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दहशत फैलाने के लिए की गयी थी बेगूसराय में फायरिंग!

UB India News by UB India News
September 18, 2022
in अपराध, खास खबर, पटना, बेगुसराय
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दहशत फैलाने के लिए की गयी थी बेगूसराय में फायरिंग!
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बिहार के बेगूसराय जिले में सीरियल फायरिंग मामले का पुलिस ने खुलासा तो कर दिया है मगर अभी तक पूरा सच नहीं बताया गया है। चार में से तीन आरोपियों को कहां से गिरफ्तार किया गया, इस सवाल से एसपी बचते नजर आए। एसपी ने बताया कि एक आरोपी केशव नागा को ट्रेन से पकड़ा गया। उसके तीन साथियों को कहां से पकड़ा ये नहीं बताया गया है। साथ ही पुलिस के मुताबिक गोलीबारी करने वाले दो मुख्य आरोपियों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पुलिस की कहानी में कई छेद साफ दिख रहे हैं ।

एसपी योगेंद्र कुमार ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि अंधाधुंध गोली चलाने वाले दो आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, उनसे पूछताछ जारी है। इसके अलावा दो अन्य आरोपी भी पकड़े गए हैं, जो इस साजिश में शामिल थे। शुरुआती जांच में पता चला है कि आरोपियों ने क्षेत्र में दहशत फैलाने के लिए गोलियां चलाई थीं। हालांकि, पुलिस को दूसरी बाइक और उस पर सवार अन्य आरोपियों की तलाश है। पुलिस को शक है कि इस साजिश में कुछ और लोग शामिल हो सकते हैं, जिसकी जांच की जा रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं। बेगूसराय एसपी ने कहा कि इसके बाद वारदात में प्रयुक्त दो देसी पिस्टल, बाइक बरामद की। उनसे पूछताछ में चुनचुन और केशव नागा नाम के दो और शख्स का नाम सामने आया, जिन्हें पुलिस ने अलग-अलग जगहों से गिरफ्तार किया। वारदात में प्रयुक्त दूसरी मोटरसाइकिल की तलाश की जा रही है, उसपर बैठकर गोली चलाने वाले अन्य दो लोगों की भी जांच जारी है।

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पुलिस की कहानी में कई छेद

पुलिस ने बेगूसराय फायरिंग के मामले का खुलासा कर देने का दावा तो किया है लेकिन इसमें कई छेद साफ साफ नजर आ रहे हैं। देखिये कौन से सवाल अनसुलझे हैं।

* पुलिस कह रही है कि अपराधियों ने देशी पिस्टल से फायरिंग की। मंगलवार की शाम अपराधियों ने हाइवे पर ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। क्या देशी पिस्टल से ताबड़तोड़ फायरिंग की जा सकती है।

* पुलिस ने घटना में शामिल अपराधियों की क्राइम हिस्ट्री बतायी है। इसमें गोली चलाने में शामिल युवराज पर पहले से कोई केस दर्ज नहीं है। उसके साथ गोली चलाने में शामिल होने का आऱोप सुमित पर लगाया जा रहा है। उस पर पहले से आर्म्स एक्ट का सिर्फ एक मुकदमा दर्ज है। जाहिर है पुलिस जिन्हें फायरिंग करने वाला करार दे रही है, उनकी कोई हिस्ट्री नहीं है. क्या नौसिखिये अपराधी इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते है।

* पुलिस कह रही है कि दहशत फैलाने के लिए फायरिंग की गयी। आखिरकार अपराधी दहशत क्यों फैलाना चाह रहे थे। इससे उन्हें क्या लाभ हो सकता है।

* इस मामले में बेगूसराय में एसपी औऱ पटना में एडीजी हेडक्वार्टर ने फायरिंग को लेकर प्रेस कांफ्रेंस की. बेगूसराय एसपी ने कहा कि युवराज और सुमित ने फायरिंग की। पटना में एडीजी ने कहा कि वे नहीं बता सकते कि किसने गोली चलायी।

