बिहार में शनिवार को जाति आधारित जनगणना की शुरुआत कर दी गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड़ अंतर्गत हरसेर गांव में मनोज पासवान के घर जाति आधारित गणना की शुरुआत की। इस अवसर पर नीतीश ने कहा कि सभी पार्टियों की सहमति से यह काम शुरू हुआ है। नीतीश ने कहा कि केंद्र सरकार के सामने जाति आधारित गणना की मांग रखी गई थी‚ लेकिन वे लोग तैयार नहीं हुए। इसलिए राज्य सरकार अपने स्तर पर इसे करवा रही है। खास बात यह कि जाति की गणना के साथही लोगों की आर्थिक स्थिति का भी अध्ययन करवाया जा रहा है ताकि पता चल सके कि समाज में कितने लोग गरीब हैं‚ और उनके कैसे आगे बढ़ाना है। माना जा रहा है कि बिहार में महागठबंधन सरकार का यह कदम ऐतिहासिक है। बिहार में जाति आधारित जनगणना प्रमुख मुद्दा रही है। सत्तारूढ़ जद (एकी) और उसके महागठबंधन में शामिल सभी घटक लंबे समय से इस बाबत मांग करते रहे हैं। गौरतलब है कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने २०१० में राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित गणना कराने पर सहमति जताईथी‚ लेकिन जनगणना के दौरान एकत्रित आंकड़़ों को संकलित करके रिपोर्ट का रूप कभी नहीं दिया गया। यकीनन यह बड़़ी चूक थी। ऐसी चूक कर्नाटक में भी की गई थी जब २०१४ में जाति गणना तो की गई पर रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। गणना में १९२ नई जातियां चिह्नित की गइ और ८० ऐसी थीं जिनमें मात्र १० लोग थे यानी नई जातियों के लिए उत्थान के लिए जो कुछ भी जरूरी था‚ वह नहीं हो पा रहा था। बिहार में जो शुरुआत हुई है‚ इसके तमाम लाभ गिनाए जा रहे हैं। वार्ड़वार जाति और कुशल लोगों की संख्या एक जगह उपलब्ध हो सकेगी। तद्नुसार कल्याणकारी नीति बनाई जा सकेगी। आर्थिक–सामाजिक रूप से वंचितों और पिछड़़ों के लिए जो विशेष प्रबंध होने चाहिए वे किए जा सकेंगे। इससे सामाजिक ऊँच–नीच तथा आर्थिक खाई को पाटने में मदद मिलेगी। लेकिन कुछलोग इस समूची कवायद को राजनीति की नजर से भी देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि मंड़ल कमीशन के बाद एक बार फिर से राज्य में जातीय भावना फैल सकती है। बेशक‚ राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा लेकिन समाज बंट सकता है। बहरहाल‚ इस दृष्टि से लाभ जरूर होगा कि एक विश्वसनीय आंकड़़ा बैंक हमारे पास होगा।
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