2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उन इलाकों में जनाधार को विस्तृत करना चाह रही है जहां संभावनाएं हैं. पश्चिम बंगाल में बीजेपी को अच्छी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. लेकिन यहां भाजपा के करिश्माई सेनापति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचंड चुनावी लहर का मजबूती से सामना करने वाली तृणमूल नेता ममता बनर्जी मजबूती से डटी हुई हैं. कभी वामपंथ के गढ़ के रूप में परिभाषित बंगाल में 2016 के बाद से परिदृश्य बदलता गया है. अब भाजपा के लिए पूर्व का यह सूबा बेहद अहम बन गया है. ममता बनर्जी ने भी 2021 के विधानसभा चुनावों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है, तो क्या अब राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका में आने की बारी भाजपा की है? मनजीत ठाकुर की पुस्तक ‘बंगाल में भाजपा‘ में इस मुद्दे को विस्तार से जानें- अध्याय 11 (इक्कीस में हाफ)
2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों को अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है. हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप इन नतीजों को कहां से खड़े होकर देखना चाहते हैं. सबसे पहली चीज तो यही दिखती है कि ममता बनर्जी ने बहुत ही आसानी से चुनाव जीत लिया और मीडिया में ‘हाइप’ तैयार करने के बावजूद भाजपा तृणमूल कांग्रेस को टक्कर नहीं दे पाई.
चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो 2021 में भाजपा का वोट-शेयर 38.1 फीसदी रहा जबकि तृणमूल कांग्रेस का 48.59 फीसदी. ममता बनर्जी को 294 में से 215 और भाजपा को 77 सीटों पर जीत मिलीं. बेशक, तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा से करीबन 10 फीसदी ज्यादा वोट हासिल किए और इस अंतर को छोटा नहीं माना जा सकता. भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में 40.30 फीसदी वोट मिले थे. इसका अर्थ यह हुआ कि 2019 के मुकाबले 2021 में भाजपा को 2 फीसद वोट कम मिले. दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस की वोट हिस्सेदारी 2019 में 43.30 फीसदी से बढ़कर 48.20 फीसदी हो गई. अगर भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव के हिसाब से जीत मिलती, तो करीब 121 विधायक भाजपा के होते लेकिन ममता का वोटशेयर बढ़ने की वजह से भाजपा 77 सीटों पर ही जीत सकी.
वोट-शेयर और सीटों की संख्या के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस की पश्चिम बंगाल में अब तक की सबसे बड़ी जीत थी. लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव की तुलना में भाजपा का प्रदर्शन भी एक बड़ी जीत मानी जाएगी. राज्य में भाजपा के प्रदर्शन में एक ‘खास पैटर्न’ है. उसे लोकसभा में जितना वोट-शेयर मिलता रहा है, विधानसभा में उससे कम वोट हिस्सेदारी रही है. 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास करीबन 17 फीसदी वोट-शेयर था, 2016 विधानसभा चुनाव में महज 10 फीसदी. इसी तरह 2009 के लोकसभा में 6 फीसद से अधिक वोट-शेयर था तो 2011 के विधानसभा में करीबन 4 फीसद.
बहरहाल, 2021 का चुनाव आजादी के बाद पश्चिम बंगाल का पहला ऐसा चुनाव रहा जिसमें कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों का एक भी विधायक नहीं चुना गया. 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाम मोर्चा गठबंधन को 77 सीटों पर जीत मिली थी यानी ठीक उतनी ही सीटें जितनी 2021 में भाजपा को मिली. 2016 में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन का वोट-शेयर 26.2 प्रतिशत था, लेकिन 2021 में इनके खाते में एक भी सीट पर जीत नहीं मिली और वोट-शेयर भी आठ फ़ीसद के आसपास सिमटकर रह गया.
पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार नहीं बना पाई, लेकिन विपक्ष की पूरी जगह उसने अपने पाले में कर ली है. पार्टियां अक्सर सत्ता में आने से पहले विपक्ष की जगह ही हासिल करती हैं और यह काम भाजपा ने माकपा-कांग्रेस को बेदखल करके कर लिया है. बहरहाल, सियासत में ऐसी अप्रत्याशा कम ही हुई है कि कोई दल तीन सीट से उठकर सीधे पूर्ण बहुमत हासिल कर ले.
कई राजनीतिक पंडितों ने पश्चिम बंगाल में भाजपा का विपक्ष बनना यहां की राजनीति के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ बताया है. बीबीसी की एक रिपोर्ट में जादवपुर यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अब्दुल मतीन कहते हैं, “मैं नहीं मानता कि ये धर्मनिरेपक्षता की राजनीति की जीत है. ममता इसलिए जीत गईं क्योंकि मुसलमानों ने एकजुट होकर तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया. यह पॉलिटिकल बाइनरी की जीत है. मतलब ममता ने मुसलमानों के बीच संदेश फैलाने में सफलता हासिल की कि वोट तृणमूल कांग्रेस को करो नहीं तो भाजपा जीत जाएगी. ध्रुवीकरण की राजनीति की जीत को हम भाजपा की हार नहीं मान सकते.”
दरअसल, भाजपा की संभावित सीटों वाली जीत का अनुमान बंगाल में सामुदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर था. पर, असल में प्रदेश में ‘टैक्टिकल वोटिंग’ हुई और उत्तरी बंगाल की अधिकतर सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जीत गए.भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण था जरूर, पर वह उतना मजबूत नहीं था.
बंगाल में बीजेपी की रणनीति
बंगाल में भाजपा ने विकास के मुद्दे को थोड़ा पीछे छोड़ते हुए ममता बनर्जी को थोड़े आक्रामक अंदाज में उत्तर देने की रणनीति बनाई. चुनावी तैयारियों के मद्देनजर राज्य के हर विधानसभा क्षेत्र को पार्टी मुख्यालय से हेल्पलाइन नंबर और इंटरनेट से जोड़ा गया था. खबरों के मुताबिक, अगर कहीं टीएमसी कार्यकर्ता भाजपा कार्यकर्ता को धमकाने पहुंचते थे तो भाजपा के बाकी सदस्य उसकी मदद के लिए पहुंचते थे. भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं की दो श्रेणियां बनाई. पहली श्रेणी 3000 से 5000 की थी और दूसरी, 5000 से 25000 की. पहली टोली का काम था पार्टी के विभिन्न नेताओं के राज्य में आने पर उनके स्वागत के लिए जुटना, जबकि दूसरी टोली विभिन्न जनसभाओं में जुटती थी ताकि विरोधी दलों के कार्यकर्ता किसी अप्रिय स्थिति को अंजाम न दे सकें.
कार्यकर्ताओं के मन में बसे किसी भी किस्म की हिंसा के डर को दूर करने के लिए भाजपा ने ‘झोंपड़ी-झोंपड़ी भाजपा, खोपड़ी-खोपड़ी भाजपा’ अभियान शुरू किया था. भाजपा ने भोजन की आदतों में हल्के परिवर्तन का आगाज भी किया, जिसके तहत मंगलवार को उपवास या शाकाहारी खाने की नई परिपाटी शुरू की गई. अभिवादन का भी नया तौर-तरीका अपनाने की कोशिश की गई. बंगाल में ‘जय श्री राम’ तो सुनाई देने ही लगा, साथ ही ‘राम-राम’ कहना भी शुरू किया गया. इसके साथ ही, एक नया चुनावी नारा भी गढ़ा गयाः कृष्ण-कृष्ण हरे हरे, पद्म (कमल) फूल, घरे-घरे.
