शक्ति की उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल प्रतिपदा सोमवार को उत्तरा फाल्गुनी व हस्त नक्षत्र के साथ शुक्ल एवं ब्रह्म योग के युग्म संयोग में कलश स्थापना के साथ शुरू हो रहा है। इसके अलावा आज जयद् योग भी बन रहा है। नवरात्र के दौरान देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना होगी। भगवती के प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री की उपासना की जाएगी। दो साल बाद इस बार स्थिति सामान्य होने से सामूहिक तौर पूजा–पंडालों में भी कलश स्थापना एवं माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित होगी। इसीलिए माता के भक्तों में नवरात्र को लेकर उनका उत्साह चरम पर है। सनातन धर्मावलंबियों के घर‚ मंदिर व पूजा पंडालों में आज घट स्थापना कर दुर्गा सप्तशती‚ रामचरितमानस‚ सुंदरकांड‚ राम रक्षा स्त्रोत्र‚ दुर्गा सहस्त्र नाम‚ अर्गला‚ कवच‚ कील‚ सिद्ध कुंजिका स्त्रोत्र आदि का पाठ आरंभ हो जाएगा। आरंभ हो रहे शारदीय नवरात्र में देवी दुर्गा का आगमन व विदाई दोनों ही हाथी पर हो रहा है। देवी भागवत पुराण के अनुसार देवी मां गज यानि हाथी पर आगमन एवं हाथी पर विदाई होने से भक्तों को सुख–समृद्धि‚ कामना पूर्ति के साथ देश में खुशहाली का वातावरण तथा पर्याप्त वर्षा होती है। दुर्गा पूजा के दौरान दुर्गा सप्तशती व अन्य धार्मिक ग्रंथों के पाठ करने या संकल्प देकर योग्य ब्राह्मणों द्वारा करवाने से अनिष्ट ग्रहों से छुटकारा‚ रोग–शोक का नाश‚ पीडाओं से मुक्ति‚ धन–धान्य‚ ऐश्वर्य‚ ज्ञान‚ वैभव‚ कौशल में वृद्धि‚ पारिवारिक सौहार्द‚ समाजिक समरसता‚ आपसी प्रेम‚ निरोग काया तथा स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
देवी पुराण के हवाले से कहा कि नवरात्र में कलश स्थापन का विशेष महत्व होता है। कलश में ब्रह्मा‚ विष्णु‚ रूद्र‚ नवग्रहों‚ सभी नदियों‚ सागरों–सरोवरों‚ सातों द्वीपों‚ षोडश मातृकाओं‚ चौसठ योगिनियों सहित सभी तैंतीस करोड देवी–देवताओं का वास होता है। इसीलिए सिर्फ कलश की पूजा करने मात्र से ही श्रद्धालु को सर्वदेव पूजन का पुण्यफल मिल जाता है। सभी शुभ कार्य जल्द सिद्ध होते है तथा उसका लाभ दीर्घ काल तक मिलता है। नवरात्र में वेद मंत्रों के उच्चारण‚ धार्मिक ग्रंथो का पाठ‚ हवन‚ कर्पूर की आरती‚ घंटी‚ करताल‚ डमरू की ध्वनि से नकारात्मक >र्जा का हस तथा सकारात्मकता का वास होता है‚ जिससे जीवन में उन्नति–तरक्की के प्रबल आसार बनते हैं।
शारदीय नवरात्र में बन रहे कई उत्तम संयोग
शारदीय नवरात्र में तिथि‚ वार‚ नक्षत्र व योगों के युग्म संयोग से करीब सभी दिन माता जगदंबा की पा पाने हेतु पूजा–पाठ‚ मंत्र जाप‚ भोग–आरती कर उनको प्रसन्न करने तथा अन्य शुभ कायोंर् के लिए उत्तम रहेगा। इन दस दिवसीय दुर्गा पूजा के अंतर्गत ३ सर्वार्थसिद्धि‚ १ द्विपुष्कर‚ ३ रवियोग‚ १ आयुष्मान योग‚ १ सौभाग्य योग एवं १ जयद् योग बन रहे हैं। इनके अलावा ब्रह्म योग‚ प्रीति योग‚ शोभन योग‚ सुकर्मा योग भी रहेंगे। इस शुभ योग में चल–अचल संपत्ति में निवेश‚ आभूषण की खरीदी‚ लग की खरीदारी‚ वाहन की खरीदी हेतु अत्यंत शुभ मुहूर्त है। नवरात्र के हर दिन बनने वाले शुभ योगों में नए कामों की शुरुआत करना श्रेष्ठ होगा।
मां दुर्गा के नौ रूपों की होगी पूजा
नवरात्र के नौ दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है। पहले दिन मां शैलपुत्री‚ दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी‚ तीसरे दिन मां चंद्रघंटा‚ चौथे दिन मां कुष्मांडा‚ पांचवें दिन मां स्कंदमाता‚ छठे दिन मां कात्यायनी‚ सातवें दिन मां कालरात्रि‚ आठवें दिन मां महागौरी और नौवें और अंतिम दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्र के प्रथम दिवस में कलश स्थापना कर जगदंबा की पूजा आरंभ हो जाएगी। प्रभु श्रीराम ने सर्वप्रथम समुद्र के किनारे शारदीय नवरात्र की पूजा का आरंभ किया थे। नौ दिनों की अनुष्ठान को पूर्ण करने के बाद भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त हासिल किया था।
कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त
उदयकालिक योगः प्रातः ०६.०२ बजे से शाम ०५.५८ बजे तक शुभ योग मुहूर्तः सुबह ०८.४१ बजे से १०.११ बजे तक अभिजीत मुहूर्तः दोपहर ११.१७ बजे से १२.०५ बजे तक गुली काल मुहूर्र्तः दोपहर ०१.११ बजे से ०२. ४१ बजे तक लाभ योग मुहूर्तः मध्या ०२.४१ बजे से ०४.११ बजे तक अमृत मुहूर्तः शाम ०४.११ बजे से ०५.४१ बजे तक
मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में शैलपुत्री के नाम से पूजी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं तब इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया,सती ने जब सुना कि हमारे पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं,तब वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने भगवान शिव को बताई। भगवान शिव ने कहा-”प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं,अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है।ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।”
शंकर जी के इस उपदेश से देवी सती का मन बहुत दुखी हुआ। पिता का यज्ञ देखने वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर शिवजी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है। केवल उनकी माता ने ही स्नेह से उन्हें गले लगाया। परिजनों के इस व्यवहार से देवी सती को बहुत क्लेश पहुंचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहां भगवान शिव के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है,दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे।
यह सब देखकर सती का ह्रदय ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा कि भगवान शंकर जी की बात न मानकर यहां आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। वह अपने पति भगवान शिव के इस अपमान को सहन न कर सकीं,उन्होंने अपने उस रूप को तत्काल वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुणं-दुखद घटना को सुनकर शंकर जी ने क्रुद्ध हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया। सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री नाम से विख्यात हुईं। पार्वती,हेमवती भी उन्हीं के नाम हैं। इस जन्म में भी शैलपुत्री देवी का विवाह भी शंकर जी से ही हुआ।
पूजाफल
मां शैलपुत्री देवी पार्वती का ही स्वरूप हैं जो सहज भाव से पूजन करने से शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। मन विचलित होता हो और आत्मबल में कमी हो तो मां शैलपुत्री की आराधना करने से लाभ मिलता हैं।
मां शैलपुत्री का स्तवन मंत्र
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥







