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90 के दशक की धमक…….. !

UB India News by UB India News
March 23, 2024
in खास खबर, पटना, बिहार, संपादकीय
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90 के दशक की धमक…….. !
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लोकसभा चुनाव के बहाने बिहार की राजनीति में परोक्ष-प्रत्यक्ष तौर पर इस बार बाहुबलियों की धमक साफ सुनाई देगी। इसके लिए बिसात बिछने शुरू हो गए हैं। कई ऐसे चेहरों के चुनाव लड़ने की इस बार फिर चर्चा होने लगी है, जो अर्से से नेपथ्य में चले गए थे। आरजेडी में लालू प्रसाद यादव की सक्रियता का कमाल है कि कई ऐसे अधिकतर चेहरे खुद या परिजनों के माध्यम से आरजेडी के टिकट पर लोकसभा चुनाव में ताल ठोंकने के लिए बेताब दिखते हैं। इसे सुन-जान कर 80-90 के दशक की राजनीति की याद आने लगी है।

मुन्ना शुक्ला को आरजेडी से टिकट देंगे लालू?
मुन्ना शुक्ला का मूल नाम विजय कुमार शुक्ला है। हाजीपुर लोकसभा सीट के तहत आने वाली लालगंज सीट से 15 साल तक यानी तीन बार वे विधायक रहे। बताते हैं कि आरंभ में मुन्ना शुक्ला का अपराध की दुनिया से कोई वास्ता नहीं था। पर, अपने ठेकेदार भाई छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उन्होंने हथियार उठा लिया। छोटन की हत्या का आरोप उस वक्त पिछड़ी जाति से आने वाले बृज बिहारी प्रसाद पर लगा। वृज बिहारी प्रसाद भी छोटन शुक्ला की तरह ही जुर्म जगत के बादशाह थे। वर्चस्व की जंग में छोटन शुक्ला की हत्या करने का आरोप बृज बिहारी प्रसाद पर लगा। तब आमतौर पर शांत रहने वाले मुन्ना शुक्ला ने हथियार उठा लिया। उन्होंने भाई की हत्या का बदला आखिरकार बृज बिहारी प्रसाद की पटना के अस्पताल आईजीआईएमएस में हत्या कर ले लिया। उसके बाद मुन्ना शुक्ला जरायम की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए। उनको तब के बाहुबली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन का साथ भी मिला। गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या का आरोप भी आनंद मोहन के साथ उन पर लगा। उसी मामले में आनंद मोहन और छोटन शुक्ला को सजा हुई। पिछले साल बिहार सरकार ने जेल मैन्युअल में संशोधन कर आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ किया। हालांकि कृष्णैया की पत्नी ने सरकार के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और मामले पर सुनवाई चल रही है। बहरहाल, वर्ष 2000 में मुन्ना शुक्ला ने राजनीति में कदम रखा। पहली बार में ही वे जेल में रहते विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत गए। जेल में रहते ही उन्होंने पीएचडी भी की। फिर तो उन्होंने राजनीति में 15 साल गुजार दिए। अब चर्चा है कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने उन्हें लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने का आश्वासन दिया है। वे वैशाली से चुनाव लड़ सकते हैं, जो लोजपा की सीट रही है।

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अशोक महतो की बीवी को मिला आरजेडी से टिकट
बालू और पत्थर खनन के अवैध धंधे से कुख्यात डान बने अशोक महतो को भी आरजेडी ने इस बार चुनावी जंग में उतरने का मौका दिया है। लंबे समय तक जेल में रहे पिछड़ों के नेता के रूप में मशहूर अशोक शादीशुदा नहीं थे। कानून की पेचीदगियां उनके चुनाव लड़ने में बाधक न बनें, इसलिए लालू प्रसाद यादव ने उन्हें 60-62 साल की उम्र में शादी की सलाह दी, ताकि उनके बदले उनकी पत्नी को टिकट दिया जा सके। अफरातफरी में अशोक ने 46 साल की उम्र की एक स्वजातीय युवती से अब शादी रचा ली है। कहा तो यह भी जाता है कि शादी के दो दिन बाद ही लालू ने अशोक की पत्नी को बुला कर मुंगेर लोकसभा सीट से लोकसभा का टिकट दे दिया है। अशोक की नवादा-शेखपुरा इलाके में पिछड़ों के बीच डान की छवि है। मुंगेर से जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह सांसद हैं। अशोक की बीवी से अब ललन सिंह का मुकाबला होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि अर्से बाद चुनाव मैदान में बीवी के जरिए उतरे अशोक की आपराधिक दबंगई बरकरार है या मतदाताओं का मन अब बदल गया है। वे किसी बेदाग व्यक्ति को चुनते हैं या आपराधिक पृष्ठभूमि के अशोक की बीवी को। कहा तो यह भी जा रहा था कि बाहुबली नेता और फिलवक्त जेल में बंद अनंत सिंह की विधायक पत्नी नीलम देवी भी मुंगेर से लोकसभा का चुनाव लड़ सकती हैं। पर, अब यह सूचना आ रही है कि जेडीयू में होने के कारण उन्हें मुंगेर से चुनाव लड़ने पर पार्टी ने मना कर दिया है।

