बिहार का मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड़ तो हर किसी के जेहन में होगा। यहां की बच्चियों ने जब रूह कंपाने वाली दास्तां सुनाई थीं तो हर कोई भौंचक्क रह गया था। कुछ संवेदनशील लोग तो बच्चियों के साथ घटी वारदात से इस कदर आहत हुए कि उन्हें सामान्य दिनचर्या में लौटने में काफी वक्त लगा। ऐसी ही घटिया‚ नीच और गिरी हुई हरकत उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुई है। यहां भी बच्चियों के साथ शारीरिक और मानसिक ज्यादती हुई है। जब सहारनपुर के जनता रोड स्थित सुधार गृह की लड़कियों ने अपनी शोषण की दास्तान अधिकारियों के सामने रखी तो इसे सुनकर हर किसी के होश उड़ गए।
दरअसल‚ दो दिन पहले एसडीएम कीर्ति सिंह ने आवासीय बाल सुधार गृह का इंस्पेक्शन किया था। इस दौरान जब वे वहां रहने वाली लड़कियों से बात कर रही थीं‚ उसी दौरान लड़कियों ने सुधार गृह मैनेजर के संबंध में बड़ा खुलासा किया। मैनेजर और सुपरिटेंडेंट की प्रताड़ना की कहानी ने अधिकारियों को भी झकझोर दिया।
साफ है कि बाल गृह का दौरा अगर अधिकारी नहीं करतीं तो यह दुर्दांत सच कभी बाहर नहीं निकल पाता। अधिकारियों की सक्रियता और संवेदना से हमेशा परिणाम बेहतर निकलते हैं। देशभर में ज्यादातर बाल गृहों की कमोबेश यही स्थिति है। बाल गृह में बच्चियों का यौन शोषण‚ उन्हें देह व्यापार में धकेलना‚ उनके साथ अमानवीय व्यवहार करना आदि बहुत आसान हो चला है। यह धत् कर्म तभी होते हैं‚ जब जिम्मेदारी के पद पर तैनात अधिकारी अपनी आंख और कान बंद कर लेते हैं और अपने जमीर के साथ समझौता कर लेते हैं। एक तरह से कहें तो वे पत्थरदिल हो जाते हैं। मुजफ्फरपुर हो या सहारनपुर या देश के बाकी हिस्सों में मौजूद बाल गृह हों; वहां काम करने वाले रक्षक की जगह भक्षक बन जाते हैं। यहां तक कि गृह की अधीक्षिका भी हैवानों का साथ देती हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे संवेदनशील जगहों को लेकर सरकार के स्तर पर ज्यादा सख्ती और सक्रियता की अपेक्षा है। हो सके तो हर हफ्ते अधिकारियों का दौरा बाल गृहों में करने के नियम बनाए जाएं। अधिकारियों की अदला–बदली भी महीने–दो महीने में हों। बच्चियों को महीने–दो महीने में बाहर निकल कर अपनी बात रखने की आजादी मिले। आसपास के लोगों से भी समय–समय पर दरयाफ्त की जाए। अगर ऐसा होगा तभी नौनिहालों की इज्जत और सरकार का इकबाल सुरक्षित रहेगा।







