काश्मीर के राजौरी में एक बार फिर आतंकवादी वारदात ने सुरक्षा बलों के साथ–साथ सरकार के माथे पर भी बल ला दिया है। कई दिनों की शांति के बाद शुक्रवार को सेना के एक कैंप पर पाकिस्तानी आतंकवादियों के आत्मघाती हमले को भले सुरक्षा बलों ने नाकाम कर दिया‚ मगर जवाबी कार्रवाई में जूनियर कमीशंड़ ऑफिसर (जेसीओ) समेत चार जवान शहीद हो गए। हालांकि इस दौरान जैश–ए–मोहम्मद के दो आतंकवादी मार गिराए गए। स्वतंत्रता दिवस से महज चार दिन पहले हुई इस आतंकी घटना से नये सिरे से सेना के कैंप की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े़ हो गए हैं। पहले भी इस तरह की घटना को घाटी में सक्रिय आतंकवादी समूहों ने अंजाम दिया है। उरी में छह वर्ष पहले ऐसा ही आत्मघाती हमला अंजाम दिया गया था। २०१६ में हुई इस वारदात में १९ जवान शहीद हो गए थे। वहीं २०१९ में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर फिदायीन हमला हुआ था। इस हमले में ४० सीआरपीएफ कर्मी शहीद हुए थे। दरअसल‚ एकाध महीने या उससे ज्यादा समय तक किसी तरह का आतंकी हमला नहीं करना आतंकवादियों की साजिश का हिस्सा रहता है। सुरक्षा बल भी कुछ पल के लिए ज्यादा सजग नहीं रहते हैं। इसी का फायदा आतंकी गुट उठाते हैं। कई सारे आतंकवादी हमले आधी रात के बाद अंजाम दिए जाते हैं। ऐसे समय में सुरक्षा बल या तो गहरी नींद में रहते हैं या अपना शिफ्ट बदलने की वजह से ज्यादा चौकस नहीं रहते हैं। राजौरी की घटना भी रात के २.१० बजे अंजाम दी गई। सुरक्षा बलों के लिए चिंता का सबब यह भी है कि बुलेट प्रूफ जैकेट को भेदने वाले कारतूस का इस्तेमाल आतंकी कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि इसकी काट के लिए सुरक्षा बलों को अपनी सुरक्षा का अलग से इंतजाम करना होगा। चिंता की दूसरी वजह स्थानीय खुफिया एजेंसियों की नाकामी है। कहा जा रहा है कि पीर पंजाल में आतंकी करीब एक महीने से छिपे बैठे थे। इसके बावजूद एजेंसियां उन दहशतगर्दों को नहीं ढूंढ सकी। यानी कहीं–न–कहीं यह खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों की नाकामी ही कही जाएगी। इन सब की काट के लिए सेना और पुलिस को अपनी गतिविधियां इलाके में बढ़ानी होंगी। यह तो वक्त रहते सुरक्षा बल सजग हो गए और जवाबी कार्रवाई को अंजाम दिया वरना हमारा नुकसान कहीं ज्यादा होता‚ क्योंकि कैंप में १०० से ज्यादा जवान मौजूद थेे। फिलहाल ऐसी घटनाओं को सबक के तौर पर लिया जाना चाहिए।
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