बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का संदेश हम भगवान बुद्ध और महात्मा फुले के विचारों में पाते हैं। इतिहास गवाह है कि हजारों वर्षों से हमारे समाज में समता का पुरस्कार और विषमता का विरोध‚ दोनों ही होता आया है। समाजिक‚ सांस्कृतिक‚ राजनैतिक और आर्थिक मोर्चों पर जातिगत अस्मिता को भले ही कुछ कलावधि में संघर्ष से जूझना पड़ा हो पर अंततः एक कालजयी विजय ने एक समतावादी कड़ी के रूप में उनके लिए चिरमार्गीय विकास का मार्ग प्रशस्त किया। विशेष रूप से महिलाओं का इस समतामूलक समाज का अंग बनना निश्चित ही शुभ संकेतक है। यह यथार्थवादी और समतावादी विचारों के मूल तत्व को निर्भयता के साथ स्थापित करने का द्योतक भी है। हाल के वर्षों में सार्वजनिक महत्व के बड़े और अति महत्वपूर्ण पदों पर महिला उम्मीदवारों की उपस्थिति इस बात की गवाह है कि तथाकथित पुरु षवादी नैरेटिव वाले खांचें में कभी मिसफिट रही महिलाएं अब मजबूती के साथ खुद को फिट कर पाने में तात्कालिक रूप से सक्षम हैं। द्रौपदी मुर्मू जैसी महिलाएं इसका जीवंत उदाहारण हैं। पिछला दो दशक देश के सर्वोच्च पदों पर महिलाओं के होने के नाम रहे। विशेष तौर से उस सबसे पिछड़े वर्ग की एक साधारण महिला का राष्ट्र के सर्वोच्च पद की दौड़ में सबसे आगे होना और उसे व्यापक जनस्वीकृति मिलना पुरातन के ढहने और उज्जवल भारत के निर्माण का परिचायक है। यह मौजूदा सरकार की समतामूलक सोच और समावेशी नीति की परिणति है। काबिलेगौर है कि यह उस वर्ग की सफलता की सुनहरी इबारत है‚ जिस वर्ग की महिलाओं को सदियों तक अभावों के साथ जीते हुए मूलभूत सुविधाओं के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। उनके लिए ऐसे मौके विकास‚ समृद्धि और तरक्की की पहलकदमी हैं। जनजातीय ्त्रिरयां अपनी चेतना के प्रति आस्थावान रही हैं। उनकी मूल्यों की वैचारिकी की प्रगति सुगठित एवं मूल्यगर्भा रही है। इसलिए वे अपने अनुभवों को विशुद्ध जीवन अनुभव के स्तर पर कलात्मक रूप से संजो पाएंगी‚ इसके पूरे आसार हैं। जातिगत अस्पृश्यता की वेदना‚ पीड़ा और शोषण को झेलते हुए विपन्नावस्था‚ आत्मवंचना‚ आत्मिक क्लेश और इसके साथ ही दरिद्री अवस्था में रहने पर भी वीरता‚ सामर्थ्य और इंसानियत जैसे जीवन के मूलभूत मूल्यों को संजोए रखने की क्षमता को व्यक्त करने वाला ही सफलता की अन्यंतम कहानी गढ़ता है। मूर्मू जैसी महिलाएं अपनी जातीय थाती और मूल्यों को अपेक्षा के संभावित स्तर तक ले जाएंगी‚ ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इससे इस वर्ग की महिलाओं में उत्साह का ही संचार होगा। अनेक कष्ट झेल कर जीवन के अंत तक अपने कार्य को पूरा करने हेतु संघर्ष करने वाले जनजातीय वर्ग की रोचक सांस्कृतिक‚ सामाजिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि रही है। यह वर्ग चेतनामूलक एवं प्रमाणिक है। यह भी हो सकता है कि ये असली भारतीय जीवन का समर्थ चित्र खींच सके। यह चेतना प्रगतिशीलता का विरोध नहीं करती‚ बल्कि उसका ही एक स्वतंत्र उन्मेष बन जाती है। विकसित एवं सजग संवेदनशीलता के कारण इस वर्ग को समाज में अपनी अस्पृश्यता का ही स्वरूप साफ–साफ oष्टिगोचर होना स्वाभाविक है। इस वर्ग की बौद्धिक तथा सांस्कृतिक क्षमता के विकास एवं भौतिक उत्कर्ष के कारण मनुष्य के नाते उनकी अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से बढ़ गई हैं। काल‚ समय और भविष्य के आलोक में ्त्रिरयों के शीर्ष पर पहुंचने की धार का गहराई से मापन समीचीन होगा।
गृह मंत्री संसद से क्यों भाग रहे हैं?
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को आरोप लगाया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मानसून सत्र के...







