मशहूर होना‚ अमर होना (दुनिया से रुखसत होने के बाद भी यहां मौजूद रहने की ख्वाइश) इंसान की कुछ नौसर्गिक कमजोरियों में शुमार है। एक दौर में बादशाह अपने नाम के सिक्के चलवाते थे। अपवाद को छोड़़कर हर किसी की ये दिली तमन्ना रहती है। हुक्मरान बन जाने के बाद और बढ़ जाती है। ऐसे में जब कोई इन कमजोरियों के विपरीत आचरण करे तो ध्यान देना लाजिमी हो जाता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी कर्मचारियों को आवास आवंटित किए जाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में चाबियों पर अपनी तस्वीर पर आपत्ति जता दी।
सीतारमण ने सुझाव देते हुए कहा कि बेहतर होता कि आवंटियों की तस्वीर चाबी पर होती जिसे वे स्मृति चिह्न के तौर पर रखते। सीतारमण ने बाकायदा आवंटियों को चाबी सौंपने के दौरान चाबी को पलट दिया‚ जिससे उनकी तस्वीर न दिखे। जाहिर है चाबियों पर उनकी तस्वीर बगैर मर्जी के अंकित की गई थी‚ जिससे उन्होंने बहुत सलीके से खुद को अलग कर लिया। हाल में प्रधानमंत्री से लेकर कुछ प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की तस्वीरें विभिन्न सरकारी योजनाओं पर आने पर आलोचना हुई। इससे शासनकर्ता पर बहुत फर्क नहीं पड़़ता क्योंकि वो इसके लिए बाध्य नहीं है। यह पूर्णतः विवेक और नैतिकता का तकाजा है।
दरअसल‚ इसके पीछे का मनोविज्ञान मतदाता को उपकृत करने का है। यह अहसास दिलाने का कि ‘मैं’ आपको यह चीज दे रहा हूं जबकि लोकतंत्र में कोई भी शासक सिर्फ माध्यम होता है। अमूमन नेता सत्ता में आने के बाद राजा की मानसिकता से ग्रस्त हो जाते हैं। वो यह भूल जाते हैं कि वो जो कुछ जनता को देते हैं वो जनता का ही पैसा होता है। बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए जनता उनका चुनाव करती है।
‘अमर’ होने की बीमारी दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु़ के नेताओं में इतनी ज्यादा है कि जीते जी अपनी मूर्ति लगवा लेते हैं। इस रोग से उत्तर भारत की एक दलित नेत्री भी अछूती नहीं रहीं। एक प्रधानमंत्री ने तो अपने शासनकाल में खुद को ही भारत रत्न दिलवा लिया था। ऐसे तमाम उदाहरण भरे पड़े़ हैं। खैर‚ मूल सवाल है सार्वजनिक जीवन में उचे मापदंड़ स्थापित करने का। भारतीय समाज ने संत को हमेशा राजा से ऊपर का दर्जा दिया है। उनका सम्मान किया है। अमरता प्रदान की है। समाज उन्हें ही याद रखता है‚ जिन्होंने कुछ किया‚ न कि गिनवाया। इसके विपरीत यदि किसी की सोच है‚ तो यकीनन ऐसी सोच जीवन की बड़़ी भूल है।