पप्पू यादव भी पूर्णिया या मधेपुरा से लड़ेंगे चुनाव
पप्पू यादव का आरंभिक जीवन भी आपराधिक रहा है। सीमांचल में वाममंथी नेता अजित सरकार की हत्या के बाद वे चर्चा में आए। उन पर अपराध के दर्जनों मामले दर्ज हैं। पप्पू पहली बार 1990 में निर्दलीय विधायक चुने गए। तब पप्पू यादव का आतंक सीमांचल में इतना था कि लोग उनके नाम से ही भय खाते थे। अशोक महतो की तरह ही पप्पू यादव के भी 17 साल जेल में ही बीते। अजित सरकार की हत्या के मामले में उन्हें इतना लंबा जेल जीवन बिताना पड़ा। अब उनकी पहचान बाहुबली नेता की बन चुकी थी। अजित सरकार की हत्या 1998 में हुई थी। अजित सरकार अपने साथी असफुल्ला और ड्राइवर के साथ निकले थे। इसी बीच उन पर अंधाधुंध फायरिंग हुई। तीनों की मौत हो गई। पप्पू यादव आरोपी बनाए गए। पप्पू तब पूर्णिया से सांसद थे। इसी मामले में वे लंबे समय तक जेल में रहे। अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। पप्पू के साथ राजन तिवारी और अनिल यादव को उम्रकैद की सजा हुई। बाद में पटना हाईकोर्ट ने 2013 में उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।

बाहुबली आनंद मोहन की बीवी लवली मैदान में
आनंद मोहन की राजनीति में एंट्री बरास्ता जुर्म ही 90 के दशक में हुई। जुर्म की दुनिया में उनके नाम की चर्चा तब सर्वाधिक हुई, जब गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया की हत्या हुई। दरअसल मुन्ना शुक्ला के भाई छोटन शुक्ला की जब हत्या हुई तो उनकी शवयात्रा के लिए मुजफ्फरपुर के तत्कालीन डीएम राजीव गौवा ने मौन यात्रा की इजाजत दी। पर, लोगों में गुस्सा इतना था कि मौन का सवाल ही नहीं उठता। सभी लोग जमा थे। आनंद मोहन और छोटन शुक्ला आपराधिक छवि के होने के बावजूद चूंकि सवर्णों के हित रक्षक के रूप में उभरे थे, इसलिए शवयात्रा में वे भी शामिल थे। इसी बीच गोपालगंज के डीएम कृष्णैया मुजफ्फरपुर के रास्ते गोपालगंज लौट रहे थे। गुस्से से उबल रही भीड़ ने जब लाल बत्ती लगी गाड़ी देखी तो सभी टूट पड़े। मार-पिटाई में कृष्णैया की मौत हो गई। छोटना शुक्ला के भाई मुन्ना शुक्ला और आनंद मोहन कृष्णैया हत्याकांड में नामजद हो गए। खैर, आनंद मोहन अब बाहर हैं, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण खुद चुनाव नहीं लड़ रहे। उनकी पत्नी पूर्व सांसद लवली आनंद को जेडीयू ने शिवहर से लोकसभा का टिकट देने का फैसला किया है।

बाहुबली रहे शहाबुद्दीन की पत्नी निर्दलीय लड़ेंगी
सिवान के पूर्व सांसद और मरहूम बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने वैसे तो तीन बार आरजेडी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा, पर कामयाबी नहीं मिल पाई। शहाबुद्दीन के निधन के बाद उन्होंने आरजेडी से दूरी बना ली है। शहाबुद्दीन का सिवान में आतंक कितना था, इसकी एक ही बानगी काफी है। वर्ष 2004 में सिवान के एक स्वर्ण व्यवसायी चंद्रेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू से शहाबुद्दीन ने रंगदारी बतौर दो लाख रुपए मांगे थे। नहीं देने पर उनके दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला। सिवान के साहब के रूप में मशहूर शहाबुद्दीन इसी मामले में जेल गए और तिहाड़ में उन्होंने आखिरकार दम तोड़ दिया। बिहार में मुस्लिम-यादव समीकरण की नींव रखने वालों में लालू के साथ शहाबुद्दीन की गिनती होती थी। पर, उनकी मौत के बाद आरजेडी ने उनके परिवार की सुध नहीं ली। नतीजा यह हुआ कि अब उनकी पत्नी ने सिवान से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है।

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