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भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई पर खतरा बढ़ा ………………………….

UB India News by UB India News
July 10, 2026
in खास खबर, संपादकीय
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डिएगो गार्सिया पर हमले ने उड़ा दी US की नींद ………………
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पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जून में बड़ी मुश्किल से हुआ युद्धविराम जिस तरह से दोनों देशों के एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन के आरोपों के बीच दरकता दिखाई दिया, वह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय तो है ही, दोनों पक्षों की तरफ से जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले जारी हैं और जैसे तीखे बयान सामने आ रहे हैं, उससे आशंकाएं भी गहरा रही हैं।

उल्लेखनीय है कि होर्मुज मार्ग में जहाजों पर ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हमले किए, तो इसके जवाब में ईरान ने भी बहरीन व कुवैत स्थित अमेरिकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया। स्थितियां इस तरह बिगड़ीं कि नाटो सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अब वह ईरान के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते। इसका पहला असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की बढ़ती बेचैनी के रूप में सामने आया है।

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दरअसल, यह उस वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा है, जो पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के चलते लगातार कमजोर होती जा रही है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का करीब 90 प्रतिशत होर्मुज के रास्ते ही आयात करता है। 28 फरवरी को पश्चिम एशियाई संकट की शुरुआत से पहले तक भारत करीब 60-70 फीसदी कच्चे तेल का आयात समुद्री मार्ग से करता था, जो अब गिरकर 20-25 फीसदी रह गया है। ऐसे समय में, जब अल नीनो और कमजोर मानसून पहले ही अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल संकेत दे रहे हैं, तब पश्चिम एशिया में फिर से गहराती अशांति परेशानियां बढ़ाने वाली ही है।

यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण क्षेत्र की लागत बढ़ना तय है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर ही पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं कि ईरान किसी भी सूरत में होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ, ट्रंप मनमाने ढंग से ईरान का दंभ तोड़ने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को आतुर हैं।

जो मध्यस्थ हैं, वे भी युद्धरत देशों को यह समझाने में असक्षम दिख रहे हैं कि युद्धविराम केवल कागज पर दर्ज एक समझौता नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर संवाद से जीवित रखना पड़ता है। यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया, तो पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया एक ऐसे अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकती है, जिसकी आर्थिक और रणनीतिक कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ेगी।

दोनों देशों में नहीं बन रही बात

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सुपुर्द-ए-खाक हो गए। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की चिंगारी फिर भड़क उठी है। दोनों के बीच 107 दिनों के संघर्ष के बाद 60 दिनों के लिए जो युद्ध विराम की अंतरिम शांति सहमति बनी, उस पर महज 21 वें दिन ही विराम लग गया।

दोनों के हितों के टकराव पहले दिन से ही सामने आने लगे थे लेकिन उम्मीद की जा रही थी कि कम से कम 60 दिनों में बात कुछ हद तक बन जाएगी और फिर आगे का रोडमैप तैयार होगा। ऐसा नहीं हो सका। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ही दोनों ने एक-दूसरे का भरोसा तोड़ दिया और अब ऐसा लगता है कि उनमें 20-21 दिनों के भीतर रत्ती भर बात नहीं बनी।

घटनाक्रम के हिसाब से ईरान ने तीन जहाजों पर हमले कर ताजा संकट पैदा किया। ईरान का आरोप है कि शांति सहमति के हिसाब से होर्मुज में जहाजों की आवाजाही का उल्लंघन हुआ। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि उसने ईरान के हमले के बाद बदले की कार्रवाई की। 

ईरान के हमले की अपनी वजह है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ईरान में अमेरिका और ट्रंप से बदले की कार्रवाई का जनाक्रोश साफ दिखा। मातम मना रही वहां की अवाम ट्रंप से किसी कीमत पर शांति समझौते के खिलाफ थी। श्रद्धांजलि के लिए उमड़े जनसैलाब ने ट्रंप विरोधी नारे लगाए। वहां के लोगों में प्रतिशोध की आग सुलग रही थी।

