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दलितों का अपमान कब तक……

UB India News by UB India News
July 10, 2023
in Lokshbha2024, ब्लॉग
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दलितों का अपमान कब तक……
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आज से 32 वर्ष पूर्व 1991 में मध्य प्रदेश के सागर जिले के एक गांव में एक आदिवासी दलित के मंदिर प्रवेश करने पर गांव के एक सवर्ण ने उसके मुंह पर पेशाब कर दिया था। इस घटना पर श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘समर’ बनाई थी। ३२ वर्ष बाद भी कुछ नहीं बदला है। मध्य प्रदेश के सीधी जिले की शर्मनाक घटना एक झलक मात्र है। ऊँची जाति के दबंग का एक दलित किशोर पर सरेआम मूत्र विसर्जन तो दलितों के अपमान का बहुत छोटा उदाहरण है। महानगरों को छोड़ कर शायद ही कोई ऐसा प्रांत होगा जहां दलितों का अपमान या उन पर अत्याचार न होते हों।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तुरंत कड़ी दंडात्मक कारवाई कर के सीधी जिले के दबंग प्रवेश शुक्ला को तो सबक सिखा दिया पर उससे उन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा जो अपनी जाति या राजनैतिक रसूख के चलते सदियों से दलितों पर अत्याचार करते आए हैं। सोशल मीडिया पर तो ऐसी खबर कभी–कभी ही वायरल होती है पर ऐसी घटनाएं चौबीस घंटे पूरे देश में कहीं न कहीं होती रहती हैं‚ जिनका कभी संज्ञान भी नहीं लिया जाता। देश की बात करने से पहले मैं अपना अनुभव साझा करना चाहूंगा। मेरा परिवार सनातन धर्म में दृढ़ आस्था रखता है। हम आचरण से शुद्ध रह कर धार्मिक कार्यों में रत ब्राह्मणों का पूरा सम्मान करते हैं। पर हमारे परिवार में इतनी मानवीय संवेदना है कि हम दलितों के साथ भी समान व्यवहार करते हैं। इस कारण हमें बीस बरस पहले विचित्र परिस्थिति का सामना करना पड़ा। हमारे वृंदावन आवास में हमारी मां की सेवा के लिए जो कर्मचारी तैनात था वो नारायण नाम का बृजवासी जाटव था। मेरी मां धर्मनिष्ठ व संस्कृत की विद्वान होते हुए भी नारायण से हर तरह की सेवा लेती थीं जैसे पूजा या भोजन की तैयारी। उनके इस आचरण से वृंदावन के हमारे शुभचिंतक कुछ ब्राह्मण परहेज करते थे। जब वे हमारे घर कोई अनुष्ठान संपन्न कराने आते तो घर का जल भी नहीं पीते थे। ऐसा कई वर्ष तक चला। न उनके आग्रह पर हमने नारायण को हटाया और न ही ब्राह्मणों के सम्मान में कोई कमी आने दी। इस तरह यह विरोधाभासी स्थिति तब तक चलती रही जब तक नारायण नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला नहीं गया। उसके बाद ही उन ब्राह्मणों ने हमारे घर का भोजन और जल स्वीकार करना शुरू किया। जो बुद्धिजीवी ब्राह्मणवादी व्यवस्था की कटु आलोचना करते हैं‚ वो हमारी भी आलोचना करेंगे‚ यह कहकर कि हमने दलितों के प्रति ऐसा भाव रखने वाले ब्राह्मणों का सम्मान क्यों कियाॽ जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सनातन धर्म का अभिन्न अंग मानते हैं‚ वे इस बात की आलोचना करेंगे कि हमारी मां ने दलित को रसोई और पूजा घर में प्रवेश क्यों करने दियाॽ दोनों की आलोचना का मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। हां‚ इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि लगभग आठ वषाç तक यही व्यवस्था हमारे वृंदावन आवास पर चलती रही। कोई तनावपूर्ण परिस्थिति पैदा नहीं हुई। शायद इसलिए कि हमने दोनों मान्यताओं के बीच संतुलन बना कर रखा।