रामनवमी और हनुमान जयंती के जुलूसों के जरिए प्रदर्शन कर रही भाजपा के खिलाफ तब वह ममता की रणनीति थी. लोकसभा चुनावों के बाद नैहाटी जैसी जगहों पर अपने पार्टी कार्यकर्ताओं पर हमले के बाद ममता ने ‘बाहरी’ का मुद्दा उछाला था और कहा था, “वे बाहरी हैं और उन्हें बंगाल को गुजरात में बदलने नहीं दूंगी.” ममता को लगा था कि इस रणनीति के तहत वे मूल बंगाली आबादी को अपने पक्ष में कर लेंगी और भाजपा के हिंदू ध्रुवीकरण को रोकने में सफल होंगी. वहीं, भाजपा ने किसी भी तरह के भाषायी या स्थानीयता आधारित ध्रुवीकरण में अपना लाभ ही देखा,
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक
पश्चिम बंगाल में 125 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी या उससे अधिक है. इनमें उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया, कोलकाता, बीरभूम और बर्धमान में 75-80 सीटें हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने इन 125 सीटों में से 81 सीटें जीतीं और 14 में उपविजेता रही. वाम-कांग्रेस गठबंधन 105 सीटों पर दूसरे स्थान पर रहा था.
दक्षिण और उत्तर 24 परगना जिलों में 64 सीटें हैं और वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी क्रमश: 35 और 26 फीसदी है. इन्हीं दोनों जिलो में चक्रवात अम्फान का विनाश हुआ था. और भाजपा ने अपने घर-घर अभियान में राहत वितरण में हुए कथित भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित किया.
भाजपा नेताओं का मानना है कि पार्टी को 2019 में अंदाजन चार फीसद मुस्लिम वोट भी मिले थे, क्योंकि इसके बिना वह उत्तर बंगाल में वह जीत दर्ज नहीं कर पाती. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा ने सक्रिय रूप से मुसलमानों का वोट पाने की कोशिश नहीं की क्योंकि इससे उसके पक्ष में लामबंद वोटों में बिखराव आता. मिसाल के तौर पर, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जनवरी, 2021 से राज्य के बर्दवान जिले से ‘कृषक सुरक्षा अभियान’ और ‘एक मुट्ठी चावल’ योजना शुरू की तो उसमें सघन मुस्लिम आबादी वाले 8,000 गांव शामिल नहीं किए गए.
बंगाल चुनाव में ध्रुवीकरण की चिनगारी को दोनों तरफ से हवा दी गई थी. ममता पहले ही, दूध देने वाली गाय की लात खाना सहने वाला बयान दे चुकी थीं. भाजपा को भी मुस्लिम वोटों के टैक्टिकल वोटिंग का आभास था, इसलिए ऐसे बयान दिए गए जिससे ध्रुवीकरण स्पष्ट हो. मिसाल के तौर पर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने चुनाव प्रचार के दौरान स्पष्ट कहा, “ज़रूरत पड़ी तो बंगाल में भी (गोवध) बंद कर देंगे. यहां के लोग जो चाहेंगे वही होगा. हमें लोगों के मन की बात समझनी पड़ेगी. समाज के आवेग के साथ ही हम काम करेंगे. हम 370 हटा सकते हैं, तीन तलाक़ हटा सकते हैं, तो बंगाल के लोग चाहेंगे तो बीफ़ भी बैन होगा.”
लेकिन दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल में भाजपा ने नौ मुसलमानों को प्रत्याशी बनाया और इनमें तीन महिलाएं थीं. सचाई है कि 2021 का चुनाव पूरी तरह से द्विध्रुवीय रहा. 292 में से 290 सीटों पर तृणमूल या फिर भाजपा को जीत मिली है. एक पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट और एक पर निर्दलीय उम्मीदवार को जीत मिली है. बीबीसी की उसी रिपोर्ट में प्रोफ़ेसर मतीन ने कहा, “बंगाल में जिस मुर्शिदाबाद और मालदा इलाके में सबसे ज़्यादा मुसलमान हैं, वहां तृणमूल के 80 फीसदी से ज़्यादा उम्मीदवार जीते हैं. मतलब बंगाल के 28 फीसदी मुसलमानों ने एकजुट होकर ममता को वोट किया है. लेकिन हिंदू वोट उस तरह से ध्रुवीकृत नहीं हो पाए और ममता को इसीलिए जीत मिली. लेकिन एक समुदाय का वोट इस तरह से एकजुट होगा तो बहुसंख्यकों के बीच क्या इस पोलराइज़ेशन को लेकर कोई संदेश नहीं जाएगा? अगर काउंटर पोलराइज़ेशन हिन्दुओं के बीच भी हुआ तब क्या होगा? और याद रखिए ध्रुवीकरण की पॉलिटिक्स में इसकी आशंका हमेशा रहती है.”
