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दुनिया खोज रही विकास की संतुलित राह

UB India News by UB India News
July 23, 2023
in Lokshbha2024, ब्लॉग
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दुनिया खोज रही विकास की संतुलित राह
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विश्व में बढते आर्थिक तनावों के बीच अनेक विशेषज्ञ विकास की सही व संतुलित राह पर नये सिरे से सोच रहे हैं। केवल राष्ट्रीय आय व जीएनपी की वृद्धि पर फोकस करना उचित नहीं रहा क्योंकि प्रायः जीएनपी की तेज वृद्धि के दौर में ही पर्यावरण का विनाश असहनीय हद तक बढ गया है। यदि कोई समुदाय एक वर्ष में अपने वन काट के बेच देता है तो उसकी आय में अधिक वृद्धि दर्ज होती है जबकि कोई समुदाय वनों को बचा कर रखता है तो उसकी आय में वृद्धि दर्ज नहीं होती है। किसी बस्ती में शराब व जुए का कारोबार दूर–दूर तक फैलता है तो उसकी आय में तेज वृद्धि दर्ज हो जाती है‚ जबकि इससे किसी की भी भलाई नहीं हो रही। विषमता व शोषण के बढने के दौर में भी राष्ट्रीय आय में वृद्धि दर्ज हो सकती है।

अतः राष्ट्रीय आय में वृद्धि के मानदंड को छोडकर हमें यह पूछना चाहिए कि दुनिया बेहतर बन रही है कि नहीं। और इस व्यापक सोच में यह सवाल बहुत जरूरी हो जाता है कि क्या सब लोगों की बुनियादी जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी हो रही हैं या नहीं।
सब लोगों की रोटी‚ कपडा‚ मकान‚ स्वास्थ्य‚
शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना बडी प्राथमिकता बनना चाहिए। बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास केवल अल्पकालीन नहीं होने चाहिए अपितु टिकाउ भी होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनों के आधार को‚ पर्यावरण की रक्षा को साथ–साथ उच्च महत्व मिले। भोजन और आश्रय से बडी जरूरत साफ हवा व पानी की है‚ यह जरूरत भी पर्यावरण की रक्षा से जुडी है। पर्यावरण रक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के जो भी प्रयास अभी संभव हैं‚ वे किए जाएं तथा साथ ही बचाव की तैयारी भी की जाए। बढती आपदाओं से बचाव की बेहतर तैयारी को विभिन्न स्तरों पर समुचित महत्व देना जरूरी है। पर यह तभी संभव हो सकेगा जब विश्व व राष्ट्रीय स्तर पर संपत्ति व आय की अत्यधिक विषमताओं को कम किया जा सके और इस तरह उच्चतम प्राथमिकता वाले कार्य को बढाने के लिए आर्थिक संसाधन प्राप्त किए जा सकें। अतः विश्व स्तर पर व अपने देश के स्तर पर आर्थिक विषमता को कम करना बहुत जरूरी है।

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क्या राष्ट्रीय आय के स्थान पर कोई दूसरा ऐसा मापक तैयार हो सकता है‚ जो वास्तविक प्रगति को बेहतर ढंग से परिलक्षित करेॽ इस सवाल को सुलझाने के लिए फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति सरकोजी ने एक अन्तरराष्ट्रीय आयोग का ही गठन कर दिया‚ जिसके लिए अमर्त्य सेन व जोसफ स्टिगलिट्ज जैसे विश्व ख्याति प्राप्त अर्थशा्त्रिरयों की सेवाएं भी प्राप्त की गइ। इस आयोग ने कुछ मूल्यवान सुझाव तो दिए पर इस विवाद का कोई ऐसा समााान नहीं निकला जिसे व्यापक स्वीकृति प्राप्त हो।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने मानवीय विकास सूचकांक तैयार करने का कार्य आरंभ किया और दावा किया गया कि ‘ह्यूमन डवलपमेंट इंडे़क्स’ या ‘मानवीय विकास सूचकांक’ से किसी समाज की प्रगति को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इसकी आरंभिक वर्षों में तो काफी प्रशंसा हुई। पर कुछ समय बाद इसकी विसंगतियां भी स्पष्ट होने लगीं। इस सूचकांक के आधार पर भी शीर्ष पर वही देश आने लगे जिनकी जीवन–शैली पर्यावरण की व्यापक तबाही पर आधारित थी‚ या जहां सामाजिक टूटन काफी बढ चुकी थी। जिन देशों में आत्म–हत्या दर काफी अधिक थी‚ या जहां परिवार बुरी तरह बिखर रहा था‚ या जो शीघ्र ही आर्थिक तबाही के कगार पर आ गए (जैसे आइसलैंड)‚ ऐसे देशों को भी इस सूचकांक ने शिखर पर दिखाया था।

