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भारतीय मूल के मशहूर ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी पर न्यूयॉर्क में चाकू से हमला, वेंटिलेटर पर सलमान रश्दी

UB India News by UB India News
August 14, 2022
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर
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भारतीय मूल के मशहूर ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी पर न्यूयॉर्क में चाकू से हमला, वेंटिलेटर पर सलमान रश्दी
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भारतीय मूल के जाने-माने ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) पर शुक्रवार को अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान हमला हुआ। हमलावर ने मंच पर पहुंचकर रुश्दी पर चाकू से ताबड़तोड़ वार किए। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। मुंबई में जन्मे 75 साल के लेखक काफी समय से इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर थे। 1988 में उनकी बहुचर्चित किताब ‘सटेनिक वर्सेज’ (The Satanic Verses) प्रकाशित हुई जिस पर ईशनिंदा के आरोप लगे। दुनियाभर में उनके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन हुए। कट्टरपंथी उनके खून के प्यासे बन गए। किताब पर सबसे पहले भारत में बैन लगा। इस बैन का किस्सा भी बहुत दिलचस्प है। कहा जाता है कि तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ही किताब पर भारत के बैन के बारे में पता नहीं था।

मजहब के ठेकेदारों ने निकाल दिया रुश्दी की मौत का परवाना
‘सटेनिक वर्सेज’ सितंबर 1988 में ब्रिटेन में प्रकाशित हुई। भारत, ब्रिटेन समेत तमाम देशों में मुस्लिम किताब के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने लगे। प्रकाशन करने वाली कंपनी वाइकिंग पेंग्विन के यहां लेटर और फोन कॉल्स की बाढ़ आ गई। प्रकाशक से किताब को वापस लेने की मांग की जा रही थी। तभी से रुश्दी पर हर पल मौत का खतरा मंडराने लगा था। कट्टरपंथियों में नाराजगी इस कदर थी कि मजहब के स्वयंभू ठेकेदारों ने रश्दी के खिलाफ मौत का परवाना निकाल दिया। 1989 में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खमैनी ने बाकायदे रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा जारी किया।

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सटेनिक वर्सेज के आयात की अनुमति के लिए सरकार को मिले थे कई खत
ब्रिटेन में सटेनिक वर्सेज के प्रकाशित होते ही भारत में एक तरफ उसके आयात की इजाजत के लिए के लिए सरकार के पास चिट्ठियों के ढेर पहुंच रहे थे। दूसरी तरफ किताब पर बैन की मांग को लेकर जम्मू-कश्मीर समेत तमाम राज्यों में प्रदर्शन हो रहे थे। वक्त संवेदनशील था। सालभर पहले ही यूपी के हाशिमपुरा में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए थे। माहौल बहुत नाजुक था। किताब को लेकर क्या करें, इस पर चर्चा के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने सूचना सलाहकार जी. पार्थसारथी को बुलाया। उन्होंने सलाह दी कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे गृह मंत्रालय के पास भेज दिया जाना चाहिए क्योंकि ‘कानून-व्यवस्था’ से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी उसी की है।

इस्लामी देशों से पहले भारत ने लगा दिया किताब पर बैन
अक्टूबर 1988 में सटेनिक वर्सेज पर बैन लगाने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। बैन किताब के आयात पर लगा। इसके पीछे की कहानी भी बहुत दिलचस्प है। खुद प्रधानमंत्री को इस बैन के बारे में नहीं पता था। दिसंबर 2015 में राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने एक ब्लॉग में इसका खुलासा किया था।

किताब पर बैन के फैसले से अनजान थे तत्कालीन पीएम राजवी गांधी!
मल्होत्रा ने ब्लॉग में लिखा कि अक्टूबर 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी दूरदर्शन पर एक खबर देखकर चौंक गए। खबर थी सटेनिक वर्सेज के भारत में आयात पर बैन की। राजीव ने तुरंत अपने सूचना सलाहकार जी. पार्थसारथी को फोन मिलाकर पूछा- दूरदर्शन पर खबर देखी क्या आपने? सटेनिक वर्सेज पर बैन का ऑर्डर कैसे जारी हो गया। पार्थसारथी ने बताया कि बैन का फैसला गृह मंत्रालय ने लिया है। तत्कालीन गृह सचिव सीजी सोमैया ने साफ किया कि अगर रुश्दी की किताब को भारत आने दिया गया तो कानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है। इसलिए उसके आयात पर बैन लगाने का फैसला किया गया।

नवंबर 2015 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने टाइम्स लिट फेस्टिवल में कहा कि सटेनिक वर्सेज पर बैन का फैसला गलत था। सरकार को इस पर बैन नहीं लगाना चाहिए था। दरअसल, चिदंबरम के इसी कबूलनामे के बाद इंदर मल्होत्रा ने अपने ब्लॉग में बैन के पीछे की कहानी बयां की थी।

किताब पर भारत में बैन से बहुत आहत से रुश्दी
अपनी किताब पर भारत में बैन लगने से सलमान रुश्दी बहुत आहत हुए। उन्होंने तत्कालीन पीएम राजीव गांधी को एक तीखा खत लिखा। इसके अलावा उन्होंने लंदन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके राजीव गांधी और भारत पर जमकर भड़ास निकाली। रुश्दी ने अपने संस्मरण ‘जोसेफ एंटन’ में लिखा कि सटेनिक वर्सेज पर भारत ने बिना जांच-पड़ताल किए हड़बड़ी में बैन लगाया था। उन्होंने ‘जोसेफ एंटन’ में लिखा है, ‘“किताब के बारे में किसी आधिकारिक संस्था की ओर से कोई जांच पड़ताल नहीं की गई और ना ही किसी न्यायिक प्रक्रिया के तहत उसकी समीक्षा की गई।’

गृह मंत्रालय की सिफारिश पर वित्त मंत्रालय ने लगाया आयात पर बैन
किताब में रुश्दी ने याद किया है कि कैसे 6 अक्टूबर 1988 को लंदन में भारत के तत्कालीन उप उच्चायुक्त सलमान हैदर ने उन्हें फोन करके सटेनिक वर्सेज पर बैन के बारे में जानकारी दी थी। भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक ने लिखा है, ‘बैन शायद वित्त मंत्रालय की ओर से लगाई गई। कस्टम ऐक्ट के सेक्शन 11 के तहत इस किताब को भारत में आयात करने पर रोक है…हैरानी ये है कि वित्त मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि बैन को किताब की साहित्यिक या कलात्मक गुणवत्ता पर किसी तरह की टिप्पणी न माना जाए।’

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