लोकतंत्र में उपचुनावों को अक्सर केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया मान लिया जाता है, लेकिन कई बार यही छोटे चुनाव बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आते हैं। बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीटों के उपचुनावों ने भी यही साबित किया है। तीनों ही सीटों के नतीजों ने राजनीतिक दलों के संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवारों के चयन और जनभावनाओं को समझने के संबंध में अहम संकेत दिए हैं।
सर्वाधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही, जहां भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त करते हुए प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी पहली बार विधानसभा तक पहुंच गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष नितिन नवीन के गढ़ में प्रशांत किशोर की यह जीत कितनी प्रभावशाली रही, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि मतों की गिनती के पहले से लेकर अंतिम चरण तक एक बार भी भाजपा प्रत्याशी उनसे आगे नहीं बढ़ सका।
बांकीपुर की जीत दरअसल उस राजनीतिक प्रयोग की पहली ठोस सफलता है, जिसे प्रशांत किशोर पिछले कुछ वर्षों से बिहार में खड़ा करने कोशिश कर रहे थे। यही जन सुराज पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में 238 में से 236 सीटों पर अपनी जमानत तक नहीं बचा सकी थी। लिहाजा, इस जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को मिलना ही चाहिए, पर इसके लिए भाजपा की अपनी रणनीतिक भूलें कोई कम जिम्मेदार नहीं। पहले अभिषेक कुमार बंटी को उम्मीदवार बनाना, फिर उनसे नामांकन वापस कराते हुए आनन-फानन में एक अनजान चेहरे को मैदान में उतारे जाने से कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक ही भ्रम की स्थिति पैदा हुई, जिससे मतदाताओं में पार्टी की छवि पर भी यकीनन असर पड़ा होगा।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने ई-20 और खासकर पटना में नीट परीक्षा आंदोलन जैसे मुद्दों से उपजी नाराजगी को प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में मोड़ लिया। गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा ने राज्य में अपनी मजबूत स्थिति जरूर साबित की है, लेकिन मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली हार एक बार फिर भाजपा के भीतर पनप रही असंतुष्टि को दर्शाती है।
पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के निर्णय ने पार्टी के एक बड़े वर्ग को असहज किया, जिससे पूरे चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कथित भितरघात की चर्चाएं लगातार होती रहीं। यह संदेश भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है कि कार्यकर्ताओं का आंतरिक असंतोष और भितरघात जैसी प्रवृत्तियां चुनावी मैदान में घातक साबित हो सकती हैं। प्रशांत किशोर के लिए यह जीत उत्साहजनक है, पर इस जीत का श्रेय जितना उनको है, उतना ही भाजपा की रणनीतिक भूलों को भी है। भाजपा के लिए ये नतीजे आत्ममंथन का अवसर जरूर हैं।
क्या NDA-RJD के लिए संदेश?
बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने राज्य में नई राजनीति और नए विकल्प की खिड़की खोल दी है। इस नतीजे ने जहां सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी बजाई है, वहीं मुख्यधारा के दलों को युवाओं की आकांक्षाओं को लेकर सचेत होने का संदेश भी दिया है। नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में न सिर्फ राजग का अगड़ा-अति पिछड़ा बल्कि राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण भी औंधे मुंह गिरा है। यहां तक कि भाजपा उम्मीदवार अपने बूथ पर भी पीछे रहा।







