बिहार में बयानों से राजनीति की दशा भले न बदले, पर दिशा जरूर बदलती रही है। बयान भी ऐसे-ऐसे, जिसे सुन कर किसी का मन-मिजाज बदलना स्वाभाविक है। अभी RJD के राज्यसभा सांसद मनोज झा के ठाकुर के कुएं पर संग्राम छिड़ा हुआ ही था कि RJD के कद्दावर नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने महिलाओं पर अजब बयान देकर माहौल गरम कर दिया है। पिछड़े और ओबीसी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देने वाला महिला आरक्षण विधेयक जब नारी शक्ति वंदन नाम से संसद से पास हो गया तो अब पिछड़े और ओबीसी वर्ग की महिलाओं को आरक्षण के लिए आरजेडी ने न सिर्फ आवाज बुलंद की, बल्कि अब्दुल बारी सिद्दीकी ने ऐसा बयान दे दिया, जिससे बिहार की राजनीति में सनसनी फैल गई। बिहार में बयानों का सियासी नफा-नुकसान हम पहले भी देख चुके हैं। अब सवाल ये कि क्या RJD ‘बिना बवाल, कैसा बिहार’ बनाना चाहता है?
अब्दुलबारी सिद्दीकी के बयान ने शरद की याद दिला दी
महिला आरक्षण की कवायद 1996 में तत्कालीन पीएम एचडी देवेगौड़ा ने शुरू की थी। तब समाजवादी नेता शरद यादव ने इसका विरोध करते हुए कहा था- क्या आप परकटी महिलाओं को सदन में लेकर आना चाहते हैं ? नरेंद्र मोदी की सरकार ने 27 साल बाद जब महिला आरक्षण बिल को संसद के दोनों सदनों से पास करा लिया तो आरजेडी से संबंध रखने वाले बिहार के एक सीनियर लीडर अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भी शरद यादव के अंदाज में ही बयान दे दिया। सिद्दीकी ने कहा- महिला आरक्षण के नाम पर बाब कट और क्रीम-लिपस्टिक वाली महिलाएं आपके घर की महिलाओं का हक मार लेंगी। उनका इरादा पिछड़े और ओबीसी महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग करने का था। लेकिन लहजे में उन्होंने शरद की तरह महिलाओं का ही अपमान कर दिया।
अब ‘ठाकुर का कुआं’ पर मचा घमासान
इसी बीच बिहार में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआं’ पर जुबानी जंग छिड़ी हुई है। राज्य में कोहराम मच गया है। राज्यसभा में पढ़ी आरजेडी सांसद मनोज झा की इस कविता पर बिहार की राजनीति में बवाल पैदा हो गया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा अब से करीब साढ़े चार दशक पहले लिखी इस कविता के पाठ पर ठाकुर (राजपूत) समाज बिदका हुआ है। उसे इसमें अपना अपमान दिख रहा है। राजपूत नेताओं से गर्दन काटने और जीभ खींच लेने जैसी धमकियां मनोज झा को मिलने लगी हैं। धमकियां भी गुमनाम नहीं, बल्कि पार्टी लाइन तोड़ कर हर दल के राजपूत नेता सामने आ गए हैं। आश्चर्य यह कि मनोज झा की बिरादरी से आने वाले जेडीयू नेता और बिहार सरकार के मंत्री संजय झा भी राजपूत नेताओं के समर्थन में आ गए हैं। राजपूतों का खुद को नेता बताने वाले आनंद मोहन भले अभी किसी पार्टी में नहीं हैं, लेकिन उनकी रिहाई आरजेडी और जेडीयू की साझीदारी वाली सरकार की कृपा से ही सुनिश्चत हो पाई। यानी तकनीकी तौर पर भले वे किसी पार्टी में न हों, पर आरजेडी से अलग उनको देखना भूल होगी। सबसे पहले आनंद मोहन के परिवार ने ही मनोज झा द्वारा पढ़ी कविता पर विवाद की शुरुआत की। आरजेडी में उनके विधायक बेटे चेतन आनंद ने पहला हमला बोला तो शाम होते-होते आनंद मोहन ने मैदान संभाल लिया। उन्होंने मनोज झा को जीभ खींच लेने की धमकी दी। उसके बाद जेडीयू और भाजपा के राजपूत नेता भी सामने आने लगे।
ऐसे बयान का 2015 में दिखा था असर
प्रसंगवश यह उल्लेख आवश्यक है कि ऐसे बयानों का चुनावों में क्या असर होता है, यह 2015 में सभी देख चुके हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने उस साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कहा था कि समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा होती रहनी चाहिए। इसे आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने यह कह कर प्रचारित किया था कि भाजपा आरक्षण को खत्म करना चाहती है। मोहन भागवत के बयान का इशारा इसी ओर है। इसका फल भी महागठबंधन को मिला और बिहार में एनडीए को मात खानी पड़ी। अभी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में नेताओं के ये बयान क्या गुल खिलाएंगे, यह देखना बाकी है।
बिहार में राजपूत-ब्राह्मण में उपजा मतभेद
ठाकुर-ब्राह्मणों के बीच शुरू से ही अच्छे संबंध रहे हैं। इसके बावजूद मनोज झा के सदन में काव्य पाठ से दोनों के बीच विभाजन की लकीरें साफ दिख रही हैं। राजपूतों की तरह ब्राह्मण खुल कर तो नहीं बोल रहे, लेकिन मन में इस बात का मलाल तो है ही कि एक ब्राह्मण नेता की जीभ और गर्दन काटने की खुलेआम चेतावनी दी जा रही है। यह भी सबको पता है कि राजपूत-ब्राह्मण वोट बीजेपी को मिलते रहे हैं। बीजेपी का आरोप है कि आरजेडी जान-बूझकर इन दोनों जातियों में विभेद पैदा करना चाहती हैं। खैर, अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इसका क्या असर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी।






