पटनाः बिहार की राजनीति में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार भाजपा के लिए कैसे संजीवनी हैं, ये बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के अंतिम दौर में पता चल गया। उसके प्रभाव का एक तमाशा यह भी कि जन सुराज के नायक प्रशांत किशोर इस बयान के असली और नकली बहस के बीच चुनाव से खुद को अलग करने की बात कह डाली। आखिर क्यों बौखला गए जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के चुनावी अपील से। समझते हैं।
57 सेकंड के वीडियो को लेकर सवाल
यह नीतीश कुमार हैं जिनके सही या फर्जी अपील ने जनसुराज के नायक प्रशांत किशोर को भीतर से हिला दिया है। दरअसल नीतीश कुमार ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा के पक्ष में अपील क्या कर दी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से जन सुराज के नायक प्रशांत किशोर हत्थे से उखड़ गए और यह भी कह गए कि एनडीए की ओर से जारी किया गया 57 सेकंड का वीडियो असली नहीं है, बल्कि इसे एआई तकनीक की मदद से एडिट किया गया है। बात यहीं खत्म नहीं हुई। प्रशांत किशोर ने तो एक कदम आगे बढ़ कर कह डाला कि भाजपा हार के डर से इतनी हताश हो गई है कि पूरा सरकारी महकमा से काम नहीं चला तो बीजेपी के रणनीतिकारों ने नीतीश कुमार का फेक वीडियो जारी कर दिया। हद तो तब हो गई जब प्रशांत किशोर ने इस अपील के सच होने पर उम्मीदवारी वापिस तक ले लेने की धमकी दे डाली।
क्यों संजीवनी है नीतीश कुमार
एक कहावत है हाथी जिंदा तो लाख का, मरा तो सबा लाख का। नीतीश कुमार तो राजनीति के ऐसे कद्दावर नेता हैं जिनका अभी सक्रिय राजनीति का विराम काल की हल्की झलक भर मिली है, फिर भी उनकी एक अपील ने प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकारों को हिला कर रख दिया है तो उस सापेक्ष नीतीश कुमार का राजनीतिक कद आंक सकते हैं। यही वजह भी है कि जब तक भाजपा बिहार में अकेले दम पर राजनीति की उसे वह सफलता नहीं मिली। लेकिन जब से बीजेपी और नीतीश साध साथ आए राजनीति बुलंदी पर चली गई। और अपेक्षाकृत निष्क्रिय नीतीश कुमार ने जब बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के संदर्भ में जनता से अपील की तो कोहराम मचा है।
क्यों हैं नीतीश बिहार की राजनीति की संजीवनी?
वर्ष 1990 के बाद राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक प्रभाव के विरुद्ध बीजेपी या फिर जदयू ने अपने-अपने अंदाज में विरोध का परचम लहराया। लेकिन सफलता तब मिली जब राजद के विरुद्ध वे दोनों साथ आए। और एक अंतराल के बाद 2005 में एक बड़ी ताकत के रूप में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए उभरी। तब एनडीए के प्लेटफार्म से राजद को जदयू और बीजेपी ने साथ साथ रह कर सत्ता की कुर्सी से हटाया। तब उसे मंडल काल का विभाजन माना गया और जदयू के साथ भाजपा ने भी सत्ता का स्वाद लिया था।
आखिर हुआ क्या था?
जीवन पद्धति का एक तरीका है सिंबायोसिस (सहजीवन) है। इस रिलेशन के साथ रहना का मतलब है एक दूसरे को सहयोग करना। बीजेपी और जनता दल इसी मूड में राजनीति को साथ साथ लेकर एक सफल राजनीति समीकरण बनाए और कई वर्षों तक सत्ता भी चलाए। इसके मूल में मंडल वाद के दो नायकों यानी लालू यादव और नीतीश कुमार का दो ध्रुव पर खड़ा होना। लालू यादव की राजनीतिक ताकत नीतीश से अलग होने पर आधी हो गई और बीजेपी की ताकत बढ़ते क्रम में थी। बिहार की राजनीति का ध्रुवीकरण जंगलराज के फॉर और अगेंस्ट विभाजित ही। ऐसे में बीजेपी के साथ जदयू की राजनीति एक नए समीकरण के साथ खड़ी हुई। बीजेपी सवर्ण और वैश्य और जदयू मुख्यरूप से लव कुश समीकरण के साथ एक दूसरे के पूरक बने। यह समीकरण जब वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में टूटा तो बीजेपी 53 सीटों पर सिमट गई थी।







