्रम पैदा किया, उससे पार्टी की तैयारी पर सवाल खड़े हुए। पहले एक नाम की घोषणा हुई, फिर उसे बदलकर दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया गया। व्यक्तिगत रूप से मुझे नए उम्मीदवार से सहानुभूति है, लेकिन मेरी राय में उनकी चुनावी शैली ऐसी नहीं है जो नए वोट जोड़ सके। कई बार लगता है कि उससे लाभ कम और नुकसान अधिक होता है।
बांकीपुर में हो रहे मुकाबले पर बोले वरिष्ठ नेता
शिवानंद तिवारी ने चुनाव में मुकाबले की बात की है। उन्होंने कहा है कि इस चुनाव में असली मुकाबला किसके बीच है? मेरी समझ में इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुख्य लड़ाई भारतीय जनता पार्टी और प्रशांत किशोर के बीच है। तेजस्वी यादव भी आए, उन्होंने रोड शो किया। लेकिन केवल तीन-चार दिन के रोड शो से चुनाव की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हां, यदि पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में राष्ट्रीय जनता दल का वोट बढ़ जाता है, तो उसे उनकी उपलब्धि माना जा सकता है।
छात्र आंदोलन का बांकीपुर चुनाव पर इफेक्ट!
शिवानंद तिवारी बांकीपुर उपचुनाव पर छात्र आंदोलन के असर की बात भी करते हैं। वे कहते हैं कि हाल में छात्रों और नौजवानों का जो आंदोलन हुआ, उसका असर भी इस चुनाव पर पड़ता दिखाई दे रहा है। उस आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। पटना सहित बिहार के कई जिलों में आंदोलन में शामिल छात्रों और युवाओं पर मुकदमे दर्ज हुए और अनेक लोगों को जेल भी भेजा गया। स्वाभाविक है कि इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक असर भी पड़ेगा और उसका रुख भाजपा के खिलाफ ही जाएगा।
बांकीपुर में प्रशांत किशोर का पलड़ा भारी
उन्होंने आगे कहा कि प्रशांत किशोर ने भी बहुत पहले से बांकीपुर में अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया था। उन्होंने बड़ा जोखिम उठाया है। चुनाव प्रबंधन और चुनावी रणनीति के क्षेत्र में उन्हें अनुभवी माना जाता है। देश के अनेक राज्यों में वे राजनीतिक दलों के लिए रणनीति बनाते रहे हैं और चुनाव जिताने का अनुभव रखते हैं। इसलिए यह मानना कठिन है कि वे बिना पूरी तैयारी, बिना सर्वे और बिना राजनीतिक आकलन के स्वयं चुनाव मैदान में उतर गए होंगे। जो व्यक्ति वर्षों तक दूसरों के लिए चुनावी गणित तैयार करता रहा हो, वह अपने चुनाव में बिना पूरी तैयारी के उतर जाएगा, यह बात सहज नहीं लगती।
नीतीश कुमार फैक्टर आज भी जरूरी- तिवारी
उन्होंने इस चुनाव में खासतौर पर पीके का पलड़ा भारी बताया है। वे कहते हैं कि मुझे जो राजनीतिक माहौल दिखाई दे रहा है, उसमें पलड़ा प्रशांत किशोर की ओर कुछ भारी नजर आता है। यह अंतिम सच नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता और मतपेटी करती है। लेकिन चुनाव प्रचार के मौजूदा दौर में यही तस्वीर उभरती दिखाई देती है।
अब रही बात नीतीश कुमार की अपील की। उसका कितना असर होगा, यह तो चुनाव परिणाम बताएगा। लेकिन भाजपा का नीतीश जी से वीडियो संदेश जारी कराना और उसे गली-गली सुनवाना एक राजनीतिक संदेश जरूर देता है। इससे यही लगता है कि भारतीय जनता पार्टी स्वयं भी मानती है कि बिहार की राजनीति में आज भी नीतीश कुमार का प्रभाव उसके लिए महत्वपूर्ण है और उनके सहयोग के बिना चुनावी लड़ाई जीत पाना उसके लिये कठिन है।