2016 की विधानसभा में कुल 59 मुस्लिम विधायक थे. इनमें से 32 तृणमूल कांग्रेस, 18 कांग्रेस और 9 वाम मोर्चे से थे. 2021 में कुल 44 मुसलमान विधायक चुनकर आए और जिनमें से 43 तृणमूल कांग्रेस के थे और एक अब्बास सिद्दीक़ी इंडियन सेक्युलर फ्रंट से. मुस्लिम वोटों ने टैक्टिकल वोटिंग के जरिए तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में एकमुश्त मतदान किया और इसकी कीमत उन वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस को चुकानी पड़ी, जिनके वह पारंपरिक वोटर थे.
जब पश्चिम बंगाल के लोग विधानसभा चुनावों के पहले चरण में मतदान कर रहे थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पड़ोसी देश बांग्लादेश के दौरे पर थे. ये दौरा इसलिए भी ख़ास था क्योंकि 2021 बांग्लादेश की आज़ादी की 50वीं सालगिरह का साल था. मोदी इस यात्रा के दौरान ओराकांडी के ठाकुरबाड़ी भी गए. बांग्लादेश के गोपालगंज ज़िले में पड़ने वाला ओराकांडी ठाकुरबाड़ी को हिंदुओं के मतुआ समुदाय के लोग अपना तीर्थस्थल मानते हैं.
मतुआ लोग पारंपरिक हिंदू धर्म के एक विशेष संप्रदाय का हिस्सा हैं, जो हरिचंद ठाकुर को अपना देवता मानते हैं. हरिचंद ठाकुर के बारे में ही माना जाता है उन्होंने मतुआ समुदाय की नींव रखी थी. उनका जन्म लगभग 210 साल पहले गोपालगंज (अब बांग्लादेश) के ओराकांडी में हुआ था. मतुआ सिद्धांत बाद में उनके बेटे गुरुचंद ठाकुर के माध्यम से फैल गया.
मतुआ समुदाय मूलतः नामशूद्र हैं. नामशूद्र एक जाति समूह है. मतुआ आंदोलन अविभाजित बंगाल में एक जाति विद्रोह के रूप में शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में पूर्वी बंगाल के फरीदपुर जिले से हुई थी. इसका नेतृत्व हरिचंद ठाकुर ने किया था और उन्होंने मतुआ महासंघ या वैष्णव हिंदू धर्म के मतुआ संप्रदाय की स्थापना की. 1878 में हरिचंद की मृत्यु के बाद, उनके बेटे गुरुचंद ठाकुर ने आंदोलन को बढ़ावा दिया और समुदाय के बड़े वर्गों पर इसका प्रभाव बढ़ाया. इस आंदोलन ने कुछ अन्य दलित समूहों को भी आकर्षित किया।
मतुआ और बीजेपी
पश्चिम बंगाल में एक समय इन मतुआ लोगों के ज़्यादातर वोट वामपंथी पार्टियों या तृणमूल कांग्रेस के पास गए लेकिन 2019 के चुनाव के समय स्थिति बदल गई. उस समय, मतुआ लोगों का एक वर्ग तृणमूल कांग्रेस के साथ था और एक अन्य तबका शांतनु ठाकुर की अगुवाई में भाजपा के साथ था. शांतनु ठाकुर भाजपा के टिकट पर संसद सदस्य बने. पश्चिम बंगाल के 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 14 के नतीजे काफी हद तक मतुआ वोटों पर निर्भर करते हैं और कुल 60 से 70 विधानसभाओं में 5 से 10 हजार मतुआ मतदाता हैं.