युद्ध के दौरान बड़ा नुकसान झेलने के बाद ईरान की माली हालत डगमगा चुकी है। उसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर से पकड़ ढीली पड़ने का डर सता रहा है। तंगी झेल रहे ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जे जमाकर सेवा कर (टोल) वसूलने का मंसूबा पाल रखा है। ऐसे में वहां उपज रहे जनाक्रोश को थामने के लिए ईरान और वहां की रिवोल्यूनरी गार्ड (आईआरजीसी) को खामेनेई की मातमपुर्सी जैसा मौके मुफीद लगा।

ताजा  हमले के जरिये ईरान ने अपनी अवाम को यह संदेश देना चाहा कि वह अमेरिका के आगे घुटने नहीं टेक रहा और होर्मुज पर कब्जे व अमेरिका से अपनी आर्थिक क्षतिपूर्ति (भरपाई) की शांति सहमति पर अमल करा कर देश की आर्थिक हालत कुछ सुधार लेगा। इस संदेश में अवाम की भलाई दिखी।

ताजा हमले में ईरान ने 85 तो अमेरिका ने 90 ठिकानों को तबाह किया। इस संघर्ष में एक-दूसरे को तो नुकसान पहुंचा ही लेकिन इससे भारत समेत समूची दुनिया अछूती नहीं रही। अमेरिका ने ईरान का वैश्विक बाजार में कच्चा तेल बेचने का लाइसेंस रद कर दिया। दुनिया की कुल आपूर्ति का पांचवा हिस्सा ईंधन (तेल-गैस) बरास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान से मिलता है।

अब ताजा हमले के बाद कई देशों के जहाज बैरंग लौटने लगे हैं। 24 घंटे के भीतर कच्चे तेल की कीमत में 5-6 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। दुनिया के बाजार लुढ़क गए। भारत में पहले दिन सेंसेक्स में करीब 1700 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। दूसरे दिन जब अमेरिकी सेना का बयान आया कि हमले पूरे हो गए तो फिर बाजार में आंशिक रौनक लौटी।

अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम?

ईरान के हमले की एक वजह यह भी है कि खामेनेई के 37 साल के शासन की विरासत पर तीखा विवाद चल रहा है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान अपने पिता की मृत्यु के एक सप्ताह बाद धार्मिक सभा द्वारा सर्वोच्च नेता घोषित किए गए मोजतबा खामेनेई नजर नहीं आए। चर्चा है कि वह उसी दौरान हमले में घायल हो गए थे। अब खामेनेई के सुपुर्द-ए-खाक हो जाने के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम।

युद्ध विराम के मध्यस्थ पाकिस्तान को उम्मीद है कि अगले दौर की वार्ता इस्लामाबाद में होगी। तुर्किये में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप साफ कर चुके हैं कि ईरान से बातचीत बेमानी और समय की बर्बादी है।

उन्होंने यहां तक कहा कि अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। हालांकि एक उम्मीद उन्होंने यह जगा रखी है कि बातचीत के दरवाजे खुले रहेंगे। इधर ईरान की ओर से गालिबाफ ने अमेरिका को धौंस न जमाने की नसीहत दे डाली है। बयानों के हमले के साथ एक-दूसरे पर हमले भी जारी हैं। अब बुशहर परमाणु पावर प्लांट के पास फिर अमेरिकी मिसाइल गिरी है। बहरीन और जॉर्डन में बार-बार अलर्ट सायरन बज रहे हैं।

अमेरिका और ईरान दोनों ने फिर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति के तहत ताबड़तोड़ हमले तेज कर दिए हैं। भारत समेत प्रभावित खाड़ी देश और दुनिया उम्मीद कर रही है कि विवादों का हल बातचीत से हो। ताजा हालात के बीच उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश पहले आपस में भरोसा कायम करें। एक-दूसरे पर हमले रोकें। बातचीत का रास्ता खोले।

यह इसलिए भी जरूरी है कि इस संघर्ष से उपजे संकट के बादल को दुनिया 100 दिन से ज्यादा झेल  चुकी है। ऊर्जा संकट झेल चुकी दुनिया ठीक से उबर  नहीं पाई और ताजा संघर्ष ने समूचे पश्चिम एशिया के सामने फिर  संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में ईरान और अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया की भलाई इसी में है कि अब युद्ध नहीं, युद्ध विराम हो।