* पटना में एडीजी ने कहा कि पुलिस जांच में ये बात सामने आ रही है कि किसी औऱ ने इस फायरिंग की प्लानिंग की थी. जिसने प्लानिंग की थी वह कह रहा था हमारा दहशत कम हो रहा है इसलिए फायरिंग करायी गयी। मीडिया ने पूछा कि आखिरकार किसकी दहशत कम हो रही थी, किसने गोली चलाने का आर्डर दिया। एडीजी ने कहा कि ये पुलिस के अनुसंधान और केस डायरी में आय़ेगा। अभी वे नहीं बतायेंगे कि वो प्लानर कौन है।

* इस घटना में पकडे गये एक अभियुक्त के परिजनों ने सीसीटीवी फुटेज दिया है जिसमें उनका लड़का मंगलवार की शाम साढ़े पांच बजे होटल में बैठा दिख रहा है। मीडिया ने एडीजी से इस बाबत सवाल पूछा तो एडीजी ने कोई जवाब देने से इंकार कर दिया. एडीजी बोले-पुलिस ने सारा अनुसंधान कर किसी की गिरफ्तारी की है।

बेगूसराय में फिर लौट आया कामदेव का काल? बिहार पुलिस रही फेल तब बुलाई गई थी सेंट्रल फोर्स

बिहार के बेगूसराय जिले का बरौनी चौक… शाम का वक्त… सड़क पर अभी ज्यादा भीड़-भाड़ शुरु नहीं हुई। बाकी शामों की तरह सबकुछ सामान्य तभी अचानक धांय-धांय-धांय की आवाज़ से बरौनी चौक का पूरा इलाका सहम उठता है। गोलियों की आवाज़ से आसपास खड़े लोग इधर उधर भागने लगते हैं। दो बाइकों पर सवार चार लोग अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे हैं। वहां मौजूद लोगों में किसी को कुछ समझ नहीं आता। अपनी जान बचाने के लिए जिसको जहां जगह मिलती है वहां भागने लगते हैं। गोलियों की आवाज़ बंद नहीं होती है। पूरे इलाके में अफरातफरी मच जाती है। ये दोनों बाइक आगे बढ़ती हैं लेकिन फायरिंग बदस्तूर जारी रहती है। ये लोग नेशनल हाइवे से होते हुए बीहट की तरफ आगे बढ़ जाते हैं। जहां जहां से ये बाइक गुजरती हैं, गोलियों की आवाज़ गूंजती रहती है। मल्हीपुर चौक, बरौनी, तेघड़ा, बछवाड़ा, इन सब इलाकों में ये लोग अंधाधुंध फायरिंग करते हैं। जहां भीड़ देखते हैं वहीं फायरिंग शुरू। लोगों को कुछ समझ नहीं आता। गोलियों की आवाज़ से पूरा बेगूसराय सहम जाता है। 30 किलोमीटर तक फायरिंग का सिलसिला जारी रहता है। 11 लोगों को गोलियां लगती हैं जिनमें से एक की मौत भी हो जाती है।

फिर दहशत में बेगूसराय
बेगूसराय की फायरिंग कांड की गूंज बिहार से लेकर दिल्ली से गूंजती है। बिहार की नीतीश सरकार कठघरे में आ जाती है। आरोप प्रत्यारोपों का दौर शुरू होता है लेकिन राजनीति से उलट लोगों को ये फायरिंग बिहार के बीते दिनों के खौफ की याद दिलाती है। बेगूसराय की घटना से लोगों के अंदर जो दहशत पैदा होती है वो लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या खौफ और दर्द का वो दौर फिर शुरू होने जा रहा है जिसने कभी बिहार के लोगों की नींद उड़ा दी थी। सड़क पर सरेआम ताबड़तोड़ फायरिंग लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर रही है कि सत्तर का वो गुंडाराज कहीं फिर बिहार में लौट तो नहीं आया है। इस घटना के बाद लोग सड़कों पर निकलने से डर रहे हैं। डर इस बात का कहीं भरी दोपहर में कोई गोली चलाकर उनको निशाना न बना दे।

