झारखंड़ के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ‘लाभ का पद’ मामले में इस्तीफा देना पड़़ सकता है। राज्य चुनाव आयोग ने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट राज्यपाल के पास भेज दी है‚ जिसमें निर्णय सोरेन के माफिक होने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में उनके पास पद छोड़़ने और फिर से चुनाव में जाने के अलावा और विकल्प नहीं बचेगा। बता दें कि विधायकों के लिए संविधान में ‘लाभ का पद’ का जिक्र कियाहै।
संविधान के अनुच्छेद १९१(१)(ए) के मुताबिक अगर कोई विधायक किसी ‘लाभ के पद’ पर पाया जाता है तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। १६ मई २००६ को केंद्र सरकार ने लोक सभा में ‘लाभ के पद’ की व्याख्या के लिए एक बिल पास किया था। इसके बाद ४५ पदों को ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर रखा गया था। हां‚ अगर राज्य सरकार कोई कानून बनाकर किसी पद को ‘लाभ के पद’ के दायरे से बाहर रखती है तो विधायकों की सदस्यता अयोग्य नहीं ठहराई जा सकती है। हालांकि‚ संविधान में लाभ का पद स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है‚ लेकिन विभिन्न अदालती फैसलों में की गई व्याख्याओं द्वारा इसका अर्थ अवश्य स्पष्ट हुआ है। ‘लाभ के पद’ की व्याख्या के अनुसार‚ पद–धारक को कुछ वित्तीय लाभ या बढ़त या हितलाभ प्राप्त होते हैं। खैर‚ मूल बात है राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति का इस प्रकार कानूनी घेरे में आना। नियम–कायदों की जानकारी होने के बावजूद इतने बड़े़ ओहदे पर बैठे व्यक्ति का गलती करना अचरज में ड़ालता है। राज्यपाल का निर्णय पक्ष में नहीं आने पर एक संभावना यह भी है कि सोरेन राज्य चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दें‚ जिसमें निर्णय आने में वक्त लगे। उनके पास दूसरा विकल्प है दोबारा चुन कर आना। फिलहाल सोरेन के बारे में कोई राय बनाना बहुत जल्दीबाजी होगी। क्योंकि अदालत की टिप्पणी के बाद ही यह तय हो पाएगा‚ लेकिन राज्य चुनाव आयोग के निर्णय को सही मानें तो यह राजनेताओं के लिए एक बार फिर चीजों को दुरुस्त करने के लिए काफी है। इससे पहले भी ‘लाभ के पद’ मामले में कई निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपना पद छोड़़ने पर विवश होना पड़़ा है। जिसमें सोनिया गांधी और जया बच्चन जैसी हस्तियां शामिल रहीं हैं। इंदिरा गांधी बनाम राजनरायण मामले में भी गांधी को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के कारण अयोग्य ठहराया गया था। कुल मिलाकर नासमझी या थोड़़ा लालच किसी भी राजनेता का बड़़ा नुकसान कर सकता है। इस सूत्र को समझने में ही समझदारी है।







