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ड्रैबल्स’ लिखना चुनौती के साथ-साथ मजेदार भी होता………..

UB India News by UB India News
July 18, 2022
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ड्रैबल्स’ लिखना चुनौती के साथ-साथ मजेदार भी होता………..
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आज की युवा पीढ़ी किताबें पढ़ना नहीं चाहती। हर वक्त स्मार्ट फोन या कंप्यूटर के सामने गर्दन झुकाए जुटी रहती है जिसका काफी बुरा असर आंखों, कंधों, गर्दन और दिमाग पर पड़ता है। वैसे तो हम सब भी इसी बुरी आदत के ग़ुलाम बन चुके हैं।

इस समस्या का सरल सा हल खोजा है, तीन पीढ़ी के तीन लेखकों ने। नाना, मां और बेटी ने मिलकर ‘ड्रैबल्स’ को भारत में साकार किया।

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आप पूछेंगे ये ‘ड्रैबल्स’ क्या बला है? यह 100 शब्दों में लिखी जाने वाली कहानी है जिसमें न एक शब्द ज्यादा हो सकता है, न कम। ‘ड्रैबल्स’ लिखना चुनौती के साथ-साथ मजेदार भी होता है। ‘ड्रैबल्स’ पढ़ना खुशी देता है। कोई व्यक्ति जो कुछ हलका-फुलका और जल्दी खत्म होने वाला पढ़ना चाहता है, उसके लिए यह ‘ड्रैबल्स’ लेखन उत्तम विधा है। ड्रैबल्स’ साहित्यिक दुनिया में एक नये प्रकार के लेखन की प्रणाली है, जो अभी भारत देश में ज्यादा प्रचलित नहीं हुई है। 1980 में यूनाइटेड किंग्डम में इसकी शुरुआत हुई थी। यह ‘माइक्रो-फिक्शन’ कहानियां हैं, जो केवल सौ शब्दों में लिखी जाती हैं। सौ शब्दों में ही कहानी के आदि, मध्य और अंत को रोचक बनाए रखना होता है। 2020-21 में कोरोना काल में जब हम सब अपने घरों में कैद थे और बाहर जाने को छटपटा रहे थे तब दुनिया में बहुत से लोगों ने कई अनूठे काम किए। ऐसे ही ये तीन लोग हैं, नाना बिशन सहाय, मां रुचि रंजन और बेटी इशिका रंजन, जिन्होंने ‘हमारी दुनिया ड्रैबल्स की’ नाम की पुस्तक लिखी जो आज भारत में लोकप्रियता के कारण खूब बिक रही है।

इस संग्रह में जीवन के हर रंग और रस की 87 कहानियां हैं। कुछ हंसी की मजेदार हैं, कुछ विलक्षण और अव्यावहारिक और चंद साई-फाई के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कुछ यादें कुरेदती हैं, तो कुछ सहानभूति जगाते हुए हम को इंसानियत की याद दिलाती हैं। कभी-कभी उन में जीवन की तरह से, उनका अंत नायाब और अप्रत्याशित होता है। सुंदर आकर्षित चित्रों से संवारी गई यह पुस्तक हिंदी के पाठकों के लिए एक नया और उत्तम तोहफा है। सौ शब्दों की इन कहानियों के चार नमूने देखिए। ‘लुका-छिपी’ शीषर्क की यह कहानी यूं लिखी गई है-पलंग के नीचे, मेज के नीचे दरवाजे के पीछे.. मेरा परिवार आज लुका-छिपी खेल रहा था।

सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के कारण हमारा घूमना-फिरना कम हो गया था। वह कहीं तो होगा! दो मंजिलें घर में उसे ढूंढना मुश्किल था और वह हमारे कॉल करने पर भी जवाब नहीं दे रहा था। उसकी चुप्पी परेशानी को ज्यादा उलझा रही थी। पारे गरम थे। उसके बिना ‘वर्क फ्रॉम होम’ असंभव था। कोविड-19 में सब वचरुअल होना था.. क्लास हो या वेबिनार। थक कर मैं कद्दू मसाला बनाने चली। जैसे ही प्याला प्लेट उठाने लगी। पीछे चुपचाप छिपा छिपाया पड़ा था..मेरा स्मार्टफोन! इसी तरह एक और कहानी का लुत्फ उठाइए। इसका शीषर्क है ‘ची-ची।’ यह घटना चीनी क्रांति से पहले की है जब चीनी पश्चिमी रंग में रंग रहे थे और अंग्रेज कृपालु मगर नकचढ़े थे। लंदन के सरकारी रात्रिभोज में कुओ¨मतांग के विदेश मंत्री डॉ. शुंग, अंग्रेज लॉर्ड के बगल में बैठे थे। लॉर्ड अनभिज्ञ थे कि वह अंग्रेजी के ज्ञाता हैं। अत: बात-चीत नहीं हुई।