फिर लौट आया ?
बिहार में सत्तर का दशक बेगूसराय के लोगों को भूले नहीं भूलता। रात तो छोड़िए दिन में भी लोग बाहर जाने कतराते थे। बिहार की गलियां हर पल गोलियों की आवाज़ से गूंजा करती थीं। ये वो जमाना था जब बिहार में कहने को तो सरकार होती थी लेकिन फैसला चलता था अपराधियों का। बेगूसराय में उन दिनों अपराध की दुनियां में एक ही नाम गूंजता था और वो था सम्राट कामदेव सिंह का। कामदेव सिंह जो जुर्म का पर्यायवाची था। डकैत, तस्कर, हत्यारा जिस नाम से चाहे कामदेव सिंह को पुकारा जा सकता है। बेगूसराय के मटिहानी के नया गांव का रहने वाला सम्राट कामदेव वो नाम था जिसके खौफ से सिर्फ बेगूसराय ही नहीं बल्कि पूरा बिहार और नेपाल तक कांपता था। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और नेपाल हर तरफ इस गैंगस्टर के पांव पसरे हुए थे। बेगूसराय में तो एक पत्ता भी इस दुर्दांत अपराधी की मर्जी के बिना नहीं हिल सकता था।

सत्तर के दशक में था कामदेव का खौफ
कामदेव हथियारों के बल पर अपने फैसले करता था। 1970 के आसपास से शुरू होती है बिहार के इस खूंखार अपराधी की कहानी। इस दौरान कामदेव सिंह बैलगाड़ी पर चलता था। कुछ डैकतों के साथ कामदेव सिंह की जानपहचान हो गई और फिर डकैती कर इसने पैसे कमाने शुरू किए। थोड़े समय तक डकैती को अपना धंधा बनाकर रखा लेकिन फिर इसने तस्करी में हाथ अजमाने की सोची। तस्करी के कारोबार में इतने आगे निकल गया कि बेगूसराय के अलावा बिहार के दूसरे इलाकों में भी इसकी पैठ बन गई। इसका गिरोह ताकतवर होता चला गया। गांजा, स्टील, यूरेनियम हर प्रतिबंधित चीज़ की स्मगलिंग को कामदेव अंजाम देने लगा। ये लोग बिहार के अलग अलग बॉर्डर्स से नेपाल में तस्करी करते और बदले में खूब पैसा कमाते। सम्राट कामदेव सिंह अपराधियों में बिहार के बड़े नामों में शामिल हो गया। बैलगाड़ी से लेकर बड़ी बड़ी गाडियों का सफर कामदेव ने चंद सालों में ही पूरा कर लिया।

40 से ज्यादा कम्युनिस्टों की हत्या का आरोप
इन दिनों बिहार में खासकर बेगूसराय में कमयुनिस्ट विचारधारा का काफी था। कामदेव ने खुद कम्युनिस्ट के खिलाफ खड़ा किया। बेगूसराय में आए दिन कामदेव और कम्यूनिस्ट नेताओं के बीच खूनखराबे की खबरें आने लगीं। कम्युनिस्ट के विरोध के चलते दूसरे दलों से कामदेव को पूरा सहयोग मिल रहा था। स्मगलिंग के अलावा कामदेव ने बूथ कैप्चिरिंग, हत्याएं, अपहरण जैसे अपराधों में भी अपना दबदबा बना लिया था। कहते हैं बेगूसराय में कामदेव ने 40 से ज्यादा वाम नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। बेगूसराय में आए दिन गैंगवार होती थीं। जैसे-जैसे कामदेव की दबंगई बढ़ रही थी, वैसे-वैसे उसका रुतबा भी बढ़ रहा था। बड़े-बड़े राजनेताओं से कामदेव की जान पहचान थी। उसकी पहचान इतनी थी कि कहते हैं कामदेव जिसको चाहता, अपने जुर्म के दम पर विधानसभा का सदस्य तक बना सकता था। पैसे और गोली के बल पर उसके हर काम हो जाते थे।