भाजपा के लिए मतुआ समुयाद ऐसे हिंदू शरणार्थी हैं जिन्हें किसी अन्य देश में उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा और इसलिए सीएए के तहत उन्हें नागरिकता प्रदान करने का आश्वासन पार्टी ने दिया था. ऐसे में, बंगाल में, दक्षिणी हिस्से में मतुआ जाति समूह और उत्तर में राजबंशी जाति समूह, सीएए के मामले को आगे बढ़ाने के लिए 2019 के बाद से भाजपा के लिए मुख्य लक्षित समूह बन गए थे.
शुरुआत में यह समुदाय राजनीतिक रूप से कांग्रेस के पीछे गोलबंद था लेकिन 1977 के बाद इसका झुकाव वाम मोर्चे की ओर हो गया. 2009 में, वाम मोर्चे और ममता बनर्जी दोनों ने बॅड़ोमा से संपर्क किया था लेकिन बोड़ोमा का आशीर्वाद हासिल करने में ममता कामयाब रहीं. 2010 में बॅड़ोमा ने बनर्जी को मतुआ महासभा का मुख्य संरक्षक बना दिया. ममता बनर्जी ने भी इस समुदाय का भरोसा जीतने की कोशिशें जारी रखीं और रेल मंत्री के रूप में उन्होंने ठाकुरनगर रेलवे स्टेशन को संवारा और फिर जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने ठाकुरनगर में मतुआ नेताओं के नाम पर स्कूल और कॉलेज बनाए.
ममता बनर्जी ने बॅड़ोमा के दो बेटों, कपिल कृष्ण ठाकुर को लोकसभा और मंजुल कृष्ण ठाकुर को विधानसभा के लिए तृणमूल कांग्रेस के टिकट दिए. कपिल कृष्ण ठाकुर की मृत्यु के बाद ठाकुर परिवार में 2014 में विभाजन हो गया और जब उनकी पत्नी ममता बाला ठाकुर ने उनकी संसदीय सीट संभाली. 2015 में, मंजुल ठाकुर अपने बेटों सुब्रत ठाकुर और शांतनु ठाकुर के साथ भाजपा में शामिल हो गए. हालांकि, 2016 के विधानसभा चुनाव में भी मतुआ समुदाय ने ममता को जमकर वोट दिया था.
2019 के लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के बाद भाजपा के अंदर बंगाल विजय की उम्मीदें बढ़ गईं. मोटे तौर पर इन उम्मीदों के पीछे ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ सत्ताविरोधी रुझान और तृणमूल कांग्रेस से मोहभंग भी था.
मतुआ समुदाय के साथ ही भाजपा ने बंगाल में जातीय समीकरणों को साधने पर भी जोर दिया था. 294 सदस्यों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 84 सुरक्षित सीटें हैं, जिनमें 68 अनुसूचित जाति के लिए और 16 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को 45 सुरक्षित सीटों पर जीत मिली है और भाजपा को 39 सुरक्षित सीटों पर.
इसके अलावा सूबे में महिला मतदाता काफी जागरूक हैं. उन्हें अपने पाले में करने के लिए भी ममता बनर्जी और भाजपा दोनों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. संशोधित मतदाता सूची के मुताबिक, राज्य के 7.18 करोड़ मतदाताओं में से 3.59 करोड़ यानी करीब 50 प्रतिशत महिलाएं हैं. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि कोई भी पार्टी इनकी अनदेखी का खतरा नहीं मोल ले सकती. असल में, बंगाल में महिला मतदाता राजनीतिक रूप से इतनी जागरूक हैं कि सिर्फ पति या घर के मुखिया के कहने पर वोट नहीं देती. इनके पास अपनी राजनीतिक सोच और विचारधारा भी है.
