चीन में काफी वर्षों बाद जनता का उबाल देखने को मिल रहा है‚ जो यहां के लिए बिल्कुल असामान्य बात है। खासकर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस्तीफे की मांग काफी तेज गति पकड़़ चुकी है। आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शंघाई के अलावा विरोध प्रदर्शन कई दूसरे शहरों में बढ़ चला है। विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला आइफोन बनाने वाली फैक्टरी से शुरू होकर शंघाई की सड़कों पर नारेबाजी के बाद शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों तक पहुंचता दिख रहा है‚ लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों और उसके बाद चीनी सरकार की प्रतिक्रिया ने लोगों को अस्सी के दशक वाले विरोध प्रदर्शनों की याद दिला दी है। १९८९ की तियानमेन चौक की घटना हर किसी के जेहद में कैद होगी‚ जिसमें सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों को सरकार के गुस्से का सामना करना पड़़ा था। इस आंदोलन को दबाने के लिए करीब १० हजार से ज्यादा छात्रों की भीड़़ पर टैंक दौड़़ा दिए थे। कहते हैं कि किसी को इतना मत ड़राओ की उसका ड़र खत्म हो जाए। चीन में कुछ ऐसा ही हाल है। यहां कोरोना महामारी को जिस तरह सरकार ने दबाया और जनता पर कितनी ज्यादती की गई‚ यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। इस बार भी विरोध प्रदर्शन का आधार कोरोना महामारी ही है। बीते एक सप्ताह से चीन में कारोना संक्रमण काफी तेजी से फैल रहा है। शनिवार को यहां २४ घंटे में ४० हजार मामले दर्ज किए गए थे। इससे पहले यहां ३५ हजार मामले आए थे। बढ़ते केस को देखते हुए सरकार ने कई शहरों में ‘जीरो कोविड़ पॉलिसी’ लागू कर दी है। इसके तहत सख्त लॉकड़ाउन लगाया गया है। जनता को कई तरह की बंदिशों में रखा गया है। जनता के गुस्से की मूल वजह भी यही है। लोगों के मन में घर कर गई निराशा और गुस्सा आग (शिनजियांग में १० लोगों की मौत हो गई थी) की घटना के बाद से बढ़ गया है। आवाजाही पर तीन साल से लगी पाबंदी से चीन के लाखों लोग उकता चुके हैं। बहरहाल‚ पड़़ोसी मुल्क होने की वजह से भारत को वहां की गतिविधयों पर नजर रखने की जरूरत है। एक तो कोरोना के बढ़øते मामले को देखते हुए वहां के हालात और दूसरा सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ जनता का आक्रोश गंभीर मसला है। इस नाते हमें वहां के घटनाक्रम को उसका निजी मसला बताने की भूल नहीं करनी होगी।
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राज्यसभा में वंदेमातरम बिल पास हो गया है. बता दें कि इस बिल को 24 जुलाई को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री...






