बिहार की दो विधानसभा सीटों मोकामा और गोपालगंज पर महागठबंधन और भाजपा की ओर से उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होने के बाद मुकाबला दिलचस्प हो गया है। मोकामा में महागठबधंन ने भूमिहार जाति से आने वाले बाहुबली पूर्व विधायक अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को टिकट दिया है। इनसे मुकाबला के लिए बीजेपी ने भूमिहार जाति से ही आने वाले नलिनी रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की पत्नी सोनम देवी को जदयू से भाजपा में शामिल कराकर टिकट दिया है। भाजपा वहां बाहुबल का जवाब बाहुबल से देना चाहती है। मोकामा की जातीय संरचना ऐसी है कि महागठबंधन और भाजपा दोनों को भूमिहार उम्मीदवार ही उतारना पड़ा। यहां दो महाबली की पत्नियों की लड़ाई है।
गोपालगंज में साधु यादव की पत्नी के मैदान में आने के बाद मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। यहां अब टक्कर सिर्फ बीजेपी और महागठबंधन में नहीं है। साधु यादव की पत्नी इंदिरा यादव बसपा के टिकट से चुनाव लड़ रहीं हैं।
भूमिहार के बाद ही अन्य कोई जाति
मोकामा के इलाके में भूमिहार वोट बैंक का वर्चस्व है। भूमिहार के बाद ही अन्य दूसरी जातियां ताकत रखती हैं। भूमिहार के बाद ब्राह्मण, कुर्मी, यादव और पासवान वोटर्स हैं। लेकिन सवर्ण वोटर्स यानी भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत जिसको वोट करेंगे उनकी जीत पक्की होगी। अनंत सिंह की छवि वहां रॉबिनहुड जैसी है। इसलिए अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को हराना आसान बात नहीं।
क्षत्रिय कुसुम देवी से कलवार जाति के मोहन गुप्ता की लड़ाई
गोपालगंज सीट पर सहानुभूति वोट बैंक का असर होगा या फिर जाति से जुड़ी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूला का यह सवाल है। भाजपा ने दिवंगत सुभाष सिंह की पत्नी कुसुम देवी को टिकट दिया है। जबकि महागठबंधन की ओर से राजद नेता मोहन गुप्ता मैदान में उतारे गए हैं। तारापुर उपचुनाव की तरह राजद ने यहां वैश्य वोट बैंक पर भरोसा दिखाया है, तारापुर में जदयू से कोयरी जाति के राजीव कुमार सिंह लड़े थे।
गोपालगंज में स्व. सुभाष सिंह की पत्नी भाजपा उम्मीदवार कुसुम देवी क्षत्रिय हैं तो राजद के मोहन गुप्ता कलवार जाति से आते हैं। कलवार जाति की संख्या यहां काफी है। सुभाष सिंह गोपालगंज से चार बार विधायक रहे। सुभाष सिंह के निधन के बाद कुसुम देवी को टिकट देने का मतलब ही है कि वहां सहानुभूति वोट का फायदा उठाया जाए। आम तौर पर उपचुनावों में सहानुभूति वोट का असर दिखने का ट्रेंड रहा है जिसमें जिनके निधन से सीट खाली होती है उनके परिजन ही चुनाव जीतते हैं।
उम्मीदवार को देख भाजपा का मोह छोड़ वैश्य एकजुट हो सकते हैं
इससे अलग महागठबंधन भाजपा के परंपरागत वोट बैंक पर सेंधमारी करते हुए वैश्य वोटर्स के सहारे पार उतरना चाहती है। यहां पहली बार वैश्य जाति से 1977 में राधिका देवी चुनाव लड़ी थीं और जीती थीं। इसके बाद जनता दल से 1995 में रामावतार प्रसाद की जीत हुई थी। रामावतार प्रसाद के बाद वहां से कोई दूसरा वैश्य चुनाव नहीं जीत पाया।
यहां इस बार राजद के मोहन प्रसाद के उतरने से उन्हें राजद का तो वोट मिलेगा ही साथ ही जदयू, हम और लेफ्ट पार्टियों से जुड़े वोट भी मिलेंगे। मोहन प्रसाद को राजद के माई समीकरण का फायदा मिलेगा। वैश्यों के बीच यह बात है कि काफी दिनों बाद एक वैश्य नेता के साथ इतनी पार्टियां (महागठबंधन) हैं इसलिए वैश्य एकजुटता दिखाई जाए। नीतीश कुमार के कार्यों से प्रभावित अतिपिछड़ा और पिछड़ा वोट बैंक भी जुड़ेगा।
साधु यादव की पत्नी मैदान में, इससे भाजपा और राजद दोनों को दिक्कत
लालू प्रसाद के साला साधु यादव ने गोपालगंज मुकाबले को त्रिकोणीय कर दिया है। उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा यादव को मैदान में उतार दिया है। वे बसपा से उम्मीदवार हैं। इसलिए इसकी चर्चा जोरों पर है कि कहीं इंदिरा यादव और मोहन प्रसाद की लड़ाई में भाजपा की कुसुम देवी चुनाव न जीत जाए। महागठबंधन से किसी मुसलमान को टिकट नहीं मिलने से मुसलमानों में रोष है।
बता दें कि 2020 के विधान सभा चुनाव मे भाजपा के सुभाष सिंह जीते थे तो दूसरे स्थान पर साधु यादव रहे थे। कांग्रेस के आशिक गफूर तीसरे स्थान पर थे। हाल के कई उपचुनावों की तरह एक बार फिर कांग्रेस से यह सीट महागठबंधन में छिन गई। यहां 1995 में लालू प्रसाद के साले साधु यादव विधायक बने थे।