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जून में बड़ी मुश्किल से हुआ युद्धविराम जिस तरह से दोनों देशों के एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन के आरोपों के बीच दरकता दिखाई दिया, वह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय तो है ही, दोनों पक्षों की तरफ से जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले जारी हैं और जैसे तीखे बयान सामने आ रहे हैं, उससे आशंकाएं भी गहरा रही हैं।

उल्लेखनीय है कि होर्मुज मार्ग में जहाजों पर ईरानी हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हमले किए, तो इसके जवाब में ईरान ने भी बहरीन व कुवैत स्थित अमेरिकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया। स्थितियां इस तरह बिगड़ीं कि नाटो सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अब वह ईरान के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते। इसका पहला असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की बढ़ती बेचैनी के रूप में सामने आया है।

दरअसल, यह उस वैश्विक व्यवस्था की भी परीक्षा है, जो पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के चलते लगातार कमजोर होती जा रही है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरत का करीब 90 प्रतिशत होर्मुज के रास्ते ही आयात करता है। 28 फरवरी को पश्चिम एशियाई संकट की शुरुआत से पहले तक भारत करीब 60-70 फीसदी कच्चे तेल का आयात समुद्री मार्ग से करता था, जो अब गिरकर 20-25 फीसदी रह गया है। ऐसे समय में, जब अल नीनो और कमजोर मानसून पहले ही अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल संकेत दे रहे हैं, तब पश्चिम एशिया में फिर से गहराती अशांति परेशानियां बढ़ाने वाली ही है।

यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण क्षेत्र की लागत बढ़ना तय है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर ही पड़ेगा। इसमें संदेह नहीं कि ईरान किसी भी सूरत में होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ, ट्रंप मनमाने ढंग से ईरान का दंभ तोड़ने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को आतुर हैं।

जो मध्यस्थ हैं, वे भी युद्धरत देशों को यह समझाने में असक्षम दिख रहे हैं कि युद्धविराम केवल कागज पर दर्ज एक समझौता नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक इच्छाशक्ति और निरंतर संवाद से जीवित रखना पड़ता है। यदि यह अवसर भी हाथ से निकल गया, तो पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरी दुनिया एक ऐसे अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकती है, जिसकी आर्थिक और रणनीतिक कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ेगी।

दोनों देशों में नहीं बन रही बात

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सुपुर्द-ए-खाक हो गए। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की चिंगारी फिर भड़क उठी है। दोनों के बीच 107 दिनों के संघर्ष के बाद 60 दिनों के लिए जो युद्ध विराम की अंतरिम शांति सहमति बनी, उस पर महज 21 वें दिन ही विराम लग गया।

दोनों के हितों के टकराव पहले दिन से ही सामने आने लगे थे लेकिन उम्मीद की जा रही थी कि कम से कम 60 दिनों में बात कुछ हद तक बन जाएगी और फिर आगे का रोडमैप तैयार होगा। ऐसा नहीं हो सका। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ही दोनों ने एक-दूसरे का भरोसा तोड़ दिया और अब ऐसा लगता है कि उनमें 20-21 दिनों के भीतर रत्ती भर बात नहीं बनी।

घटनाक्रम के हिसाब से ईरान ने तीन जहाजों पर हमले कर ताजा संकट पैदा किया। ईरान का आरोप है कि शांति सहमति के हिसाब से होर्मुज में जहाजों की आवाजाही का उल्लंघन हुआ। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि उसने ईरान के हमले के बाद बदले की कार्रवाई की। 

ईरान के हमले की अपनी वजह है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान ईरान में अमेरिका और ट्रंप से बदले की कार्रवाई का जनाक्रोश साफ दिखा। मातम मना रही वहां की अवाम ट्रंप से किसी कीमत पर शांति समझौते के खिलाफ थी। श्रद्धांजलि के लिए उमड़े जनसैलाब ने ट्रंप विरोधी नारे लगाए। वहां के लोगों में प्रतिशोध की आग सुलग रही थी।

युद्ध के दौरान बड़ा नुकसान झेलने के बाद ईरान की माली हालत डगमगा चुकी है। उसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर से पकड़ ढीली पड़ने का डर सता रहा है। तंगी झेल रहे ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर कब्जे जमाकर सेवा कर (टोल) वसूलने का मंसूबा पाल रखा है। ऐसे में वहां उपज रहे जनाक्रोश को थामने के लिए ईरान और वहां की रिवोल्यूनरी गार्ड (आईआरजीसी) को खामेनेई की मातमपुर्सी जैसा मौके मुफीद लगा।

