दबंगई और चालाकियों का ही नहीं, राजनीति में भोलेपन और भावुकता का भी बड़ा महत्व होता है। रायपुर में कांग्रेस सम्मेलन चल रहा है। यहाँ राहुल ने कांग्रेस नेताओं के सामने भोलेपन वाला भाषण दिया। उन्होंने कहा- 1977 में जब हम सरकारी मकान ख़ाली कर रहे थे, मैं बहुत छोटा था। घर का सामान पैक हो रहा था।
मैंने माँ से पूछा- हम कहाँ जा रहे हैं? माँ ने कहा- ये सरकारी मकान है, अब हमें इसे छोड़ना है। मैंने पूछा- कहाँ जाएँगे? माँ ने कहा- पता नहीं। आज बावन साल हो गए। मेरे पास अब भी मेरा अपना घर नहीं है। राहुल ने अपनी यात्रा के क़िस्से भी भावुकता से सुनाए। कहा- पहले मैं सोचता था इतनी दूर तक कैसे चलूँगा? जब चलना शुरु किया तो थकान काफ़ूर हो गई।
पहले जब लोगों से मिलता था तो पूछता था- क्या हाल हैं? कितने बच्चे हैं? करते क्या हैं? लोग जवाब देते थे, लेकिन चलते-चलते मेरा घमण्ड चूर हो गया। मैं लोगों के गले मिलता और सवाल पूछने की ज़रूरत ही नहीं होती थी। अपने आप हालात पता चल जाते थे।
राहुल दरअसल, अब भावुकता की राजनीति करने जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि उनकी इस कहानी से लोग कितने भावुक हो पाते हैं? भाजपा भी भावुकता की राजनीति ही करती है लेकिन उसकी भावुकता में धर्म का एग्रेशन भी है। कांग्रेस के पास निरी भावुकता है। वोट में कितनी परिवर्तित होगी, यह अभी से कहना मुश्किल है।
उधर, दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया गिरफ्तार कर लिए गए हैं। मामला शराब नीति का है। आरोप यह है कि मनीष सिसोदिया ने ऐसी शराब नीति गढ़ी जिससे सरकार की बजाय शराब व्यापारियों का ज़्यादा फ़ायदा हुआ। आप पार्टी का कहना है कि भाजपा और केंद्र सरकार के ये आरोप झूठे हैं। मनीष सिसोदिया ने भी भावुकता का कार्ड खेला।
वे पहले अपनी माँ से मिलने गए। फिर जुलूस की शक्ल में सीबीआई दफ़्तर तक पहुँचे। भाषण में कहा मैं जेल जा रहा हूँ। घर में मेरी पत्नी अकेली हैं। वह बीमार रहती हैं। आप लोग ख़्याल रखना। यह भी कहा कि मुझे पैसे की कोई लालसा नहीं है। पहले टीवी में समाचार पढ़ता था। अच्छी तनख़्वाह पाता था। फिर केजरीवाल जी से जुड़ा। झुग्गी – बस्तियों में काम किया।
सोचा नहीं था सरकार में आएँगे लेकिन आप लोगों ने साथ दिया और सरकार बन गई। अब सिसोदिया की इस भावुकता से क्या सीबीआई पसीजेगी? शायद नहीं। ये राजनीति है। यहाँ जीत और हार दो ही मुख्य बातें होती हैं। तीसरी कुछ नहीं। कुछ भी नहीं।







