पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड़ में स्थित जोशीमठ की त्रासदी मानव निर्मित कारणों और सरकार की अदूरदर्शिता–लापरवाही को उजागर करती है‚ जिसके कारण इस हादसे का प्रभाव कई गुना बढ़ गया। जोशीमठ गढ़वाल क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह भारत का सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है। हालांकि समूचा उत्तराखंड़ कच्चे और नये पहाड़़ों वाला है। यह क्षेत्र भूकंप‚ भूस्खलन‚ भारी वर्षा‚ बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित रहता है‚ लेकिन बेतरतीब विकास की दौड़़ में प्रकृति के साथ छेड़़छाड़़ की घटनाओं के कारण अक्सर जोशीमठ की तरह आपदाएं आती रहती हैं। जोशीमठ में भू–धंसाव की घटना कोई नई नहीं है। लोगों को याद होगा जब १९७० में उत्तरखंड़ की पेड़़ों की कटाई के विरुद्ध चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा‚ सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी पर्यावरणविद चंड़ी प्रसाद भट्ट‚ कामरेड़ गोविंद सिंह रावत और श्रीमती गौरा देवी के नेतृत्व में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उसी दौरान चंड़ीप्रसाद भट्ट जोशीमठ में भू–धंसाव के मामले को तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संज्ञान में लाए थे। १९७६ में मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट आई थी‚ जिसमें इस प्राचीन शहर के धंसने का खुलासा किया गया था‚ लेकिन सरकार की ओर से इसकी रोकथाम करने की कोई पहल नहीं की गई। चार–धाम यात्रा के कारण जोशीमठ का पूरी तरह व्यावसायीकरण हुआ। यहां आज करीब २०–२५ हजार की आबादी है‚ लेकिन जल–निकासी के लिए ड्रे़नेज सिस्टम नहीं है। इसके कारण उपयोग में लाया जाने वाला पानी धरती के अंदर जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली परियोजनाओं और सड़़कों के निर्माण के लिए विस्फोटकों का जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है‚ उसके कारण भी भू–धंसाव में तेजी आई है। भू–धंसाव के कारण यहां के प्रायः सभी घरों में दरारें पड़़ गई हैं। गौर करने वाली बात है कि भूस्खलन जाड़े़ में हो रहा है। बरसात में क्या होगा इसकी कल्पना से रोंगटे खड़़े हो जा रहे हैं। विशेषज्ञों को भी समझ नहीं आ रहा है कि जमीन से कीचड़़युक्त पानी का रिसाव क्यों और कहां से हो रहा है। सरकार ने इसका पता लगाने के लिए कमेटियों का गठन किया है। लेकिन महkवपूर्ण बात यह है कि हमें विकास के मॉड़ल पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। विकास कार्यों पर प्रतिबंध तो नहीं लगाया जा सकता‚ लेकिन प्राकृतिक संसाधनों को क्षति पहुंचाए बिना विकास का मॉड़ल अपनाया जा सकता है।
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