ब्रिटिश सोशल साइस रिसर्च काउंसिल (ब्रिटिशा समाज शास्त्र अनुसंधान परिषद) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में ऐसे ही सवाल सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में पांच वर्षों के दौरान तीन बार १५०० सामान्य नागरिकों के सैम्पल से पूछा गया कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए वे किन बातों को महत्व देते हैं और क्या उन्हें लगता है कि जीवन पहले से बेहतर हो रहा है या नहीं। ब्रिटेन के समाज (अन्य पश्चिमी विकसित देशों की तरह) को काफी भौतिकवादी माना जाता है पर ७१ प्रतिशत लोगों ने जीवन की गुणवत्ता (क्वालिटी) के बढने या जीवन बेहतर होने में जिन बातों को महत्व दिया उनका आय या दौलत के बढने से कोई संबंध नहीं था। उपभोक्ता वस्तुओं से अधिक महत्व ‘अच्छे पारिवारिक जीवन’ और ‘संतोष की स्थिति’ को देने वाले लोगों की संख्या अधिक थी।
खुशहाली की स्थिति बनाए रखने में शारीरिक‚ मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य की समग्र सोच को महत्व दिया गया है। खुशहाली का बहुत महत्वपूर्ण संबंध हमारे पारिवारिक व अन्य नजदीकी सामाजिक संबंधों से है। यदि इस पर समुचित ध्यान न दिया गया तो बढती आय के दौर में भी खुशहाली कम हो सकती है।

दुख–दर्द को दूर करने का अर्थ केवल परोपकारी कार्य नहीं है अपितु जो अन्याय और विषमता व्यापक स्तर पर दुख–दर्द का कारण बनते हैं‚ उन्हें दूर करना सबसे जरूरी है। गरीब व कमजोर वर्ग के दुख–दर्द अधिक हैं अतः उन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। विश्व में समता और न्याय को आगे बढाने में समाजवाद की सोच की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पर हाल के वर्षों में विविध कारणों से दुनिया भर में समाजवाद की सोच क्षतिग्रस्त हुई है। एक ओर समाजवाद से जुडी ताकतें कमजोर हुई हैं तथा दूसरी ओर समाजवाद की सोच से जुडी स्पष्टता में और उसे बदलते समय के साथ ढालने में कमी आई है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया को समाजवाद और समाजवादी सोच की बहुत जरूरत है। समाजवाद की सोच में सबसे मूल बात यह है कि आर्थिक और सामाजिक समता व न्याय के लIयों को सबसे ऊपर रखा जाता है‚ सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। समता और न्याय के उद्देश्यों को अन्य विचारााराओं के लोग भी कुछ हद तक मान्यता दे सकते हैं और देते हैं पर समाजवाद की विशिष्ट पहचान आर्थिक और सामाजिक समता व न्याय को उच्चतम प्राथमिकता देने व नीतियों का आधार बनाने में है।
यह एक अलग सवाल है कि विश्व स्तर पर समाजवाद का दावा करने वाले कई संगठन इस मूल पहचान पर खरे नहीं उतर पाए हैं‚ पर समाजवाद की मूल पहचान इस सिद्धांत में ही है। अब आगे चुनौती यह है कि विभिन्न देशों व समाजों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इस सिद्धांत के आधार पर किस तरह सही एजेंडा तैयार किया जाएगा जो सही तथ्यात्मक स्थिति पर आधारित हो। इसके लिए बहुत अध्ययनशीलता व गहरी निष्ठा की जरूरत है। निष्ठा व अध्ययनशीलता के अभाव में या तो सही कार्यक्रम बन नहीं पाता है या उसे ठीक से निभाया नहीं जाता है। ऐसे कार्यक्रम को निभाने के लिए जो गहरी प्रतिबद्धता चाहिए‚ कई कठिनाइयों को सहने का साहस चाहिए वह प्रायः उपलब नहीं होता है। तभी ऐसे कार्य कर लिए जाते हैं‚ जो सिद्धांतों के प्रतिकूल सिद्ध होते हैं।

इन सब कारणों से समाजवाद की वैचारिक स्पष्टता को बनाए रखने व उसके आधार पर विस्तृत स्थानीय कार्यक्रम तय करने की चुनौती पीछे छूटती गई है। पर आज भी बहुत देरी नहीं हुई है। आज भी सही प्राथमिकता को ऊपर रखते हुए प्रयास किए जाएं तो ये प्रयास समाज के लिए बहुत हितकारी सिद्ध होंगे।

राष्ट्रीय आय में वृद्धि के मानदंड को छोडकर हमें पूछना चाहिए कि दुनिया बेहतर बन रही है कि नहीं। और इस व्यापक सोच में यह सवाल जरूरी हो जाता है कि क्या सब लोगों की बुनियादी जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी हो रही हैं या नहीं। सब लोगों की रोटी‚ कपडा‚ मकान‚ स्वास्थ्य‚ शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना बडी प्राथमिकता बनना चाहिए। बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास केवल अल्पकालीन नहीं होने चाहिए अपितु टिकाउ भी होने चाहिए। यह तभी हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनों के आधार को‚ पर्यावरण की रक्षा को साथ–साथ उच्च महत्व मिले। भोजन और आश्रय से बडी जरूरत साफ हवा व पानी की है‚ यह जरूरत भी पर्यावरण की रक्षा से जुडी है। पर्यावरण रक्षा का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु बदलाव के संकट को नियंत्रित करने के जो भी प्रयास संभव हैं‚ वे किए जाएं। साथ ही बचाव की तैयारी भी की जाए।

 

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