नेपाल में भी था कामदेव का कारोबार
कामदेव सिंह एक तरफ तो वाम नेताओं की हत्या कर रहा था तो दूसरी तरफ गरीबों के बीच मसीहा की छवि बना रहा था। कहते हैं कामदेव गरीबों की खूब मदद करता था। लड़कियों का शादियां करवाना, कर्ज देने में लोगों की मदद करना, वो बेगूसराय में एक वर्ग के लिए रोबिन हुड बनकर उभर रहा था तो वहीं कमयुनिस्ट के लिए वो बड़ी चुनौती बन गया था। उसका रुतबा अब बेगूसराय तक ही सीमित नहीं था। बात 1974 के आसपास की है बिहार में अब्दुल गफूर मुख्यमंत्री थे। कामदेव के नाम की चर्चा विधानसभा में हुई। अब्दुल गफूर ने विधानसभा में ही बेगूसराय में रामचन्द्र खान को एसपी नियुक्त करने की बात कही। रामचन्द्र खान की पुलिस में बेहद सख्त अधिकारी की छवि थी और कामदेव सिंह से निपटने के लिए सरकार ने रामचन्द्र खान को चुना था। अब बेगूसराय में कामदेव सिंह के लिए पीछे एसपी रामचन्द्र खान थे। कई बार मुठभेड़ हुई, कई सर्च ऑपरेशन चले। कामदेव को काम करने में खासी मुश्किलें आ रही थी और कहते हैं इसलिए वो बेगूसराय छोड़कर कुछ समय के लिए नेपाल भी भाग गया। जब तक रामचन्द्र खान की पोस्टिंग रही नेपाल से ही वो अपने कारोबार को करता रहा।

राजनीति में भी था दखल
माना जाता है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं से उसका उठना-बैठना था। कमयूनिस्टों के खिलाफ कांग्रेस कामदेव का इस्तेमाल कर रही थी और उसे बढ़ावा दे रही थी। थोड़े समय बाद दुगनी ताकत के साथ कामदेव वापस बेगूसराय लौट आया। कामदेव को बेगूसराय से बेहद प्यार था। बेगूसराय की गलियों से ही इसने अपने गैंग की ताकत बढ़ाई थी और पूरे बिहार में हाहाकार मचाया था। माना जाता है कि कामदेव के पास इतना पैसा और ताकत थी कि एक बार इंदिरा गांधी बिहार आईं तो कांग्रेस के नेताओं के कहने पर इंदिरा के स्वागत के लिए कामदेव में 100 अंबेस्डर गाड़ियों का काफिला खड़ा कर दिया। सबसे बड़ी बात इन गाडि़यों के नंबर भी एक से सौ तक थे, जो कामदेव की ताकत दिखाने के लिए काफी थे।

सीआरपीएफ की मदद से एनकाउंटर
1980 आते-आते सम्राट कामदेव इतना ताकतवर बन चुका था कि अब कांग्रेसी नेता भी उसके रुतबे से खौफ खाने लगे थे। जो बंदूक और दूसरे हथियारों के बल पर फैसले लेने लगा था। कामदेव को किसी का डर नहीं था। उसके काम में चाहे जो भी रोड़ा बनता वो उसे रास्ते से हटा देता। सरकारी अधिकारियों में भी उसका खौफ बढ़ने लगा था। एक तरफ स्मलिंग से वो ढेर सारे पैसे कमा रहा था तो दूसरी बूथ कैप्चरिंग और हत्याएं करके वो अपना रुतबा बढ़ा रहा था। धीरे-धीरे कांग्रेस को भी उससे खौफ पैदा होने लगा और फैसला लिया गया कि अब कामदेव का अंत करना होगा। 1980 में बिहार में राष्ट्रपति शासन था। उस वक्त केन्द्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह बिहार में राज्यपाल से मिले और ये फैसला लिया गया कि अब जल्द से जल्द कामदेव को हटाना होगा। बिहार पुलिस कामदेव को नहीं पकड़ पा रही थी। ये तय हुआ कि इस खूंखार अपराधी को पकड़ने के लिए सीआरपीएफ की मदद ली जाएगी।

इसके बाद कामदेव सिंह पर 10000 हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित किया गया। सीआरपीए ने सर्च टीमें बनाई और शुरू हुआऑपरेशन कामदेव। 18 अप्रेल 1980 में बेगूसराय में हुए एक एनकाउंटर में कामदेव को मार गिराया गया। एक दशक ज्यादा बिहार में जिसके नाम की तूती बोलती आखिरकार सीआरपीएफ की मदद से उसका अंत हुआ। कामदेव सिंह का वो हाहाकारी दौर बिहार के लोगों को आज भी नहीं भूलता। मंगलवार को जो फायरिंग हुई उसके बाद लोगों के अंदर वहीं खौफ नज़र आया।

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