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अगर देश के स्तर पर बात करें तो हमारे प्रातः स्मरणीय पुरी के शंकराचार्य मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए भी सनातन धर्म के कर्मकांडों को जन्म से ब्राह्मणों का ही एकाधिकार मानते हैं। दूसरी तरफ गौड़ीय संप्रदाय के समर्थक श्री चैतन्य महाप्रभु ने धर्म और जाति की सीमाओं को लांघ कर‚ शुद्ध भक्ति से‚ वैष्णव धर्म की आचार संहिता का पालन करने वाले हर मनुष्य को सामाजिक अनुक्रम में ऊपर उठने का मार्ग प्रशस्त किया। उनका भाव था ‘हरि को भजे सो हरि का होय’। इसी का परिणाम है कि गौड़ीय संप्रदाय या इस्कॉन में कृष्ण भक्ति करने वाले हर जाति‚ धर्म और देश से आकर शामिल हो गए जिसकी कट्टर ब्राह्मणवादी कटु आलोचना करते हैं। इसी तरह लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के और स्वामी हरिदास जी के शिष्यों में मुसलमान तक भक्त थे। एक हजार वर्ष पहले रामानुजाचार्य जी ने जो संप्रदाय चलाया उसमें ब्राह्मण जाति की श्रेष्ठता के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया। उनकी जीवन लीला में एक प्रसंग आता है‚ जब उनके एक शिष्य ने बाढ़ से घिरा होने के कारण किसी दलित के घर से भिक्षा में कच्ची सामग्री ले ली जिससे रामानुजाचार्य जी बहुत दुखी हुए। तब उस शिष्य ने प्रायश्चित में अपने प्राण त्याग दिए। पिछले वर्ष हैदराबाद के निकट श्रद्धेय संत श्री चिन्नाजियर स्वामी ने रामानुजाचार्य जी की विशाल प्रतिमा की स्थापना की है जो आकार में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी बैठी प्रतिमा है। इस तीर्थस्थली का नाम स्वामी जी ने ‘समता स्थल’ रखा है यानी यहां किसी से जाति के आधार पर भेद–भाव नहीं होगा।

ये तो रहा धार्मिक आस्था से जुड़े लोगों का आचार–विचार पर भारत का बहुसंख्यक समाज ऐसी आस्थाओं से बंधा हुआ नहीं है। भारतीय समाज में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं‚ विशेषकर गांवों में। स्वयं को ऊँची जाति का मानने वाले लोग दलितों को बराबरी का दर्जा देने को कतई तैयार नहीं हैं। पुलिस का रवैया भी इस भावना से काफी प्रभावित रहता है। इसलिए दलितों को न्याय तक नहीं मिल पाता। परिस्थिति वहां और भी विकट हो जाती है‚ जहां खुद को ऊँची जाति का मानने वाले लोगों के पास धन या सत्ता का बल भी होता है। ऐसे में उनका अहंकार सातवें आसमान पर चढ़ कर बोलता है‚ और वे दलितों को अमानवीयता की हद तक जा कर प्रताडि़त और अपमानित करते हैं।

प्रवेश शुक्ला के मामले में शिवराज सिंह चौहान ने जो किया वो अगर पहले दिन से किया होता तो मध्य प्रदेश में दलितों पर पिछले वर्षोँ में जो हजारों अत्याचार हुए हैं‚ वो न हुए होते‚ जैसा कि विपक्ष के नेता कमल नाथ का आरोप है। अगर हर नेता‚ मंत्री या मुख्यमंत्री दलितों पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने लगे तो हालत सुधर सकती है। हालांकि पारस्परिक सामाजिक व्यवहार में समरसता लाना अभी दूर की कौड़ी है। इस अभिशाप को भारत की रेल‚ बस और हवाई यातायात व्यवस्था ने काफी हद तक तोड़ा है। इन यात्राओं के दौरान आम तौर पर कोई भी यात्री भोजन बेचने या परोसने वाले से उसकी जाति नहीं पूछता। सरकारी नौकरियों में आरक्षण और औद्योगीकरण ने भी समाज के इन दकियानूसी नियमों को काफी हद तक तोड़ा है। मेरे जैसे लोगों के सामने द्वंद्व इस बात का है कि सनातन धर्म में पूरी निष्ठा और आस्था रखते हुए भी कैसे इस अभिशाप को समाप्त किया जा सकता हैॽ

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