ताजा  हमले के जरिये ईरान ने अपनी अवाम को यह संदेश देना चाहा कि वह अमेरिका के आगे घुटने नहीं टेक रहा और होर्मुज पर कब्जे व अमेरिका से अपनी आर्थिक क्षतिपूर्ति (भरपाई) की शांति सहमति पर अमल करा कर देश की आर्थिक हालत कुछ सुधार लेगा। इस संदेश में अवाम की भलाई दिखी।

ताजा हमले में ईरान ने 85 तो अमेरिका ने 90 ठिकानों को तबाह किया। इस संघर्ष में एक-दूसरे को तो नुकसान पहुंचा ही लेकिन इससे भारत समेत समूची दुनिया अछूती नहीं रही। अमेरिका ने ईरान का वैश्विक बाजार में कच्चा तेल बेचने का लाइसेंस रद कर दिया। दुनिया की कुल आपूर्ति का पांचवा हिस्सा ईंधन (तेल-गैस) बरास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान से मिलता है।

अब ताजा हमले के बाद कई देशों के जहाज बैरंग लौटने लगे हैं। 24 घंटे के भीतर कच्चे तेल की कीमत में 5-6 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। दुनिया के बाजार लुढ़क गए। भारत में पहले दिन सेंसेक्स में करीब 1700 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। दूसरे दिन जब अमेरिकी सेना का बयान आया कि हमले पूरे हो गए तो फिर बाजार में आंशिक रौनक लौटी।

अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम?

ईरान के हमले की एक वजह यह भी है कि खामेनेई के 37 साल के शासन की विरासत पर तीखा विवाद चल रहा है। खामेनेई की जनाजा यात्रा के दौरान अपने पिता की मृत्यु के एक सप्ताह बाद धार्मिक सभा द्वारा सर्वोच्च नेता घोषित किए गए मोजतबा खामेनेई नजर नहीं आए। चर्चा है कि वह उसी दौरान हमले में घायल हो गए थे। अब खामेनेई के सुपुर्द-ए-खाक हो जाने के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अब युद्ध होगा या फिर से युद्धविराम।

युद्ध विराम के मध्यस्थ पाकिस्तान को उम्मीद है कि अगले दौर की वार्ता इस्लामाबाद में होगी। तुर्किये में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप साफ कर चुके हैं कि ईरान से बातचीत बेमानी और समय की बर्बादी है।

उन्होंने यहां तक कहा कि अब युद्ध विराम खत्म हो चुका है। हालांकि एक उम्मीद उन्होंने यह जगा रखी है कि बातचीत के दरवाजे खुले रहेंगे। इधर ईरान की ओर से गालिबाफ ने अमेरिका को धौंस न जमाने की नसीहत दे डाली है। बयानों के हमले के साथ एक-दूसरे पर हमले भी जारी हैं। अब बुशहर परमाणु पावर प्लांट के पास फिर अमेरिकी मिसाइल गिरी है। बहरीन और जॉर्डन में बार-बार अलर्ट सायरन बज रहे हैं।

अमेरिका और ईरान दोनों ने फिर एक-दूसरे पर दबाव की रणनीति के तहत ताबड़तोड़ हमले तेज कर दिए हैं। भारत समेत प्रभावित खाड़ी देश और दुनिया उम्मीद कर रही है कि विवादों का हल बातचीत से हो। ताजा हालात के बीच उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश पहले आपस में भरोसा कायम करें। एक-दूसरे पर हमले रोकें। बातचीत का रास्ता खोले।

यह इसलिए भी जरूरी है कि इस संघर्ष से उपजे संकट के बादल को दुनिया 100 दिन से ज्यादा झेल  चुकी है। ऊर्जा संकट झेल चुकी दुनिया ठीक से उबर  नहीं पाई और ताजा संघर्ष ने समूचे पश्चिम एशिया के सामने फिर  संकट पैदा कर दिया है। ऐसे में ईरान और अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया की भलाई इसी में है कि अब युद्ध नहीं, युद्ध विराम हो।

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