अन्य समुदायों की तरह पश्चिम बंगाल में महिला मतदाता भी वाम मोर्चे की समर्थक थीं और सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों के बाद उनका झुकाव ममता बनर्जी की तरफ हुआ. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने महिला वोटरों में अपनी पैठ बनाई थी और उसके बाद ममता बनर्जी ने उन्हें वापस अपने पाले में खींचने की कोशिशों को धार देनी तेज कर दी. और इसी के तहत तृणमूल कांग्रेस के गैर-राजनीतिक मोर्चे ‘बोंगो जननी’ का गठन किया गया.
बंगाल की लड़ाई में महिलाओं को कुछ अतिरिक्त तवज्जो दी गई. ऐसा नहीं था कि केवल महिलाओं की संख्या ही वह फैक्टर था जिसकी वजह से सभी दल उनके आगे हाथ जोड़ने को विवश हो रहे हों. महिलाएं बड़ी संख्या में मतदान के लिए निकलने लगी थीं जो असल में खेल बदलने वाला साबित होने लगा है. मिसाल के तौर पर, बंगाल के चुनावों से कोई छह महीने पहले हुए बिहार विधानसभा चुनाव में पुरुषों (54.7 फीसदी) की तुलना में महिलाएं (59.7 फीसदी) ज्यादा संख्या में मतदान के लिए निकलीं. यही वजह रही कि बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस, इसकी प्रबल प्रतिद्वंद्वी भाजपा और यहां तक कि कांग्रेस ने भी अपने-अपने महिला मोर्चे को सक्रिय कर दिया.
राज्य में 3.59 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं की लगभग आधे के बराबर हैं. एक वक्त था जब मतदान के दिन महिलाओं को धमकी दी जाती थी कि वह अपने पुरुषों को घर में ही रखें. लेकिन, राज्य में भाजपा की आमद ने महिलाओं को अपने अधिकारों को लेकर मुखर बना दिया. महिलाएं खुलकर तृणमूल नेताओं से सवाल पूछने लगी थीं और ममता को धैर्य से उनकी बात सुननी पड़ रही थी. पहले वाली बात होती तो ममता उन्हें गिरफ्तार करा देतीं, जैसा कि उन्होंने 2013 में किया था जब एक किसान ने उनसे राजनीतिक रैली के बीच बढ़ती उर्वरक कीमतों के बारे में पूछने की कोशिश की थी.
दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ममता को नींद से जगा दिया. ममता के संदेशों को राज्य के कोने-कोने तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ‘बंगो जननी वाहिनी’ को दी गई. इसके साथ ही तृणमूल ने भाजपा के आदिवासी घरों में जाकर उनके नेताओं के भोजन करने के अभियान के खिलाफ एक अभियान छेड़ा जिसका नाम उन्होंने रखाः रान्ना घॅरे, रान्ना हॅबे (रसोई घर में सिर्फ रसोई बनेगा). दूसरी तरफ, भाजपा ने उनपर लगातार हमले किए और राज्य में ‘आर नॉय महिला असुरक्षा’ अभियान जोर-शोर से चलाया.
भाजपा ने अपनी बूथ प्रबंधन रणनीति में महिलाओं को शामिल करने और उनके साथ हर बूथ और मंडल में पदयात्रा से लेकर प्रभातफेरी जैसी गतिविधियों की एक शृंखला आयोजित की. हालांकि, तृणमूल ने महिला उम्मीदवारों को उतारने में काफी दरियादिली दिखाई है और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसकी 41 फीसद महिला उम्मीदवार थीं. ममता बनर्जी ने महिलाओं के कल्याण के लिए बहुत सारी योजनाओं की शुरुआत की थी.
बात लोकसभा चुनाव 2024 की
अब जब लड़ाई 204 के लोकसभा चुनाव की है तो इस बार भी वही बातें और घटनाएं सामने आने लगी हैं जो 2021 के विधानसभा चुनावों के केंद्र में थीं. बीजेपी मतुआ समुदाय और महिला मतदाताओं का समर्थन जुटाने में लगी है. विधानसभा में मजबूत विपक्ष के नाते निश्चित ही लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में कुछ असर जरूर देखने को मिलेगा.