सूप के बाद अंग्रेज ने विनम्रतावश पूछा: ‘लाइकी सूपी?’ शुंग ने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया। खाने के बाद, भाषणों के दौरान, डॉ. शुंग से बोलने का अनुरोध किया गया। भाषण उत्तम, फर्राटेदार अंग्रेजी में था। अंग्रेज सटपटा गया। बैठते ही शुंग ने उससे पूछा, ’लाइकी स्पीची? मानवीय संवेदनाओं को छूती इस कहानी ‘चाहत’ को पढ़िए-पानी भरने के लिए लंबी कतार, सार्वजनिक टॉयलेट के सामने झगड़ा, सब्जियां काटती महिलाएं, इस दृश्य ने परिसर में कदम रखते ही मेरा अभिवादन किया। आश्रम में रहने वाली शांताबाई मेरे पास आई और फुसफुसाई, ’किसी को याद नहीं..आज मेरा जन्मदिन है।’ मैंने उसे गले लगाया और उसने मेरे हाथ कसकर पकड़ लिए। उसका र्झुीदार चेहरा और आंखें चाहत से भरी थीं, जैसे किसी को खोज रही हों। मेरे मन को भांप कर बोली, ‘मुझे अपने बेटे के फोन का इंतजार नहीं है, अब यही मेरा घर है।’ आंसू उसके गालों तक बहते रहे और वह मुझसे लिपट गई। आप में से जो लोग कंपनियों में नौकरी करते हैं, उन्हें कॉरपोरेट कल्चर की यह कहानी पढ़कर मजा आ जाएगा।

वैसे भी एक पुरानी कहावत है, ‘घोड़े की पिछाड़ी और बस की अगाड़ी से हमेशा बच कर चलना चाहिए।’ इस कहानी का शीषर्क है ‘हुज़ूर जिंदाबाद!’-हमारी सिलोन की कंपनी के अध्यक्ष सर सिरिल डि जोयसा से सभी सहयोगी डरते थे। एक सुबह मैंने देखा कि उनकी कंपनियों के सभी डायरेक्टरों की हंसी रुक नहीं रही थी। हुआ यूं कि सर सिरिल अपने बंगले से दनदनाते हुए निकले और चिल्लाए, ‘मेरी चीजें क्यों छुई जाती हैं? मेरा चश्मा कहां गया?’ सब लोग उसे ढूंढने में लग गए, जब तक कि चश्मा उनकी तनी हुई भौंहों से लुढ़क कर नाक पर नहीं आ गया। ऐसा संभव नहीं था कि सबको वह लगा हुआ न दिखा हो, परंतु सर की बात काटने का साहस कौन करता? हुज़ूर जिंदाबाद! इसी बात को हमारे ब्रज में यूं कहते हैं, ‘बगल में छोरा- नगर में ¨ढडोरा।’ क्यों यही होता है न आपकी भी कंपनी में रोजाना? ऐसी ही 83 रोचक कहानियां रूपा पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में और हैं जिनकी तारीफ करने वालों में सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा और शशि थरूर सहित तमाम अखबार भी शामिल हैं। बच्चों के लिए अंग्रेजी में रोचक उपन्यास लिखने वाले विविख्यात लेखक रस्किन बॉन्ड का कहना है कि यह लघु-कथाओं का मनमोहक संग्रह कोविड-19 से परेशान हुए लोगों के लिए है।

यही सत्य है कि हमारे शरीर का सार तत्व अदृश्य अणु पर निर्भर करता है, जो विकसित होने पर जीवन की बड़ी से बड़ी कहानी बन जाता है। वेदों, शास्त्रों और ग्रंथों में भरी सामग्री को आधुनिक विज्ञान अभी तक नहीं जान पाया है। हजारों साल पहले सुश्रुत ने प्लास्टिक सर्जरी में जिस सामग्री का प्रयोग किया था, उसका विवरण दिया था। केवल एक पंक्ति पढ़कर मुझमें पूरा ग्रंथ पढ़ने की इच्छा जागी। मुझे विश्वास है कि इस लेख को पढ़कर आपके भी मन में इस अनूठी किताब को खोजने और पढ़ने की इच्छा जागेगी क्योंकि तभी हम अपने बच्चों को कंप्यूटर और स्मार्ट फोन से हटा कर एक बार फिर किताबों की दुनिया में लौटा पाएंगे।

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